दर्शन - बौद्ध दर्शन भाग–19 अध्याय–13 : प्रमुख बौद्ध दार्शनिक सम्प्रदाय —
ग्रंथ : भारतीय दर्शन श्रृंखला
दर्शन -
बौद्ध दर्शन भाग–19
अध्याय–13 : प्रमुख बौद्ध दार्शनिक सम्प्रदाय — विचारों का विकास और दार्शनिक परिपक्वता
बुद्ध
ने स्वयं किसी जटिल दार्शनिक
तंत्र की रचना नहीं
की। उनकी शिक्षा का
केन्द्र था—दुःख, उसका
कारण, उसका निरोध और
मुक्ति का मार्ग। किन्तु
बुद्ध के महापरिनिर्वाण के
बाद जब उनके उपदेशों
का गहन अध्ययन और
विश्लेषण हुआ, तब बौद्ध
दर्शन के भीतर अनेक
दार्शनिक परम्पराएँ विकसित हुईं। इनका उद्देश्य बुद्ध
की शिक्षाओं का खण्डन करना
नहीं था, बल्कि उनके
गूढ़ अर्थों को अधिक स्पष्ट
करना था।
भारतीय
बौद्ध दर्शन में चार प्रमुख
दार्शनिक सम्प्रदाय विशेष रूप से उल्लेखनीय
हैं—
- वैभाषिक
- सौत्रान्तिक
- योगाचार
(विज्ञानवाद)
- माध्यमिक
(शून्यवाद)
इन
चारों सम्प्रदायों ने ज्ञान, वस्तु,
चेतना, वास्तविकता और मुक्ति के
प्रश्नों पर गहन चिन्तन
किया। भारतीय दर्शन के इतिहास में
इनका प्रभाव अत्यन्त व्यापक रहा।
1. वैभाषिक
वैभाषिक
सम्प्रदाय सर्वास्तिवाद परम्परा से सम्बद्ध माना
जाता है। इसके अनुसार
बाह्य जगत का अस्तित्व
वास्तविक है और धर्म
(वास्तविक तत्त्व) तीनों कालों—भूत, वर्तमान और
भविष्य—में किसी-न-किसी रूप में
विद्यमान रहते हैं। इसलिए
इसे यथार्थवादी (Realist) दृष्टिकोण माना जाता है।
इस
सम्प्रदाय ने बौद्ध अभिधर्म
साहित्य के विकास में
महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। वस्तुओं के सूक्ष्म विश्लेषण
तथा मानसिक अवस्थाओं के वर्गीकरण में
इसकी विशेष रुचि थी।
2. सौत्रान्तिक
सौत्रान्तिक
परम्परा ने अभिधर्म की
अपेक्षा बुद्ध के मूल सूत्रों
(सूत्र-पिटक) को अधिक प्रमाण
माना। इसी कारण इसका
नाम "सौत्रान्तिक" पड़ा।
इस
सम्प्रदाय के अनुसार बाहरी
वस्तुओं का अस्तित्व स्वीकार
किया जा सकता है,
किन्तु उनका ज्ञान प्रत्यक्ष
रूप से नहीं, बल्कि
मानसिक प्रतिनिधित्व
(Representation) के माध्यम से प्राप्त होता
है। इसलिए इसे आलोचनात्मक यथार्थवाद
(Critical Realism) के निकट माना जाता
है।
सौत्रान्तिकों
ने अनुभव और प्रत्यक्ष ज्ञान
की समस्या पर विशेष बल
दिया तथा बौद्ध ज्ञानमीमांसा
के विकास में महत्त्वपूर्ण योगदान
दिया।
3. योगाचार (विज्ञानवाद)
योगाचार
सम्प्रदाय का विकास मुख्यतः
असंग और वसुबन्धु जैसे महान आचार्यों
ने किया। इसका मुख्य सिद्धान्त
है— "विज्ञप्ति मात्र" अथवा "चित्त मात्र"।
इसका
आशय यह नहीं कि
बाह्य संसार का पूर्ण निषेध
कर दिया जाए, बल्कि
यह कि हम संसार
का अनुभव सदैव चेतना के
माध्यम से करते हैं।
इसलिए चेतना का विश्लेषण सबसे
अधिक महत्त्वपूर्ण है।
योगाचार
ने आलय-विज्ञान (Storehouse
Consciousness) की अवधारणा प्रस्तुत की। इसके अनुसार
पूर्व अनुभवों और कर्मों के
संस्कार चेतना के गहरे स्तर
पर बीज के रूप
में संचित रहते हैं और
अवसर मिलने पर फलित होते
हैं। इस सिद्धान्त ने
बौद्ध मनोविज्ञान और साधना-विज्ञान
को अत्यन्त समृद्ध किया।
4. माध्यमिक (शून्यवाद)
बौद्ध
दर्शन की सबसे प्रभावशाली
दार्शनिक परम्पराओं में माध्यमिक का स्थान सर्वोपरि
है। इसके प्रवर्तक महान
दार्शनिक आचार्य नागार्जुन थे। उन्होंने "माध्यमिक
कारिका" में बौद्ध दर्शन
की गहन दार्शनिक व्याख्या
प्रस्तुत की।
माध्यमिक
का केन्द्रीय सिद्धान्त है—शून्यता (शून्यता)।
यहाँ
शून्यता का अर्थ "कुछ
भी नहीं" नहीं है। इसका
अर्थ है कि कोई
भी वस्तु स्वतंत्र, स्वभावतः विद्यमान और पूर्णतः आत्मनिर्भर
नहीं है। प्रत्येक वस्तु
प्रतीत्यसमुत्पाद के कारण अन्य
वस्तुओं पर निर्भर है।
इसलिए उसकी स्वतंत्र सत्ता
नहीं है।
नागार्जुन
ने स्पष्ट किया कि प्रतीत्यसमुत्पाद
और शून्यता एक ही सत्य के दो रूप हैं। जो वस्तु कारणों
पर निर्भर है, वह स्वभावतः
स्वतंत्र नहीं हो सकती।
इस प्रकार शून्यता नास्तिकता या शून्यवाद नहीं,
बल्कि परस्पर निर्भरता की दार्शनिक व्याख्या
है।
भारतीय
दर्शन पर प्रभाव
इन
चारों सम्प्रदायों ने केवल बौद्ध
परम्परा को ही नहीं,
बल्कि सम्पूर्ण भारतीय दर्शन को प्रभावित किया।
न्याय, वेदान्त, मीमांसा और जैन दर्शन
के अनेक आचार्यों ने
इनके साथ गम्भीर दार्शनिक
संवाद किया। विशेष रूप से नागार्जुन
के तर्कों ने भारतीय दार्शनिक
परम्परा को नई दिशा
दी।
आदि
शंकराचार्य, कुमारिल भट्ट, उदयनाचार्य तथा अनेक अन्य
दार्शनिकों ने बौद्ध विचारों
का विस्तृत परीक्षण किया। इस प्रकार भारतीय
दर्शन का विकास निरन्तर
शास्त्रार्थ, संवाद और समालोचना के
माध्यम से हुआ।
आधुनिक
सन्दर्भ
आज
इन बौद्ध सम्प्रदायों का अध्ययन केवल
ऐतिहासिक दृष्टि से नहीं किया
जाता। चेतना, ज्ञान, भाषा, वास्तविकता और अनुभव जैसे
प्रश्न आज भी आधुनिक
दर्शन, संज्ञान-विज्ञान (Cognitive Science) और मनोविज्ञान में
महत्त्वपूर्ण हैं। विशेष रूप
से माध्यमिक और योगाचार के
विचार विश्व के अनेक विश्वविद्यालयों
में समकालीन दार्शनिक विमर्श का विषय बने
हुए हैं।
इन
सम्प्रदायों का सबसे बड़ा
योगदान यह है कि
इन्होंने यह सिद्ध किया
कि बौद्ध धर्म केवल नैतिक
उपदेशों का संग्रह नहीं,
बल्कि अत्यन्त विकसित और सूक्ष्म दार्शनिक
परम्परा भी है।
मुख्य
निष्कर्ष
- बुद्ध
के उपदेशों की व्याख्या से अनेक दार्शनिक सम्प्रदाय विकसित हुए।
- वैभाषिक
और सौत्रान्तिक मुख्यतः ज्ञान और बाह्य जगत के प्रश्नों पर केन्द्रित रहे।
- योगाचार
ने चेतना और आलय-विज्ञान की अवधारणा विकसित की।
- माध्यमिक
ने शून्यता और प्रतीत्यसमुत्पाद की गहन दार्शनिक व्याख्या प्रस्तुत की।
- इन
सम्प्रदायों ने सम्पूर्ण भारतीय दर्शन और वैश्विक दार्शनिक चिन्तन को प्रभावित किया।
आज
के सन्दर्भ में विचारणीय प्रश्न
- क्या
वास्तविकता वही है जो हमें दिखाई देती है, या वह हमारी चेतना से भी प्रभावित होती है?
- क्या
शून्यता का अर्थ अभाव है, या परस्पर निर्भरता?
- क्या
दार्शनिक मतभेद किसी परम्परा को कमजोर करते हैं, या उसे अधिक समृद्ध बनाते हैं?
- क्या
आधुनिक चेतना-विज्ञान बौद्ध दर्शन से कुछ सीख सकता है?
अगले
अध्याय की भूमिका
बौद्ध
दर्शन ने केवल भारत
के धार्मिक जीवन को ही
नहीं, बल्कि एशिया की संस्कृति, कला,
शिक्षा, राजनीति, नैतिकता और आधुनिक वैश्विक
चिन्तन को भी गहराई
से प्रभावित किया। अगले अध्याय में
हम बौद्ध दर्शन के भारतीय एवं वैश्विक प्रभाव का समग्र अध्ययन
करेंगे।
मुकेशश्रीवास्तव
(आत्मसन्तुलन
आध्यात्मिक ऊर्जा केंद्र)
इस
ब्लॉग के सभी लेख लेखक के मौलिक अध्ययन, दार्शनिक चिंतन एवं शोध-आधारित लेखन पर आधारित हैं। उचित संदर्भ के साथ उद्धृत किया जा सकता है।
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