दर्शन भाग–बौद्ध दर्शन 18- अध्याय–12 : थेरवाद, महायान और वज्रयान — बौद्ध परम्पराओं का विकास

 ग्रंथ : भारतीय दर्शन श्रृंखला

बौद्ध दर्शन भाग–18-  अध्याय–12 : थेरवाद, महायान और वज्रयानबौद्ध परम्पराओं का विकास

बुद्ध के महापरिनिर्वाण के पश्चात् बौद्ध धर्म का विस्तार भारत से बाहर श्रीलंका, मध्य एशिया, चीन, तिब्बत, दक्षिण-पूर्व एशिया, कोरिया और जापान तक हुआ। इस दीर्घ यात्रा में बौद्ध परम्परा ने विभिन्न सांस्कृतिक, भाषिक और दार्शनिक परिस्थितियों के अनुसार अनेक रूप ग्रहण किए। इन्हीं विकासक्रमों से तीन प्रमुख परम्पराएँ सामने आईंथेरवाद, महायान और वज्रयान

यह ध्यान रखना आवश्यक है कि ये तीनों परम्पराएँ बुद्ध की मूल शिक्षाओं का पूर्णतः परित्याग नहीं करतीं। इनके बीच मूल नैतिक सिद्धान्त, चार आर्य सत्य, अष्टाङ्गिक मार्ग, कर्म, पुनर्जन्म और निर्वाण की आधारभूत मान्यता समान है। भिन्नता मुख्यतः साधना-पद्धति, दार्शनिक व्याख्या और आदर्श साधक की अवधारणा में दिखाई देती है।

थेरवाद

थेरवाद का अर्थ है"स्थविरों (प्राचीन आचार्यों) का मार्ग।" इसे प्रायः सबसे प्राचीन बौद्ध परम्परा माना जाता है। इसका आधार पालि त्रिपिटक है और यह मुख्यतः श्रीलंका, म्यांमार, थाईलैण्ड, लाओस और कंबोडिया में विकसित हुई।

थेरवाद का आदर्श अर्हत हैऐसा साधक जिसने अपने प्रयास से तृष्णा और अविद्या का अन्त कर निर्वाण प्राप्त कर लिया हो। इस परम्परा में व्यक्तिगत साधना, विनय, ध्यान और मूल बौद्ध शिक्षाओं के संरक्षण पर विशेष बल दिया गया है। आधुनिक विद्वान सामान्यतः "थेरवाद" शब्द का प्रयोग करते हैं; जबकि "हीनयान" शब्द ऐतिहासिक और विवादास्पद माना जाता है, इसलिए उसका प्रयोग सावधानी से किया जाना चाहिए।

महायान

महायान का अर्थ है"महान वाहन" अर्थात् ऐसा मार्ग जो अधिकाधिक प्राणियों के कल्याण के लिए खुला हो। इसका विकास ईसा पूर्व पहली शताब्दी के आसपास प्रारम्भ हुआ और आगे चलकर चीन, कोरिया, जापान तथा वियतनाम में इसका व्यापक प्रभाव पड़ा।

महायान की सबसे महत्त्वपूर्ण विशेषता बोधिसत्त्व आदर्श है। बोधिसत्त्व वह है जो स्वयं निर्वाण प्राप्त करने की क्षमता रखते हुए भी सभी प्राणियों के कल्याण के लिए करुणावश संसार में सक्रिय रहता है। इस परम्परा में करुणा (करुणा) और प्रज्ञा (प्रज्ञा) को समान महत्त्व दिया गया।

महायान में अनेक दार्शनिक धाराएँ विकसित हुईं, जिनमें माध्यमिक (नागार्जुन) और योगाचार (असंग, वसुबन्धु) विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। शून्यता, बोधिचित्त और सार्वभौमिक करुणा जैसे विचारों ने इस परम्परा को विशिष्ट स्वरूप प्रदान किया।

वज्रयान

वज्रयान का विकास महायान की पृष्ठभूमि में हुआ और यह विशेष रूप से तिब्बत, भूटान, मंगोलिया तथा हिमालयी क्षेत्रों में विकसित हुआ। इसे तन्त्रयान या मन्त्रयान भी कहा जाता है।

वज्रयान में मन्त्र, मुद्रा, मण्डल, देवयोग तथा गुरु-शिष्य परम्परा का विशेष महत्त्व है। इसका उद्देश्य भी बुद्धत्व की प्राप्ति ही है, किन्तु साधना-पद्धति अधिक प्रतीकात्मक और तान्त्रिक स्वरूप ग्रहण करती है। इस परम्परा में यह माना जाता है कि योग्य गुरु के निर्देशन में साधक अपेक्षाकृत तीव्र गति से आध्यात्मिक उन्नति कर सकता है।

समानताएँ और भिन्नताएँ

इन तीनों परम्पराओं के बीच मतभेद अवश्य हैं, किन्तु उनका मूल उद्देश्य समान हैदुःख से मुक्ति और प्रज्ञा का विकास।

  • थेरवाद व्यक्तिगत साधना और मूल शिक्षाओं के संरक्षण पर अधिक बल देता है।
  • महायान करुणा और बोधिसत्त्व आदर्श को व्यापक रूप से विकसित करता है।
  • वज्रयान तान्त्रिक साधना और प्रतीकात्मक आध्यात्मिक पद्धतियों को अपनाता है।

इन भिन्नताओं के बावजूद तीनों परम्पराएँ बुद्ध को अपने सर्वोच्च शिक्षक के रूप में स्वीकार करती हैं और चार आर्य सत्य तथा अष्टाङ्गिक मार्ग को बौद्ध जीवन का आधार मानती हैं।

ऐतिहासिक महत्त्व

इन परम्पराओं का विकास केवल धार्मिक इतिहास की घटना नहीं था। इनके माध्यम से बौद्ध धर्म विभिन्न सभ्यताओं में प्रवेश कर सका। चीन में इसका संवाद कन्फ्यूशियस और ताओ परम्पराओं से हुआ, जापान में ज़ेन (ध्यान) परम्परा विकसित हुई और तिब्बत में दर्शन तथा साधना का अद्वितीय समन्वय देखने को मिलता है। इस प्रकार बौद्ध धर्म ने प्रत्येक क्षेत्र की सांस्कृतिक विशेषताओं को आत्मसात करते हुए अपनी मूल भावना को जीवित रखा।

आधुनिक सन्दर्भ

आज वैश्विक स्तर पर बौद्ध धर्म की इन तीनों परम्पराओं का अध्ययन केवल धार्मिक दृष्टि से नहीं, बल्कि दर्शन, मनोविज्ञान, नैतिकता, शान्ति-अध्ययन और चेतना-विज्ञान के सन्दर्भ में भी किया जा रहा है। यद्यपि उनके बाहरी रूप भिन्न हैं, परन्तु उनका साझा संदेश आज भी वही हैसजगता, करुणा, आत्म-अनुशासन और प्रज्ञा।

इन परम्पराओं का अध्ययन हमें यह भी सिखाता है कि कोई भी महान विचारधारा समय के साथ विकसित होती है। परिवर्तन के बावजूद यदि उसके मूल मूल्य सुरक्षित रहें, तो वह विभिन्न संस्कृतियों में भी जीवित रह सकती है। बौद्ध धर्म इसका उत्कृष्ट उदाहरण है।

मुख्य निष्कर्ष

  • बौद्ध धर्म की तीन प्रमुख परम्पराएँ हैंथेरवाद, महायान और वज्रयान।
  • तीनों की मूल शिक्षाएँ समान हैं, किन्तु साधना और दार्शनिक व्याख्या में भिन्नता है।
  • थेरवाद अर्हत आदर्श, महायान बोधिसत्त्व आदर्श और वज्रयान तान्त्रिक साधना पर बल देता है।
  • इन परम्पराओं ने बौद्ध धर्म को विश्वव्यापी स्वरूप प्रदान किया।
  • विविधता के बावजूद करुणा, प्रज्ञा और दुःख-निरोध इन सभी का साझा लक्ष्य है।

 आज के सन्दर्भ में विचारणीय प्रश्न

  • क्या किसी परम्परा का विकास उसके मूल सिद्धान्तों से विचलन है, या समयानुकूल विस्तार?
  • क्या विविध साधना-पद्धतियाँ एक ही लक्ष्य तक पहुँचने के अलग-अलग मार्ग हो सकती हैं?
  • क्या करुणा और प्रज्ञा का समन्वय आधुनिक मानव सभ्यता की भी आवश्यकता है?
  • क्या सांस्कृतिक विविधता किसी दर्शन को अधिक जीवंत बना सकती है?

 अगले अध्याय की भूमिका

बौद्ध धर्म के विकास के साथ अनेक दार्शनिक विद्यालय भी अस्तित्व में आए। इनमें वैभाषिक, सौत्रान्तिक, योगाचार और माध्यमिक विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण हैं। अगले अध्याय में हम इन प्रमुख बौद्ध दार्शनिक सम्प्रदायों के सिद्धान्तों और भारतीय दर्शन में उनके योगदान का अध्ययन करेंगे।

मुकेश श्रीवास्तव
(आत्मसन्तुलन आध्यात्मिक ऊर्जा केंद्र)

इस ब्लॉग के सभी लेख लेखक के मौलिक अध्ययन, दार्शनिक चिंतन एवं शोध-आधारित लेखन पर आधारित हैं। उचित संदर्भ के साथ उद्धृत किया जा सकता है।

 

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