दर्शन — भाग–1 : रामानुजाचार्य का जीवन, युग और विशिष्टाद्वैत का उद्भव
रामानुज का विशिष्टाद्वैत — इतिहास, दर्शन, भक्ति और आधुनिक चिन्तन के आलोक में समग्र अध्ययन
दर्शन
— भाग–1 : रामानुजाचार्य का जीवन, युग और विशिष्टाद्वैत का उद्भव
भारतीय
दर्शन का इतिहास केवल
सिद्धान्तों का इतिहास नहीं
है; वह उन महापुरुषों
की चेतना का इतिहास भी
है जिन्होंने अपने समय के
प्रश्नों का उत्तर अपने
अनुभव, अध्ययन और साधना से
दिया। आदि शंकराचार्य ने
अद्वैत वेदान्त को दार्शनिक ऊँचाइयों
तक पहुँचाया, किन्तु उनके पश्चात् एक
ऐसा प्रश्न सामने आया जिसने अनेक
साधकों को उद्वेलित किया—यदि केवल निर्गुण
ब्रह्म ही सत्य है
और जगत अन्ततः मिथ्या
है, तो भक्त किसकी
उपासना करे? ईश्वर, जीव
और संसार का वास्तविक सम्बन्ध
क्या है? क्या प्रेम,
भक्ति और ईश्वर की
कृपा केवल साधन हैं,
या वे स्वयं परम
सत्य का अंग हैं?
इन्हीं
प्रश्नों की पृष्ठभूमि में
रामानुजाचार्य का विशिष्टाद्वैत दर्शन
विकसित हुआ। यह केवल
शंकर के अद्वैत का
प्रतिवाद नहीं था, बल्कि
वेदान्त की ऐसी पुनर्व्याख्या
थी जिसमें तर्क और भक्ति,
ज्ञान और अनुग्रह, ईश्वर
और जीव, एकत्व और
भिन्नता—सभी को समन्वित
स्थान मिला।
ऐतिहासिक
पृष्ठभूमि
ग्यारहवीं–बारहवीं शताब्दी का दक्षिण भारत
धार्मिक, सांस्कृतिक और दार्शनिक दृष्टि
से अत्यन्त समृद्ध था। चोल, पाण्ड्य
और होयसाल जैसे शक्तिशाली राजवंशों
के संरक्षण में मंदिर केवल
पूजा के केन्द्र नहीं
थे, बल्कि शिक्षा, संगीत, नृत्य, दर्शन और सामाजिक जीवन
के भी केन्द्र थे।
इसी
काल में शैव, वैष्णव,
जैन और बौद्ध परम्पराएँ
परस्पर संवाद और शास्त्रार्थ में
सक्रिय थीं। वेदान्त की
विभिन्न व्याख्याएँ भी आकार ले
रही थीं। अद्वैत वेदान्त
विद्वानों के बीच प्रतिष्ठित
हो चुका था, परन्तु
भक्ति की जनधारा भी
समान रूप से प्रबल
थी।
दक्षिण
भारत के आलवार संतों
ने भगवान विष्णु के प्रति प्रेम
और शरणागति का जो भाव
जगाया, उसने दर्शन को
केवल बौद्धिक अभ्यास न रहने देकर
जीवन का अनुभव बना
दिया। यही सांस्कृतिक वातावरण
आगे चलकर श्रीवैष्णव सम्प्रदाय
की आधारभूमि बना।
रामानुजाचार्य
का जन्म और प्रारम्भिक जीवन
परम्परा
के अनुसार रामानुजाचार्य का जन्म 1017 ईस्वी
में तमिलनाडु के श्रीपेरुम्बुदूर में
हुआ। उनके पिता का
नाम केशव सोमयाजी तथा
माता का नाम कान्तिमती
था। परिवार वैदिक परम्परा का अनुयायी था,
अतः बाल्यकाल से ही उन्हें
संस्कृत, वेद, मीमांसा और
दर्शन का अध्ययन प्राप्त
हुआ।
असाधारण
प्रतिभा के कारण वे
शीघ्र ही प्रसिद्ध हो
गए। आगे की शिक्षा
के लिए वे कांचीपुरम्
पहुँचे, जो उस समय
दक्षिण भारत का प्रमुख
दार्शनिक केन्द्र था।
यदवप्रकाश
के साथ अध्ययन
कांचीपुरम्
में रामानुज ने प्रसिद्ध अद्वैताचार्य
यदवप्रकाश के अधीन अध्ययन
किया।
यहीं
उनके जीवन का पहला
महत्त्वपूर्ण दार्शनिक मोड़ आया।
उपनिषदों
की व्याख्या करते समय गुरु
और शिष्य के बीच बार-बार मतभेद उत्पन्न
होने लगे। जहाँ यदवप्रकाश
अद्वैत की दृष्टि से
निर्गुण ब्रह्म की व्याख्या करते
थे, वहीं रामानुज को
अनेक मन्त्रों में ईश्वर के
दिव्य, सगुण और करुणामय
स्वरूप का बोध अधिक
स्वाभाविक प्रतीत होता था।
इन
मतभेदों का कारण केवल
विचारों का विरोध नहीं
था, बल्कि शास्त्र की व्याख्या की
दो भिन्न पद्धतियाँ थीं। रामानुज को
अनुभव हुआ कि उपनिषदों
में वर्णित ब्रह्म को केवल निराकार
और निर्गुण मान लेने से
अनेक वाक्यों का स्वाभाविक अर्थ
बाधित होता है।
यही
असहमति आगे चलकर विशिष्टाद्वैत
दर्शन की दार्शनिक दिशा
का प्रारम्भिक बीज बनी।
यामुनाचार्य
का प्रभाव
यद्यपि
रामानुज का यामुनाचार्य से
प्रत्यक्ष दीर्घकालीन संवाद नहीं हुआ, फिर
भी उनके विचारों का
प्रभाव अत्यन्त गहरा था।
यामुनाचार्य
ने वेदान्त की वैष्णव व्याख्या
की आधारभूमि तैयार की थी। उन्होंने
ईश्वर, जीव और जगत
की वास्तविकता पर बल देते
हुए भक्ति और ईश्वर-कृपा
को मुक्ति का अनिवार्य साधन
माना।
परम्परा
में वर्णित है कि जब
रामानुज श्रीरंगम् पहुँचे, तब तक यामुनाचार्य
का देहावसान हो चुका था।
कहा जाता है कि
उनके पार्थिव शरीर की तीन
मुड़ी हुई उँगलियों को
देखकर रामानुज ने तीन प्रतिज्ञाएँ
कीं—
- ब्रह्मसूत्र पर वैष्णव भाष्य लिखेंगे।
- विष्णुसहस्रनाम की प्रतिष्ठा करेंगे।
- महर्षि पराशर की परम्परा का सम्मान करेंगे।
इन प्रतिज्ञाओं को बाद की
परम्परा ने उनके जीवन-कार्य का प्रतीक माना।
श्रीवैष्णव
परम्परा का संगठन
रामानुजाचार्य
का योगदान केवल दार्शनिक नहीं
था; वे एक महान
संगठनकर्ता भी थे।
उन्होंने
श्रीवैष्णव परम्परा को सुव्यवस्थित स्वरूप
दिया। संस्कृत की वैदिक परम्परा
और तमिल आलवार संतों
की भक्तिधारा के बीच उन्होंने
अद्भुत समन्वय स्थापित किया।
उन्होंने
यह प्रतिपादित किया कि वेद
और दिव्यप्रबन्धम् दोनों ईश्वर की ओर ले
जाने वाले प्रामाणिक मार्ग
हैं। इस प्रकार ज्ञान
और भक्ति के बीच कृत्रिम
विभाजन को समाप्त करने
का प्रयास किया गया।
शंकर
के बाद का वैदान्तिक परिदृश्य
आदि
शंकराचार्य के अद्वैत ने
वेदान्त को गहन तर्कशास्त्रीय
आधार प्रदान किया। परन्तु समय के साथ
कुछ प्रश्न और अधिक प्रबल
होकर सामने आए—
- यदि जगत मिथ्या है तो धर्म और नैतिकता का आधार क्या है?
- यदि जीव और ब्रह्म में पूर्ण अभेद है तो भक्ति का वास्तविक अर्थ क्या होगा?
- यदि परम सत्य निर्गुण है तो उपनिषदों में वर्णित ईश्वर के अनन्त कल्याण गुणों का क्या अर्थ है?
- क्या व्यक्तिगत ईश्वर केवल साधना का साधन है या स्वयं परम सत्य?
रामानुजाचार्य
ने इन प्रश्नों का
उत्तर अद्वैत का पूर्ण निषेध
करके नहीं, बल्कि उसकी पुनर्व्याख्या करके
दिया। उन्होंने कहा कि ब्रह्म
एक ही है, किन्तु
वह चित् और अचित्
से विशिष्ट है। इस प्रकार
एकत्व भी सुरक्षित रहता
है और विविधता भी
वास्तविक मानी जाती है।
विशिष्टाद्वैत
की आवश्यकता क्यों पड़ी?
विशिष्टाद्वैत
का उद्भव केवल दार्शनिक विवाद
का परिणाम नहीं था।
इसके
पीछे अनेक गहरे कारण
थे—
पहला,
शास्त्रों की ऐसी व्याख्या
प्रस्तुत करना जो उपनिषद्,
गीता और ब्रह्मसूत्र—तीनों
के समन्वय से निर्मित हो।
दूसरा,
भक्ति को केवल प्रारम्भिक
साधना न मानकर मुक्ति
का वास्तविक मार्ग स्थापित करना।
तीसरा,
ईश्वर, जीव और जगत—तीनों की वास्तविक सत्ता
को स्वीकार करना।
चौथा,
दर्शन को केवल विद्वानों
तक सीमित न रखकर सामान्य
भक्त के जीवन से
जोड़ना।
पाँचवाँ,
ईश्वर की कृपा (अनुग्रह)
और शरणागति (प्रपत्ति) को आध्यात्मिक साधना
का केन्द्रीय तत्व बनाना।
इसी
कारण विशिष्टाद्वैत भारतीय दर्शन में केवल एक
नया मत नहीं, बल्कि
वेदान्त की एक वैकल्पिक
और समन्वयकारी व्याख्या बनकर उभरा।
रामानुजाचार्य
का दार्शनिक व्यक्तित्व
रामानुजाचार्य
केवल तर्कशास्त्री नहीं थे और
केवल भक्त भी नहीं
थे। उनके व्यक्तित्व में
दार्शनिक गहराई, आध्यात्मिक अनुभव, संगठन क्षमता और सामाजिक संवेदनशीलता
का अद्भुत समन्वय दिखाई देता है।
उन्होंने
दर्शन को जीवन से
जोड़ा। उनके लिए ईश्वर
केवल विचार का विषय नहीं,
बल्कि जीवित अनुभव का केन्द्र था;
भक्ति केवल भावना नहीं,
बल्कि तत्त्वज्ञान से पुष्ट आध्यात्मिक
अनुशासन थी।
इसी
कारण उनका दर्शन आज
भी केवल मंदिरों या
मठों तक सीमित नहीं
है, बल्कि धर्म-दर्शन, तुलनात्मक
दर्शन, चेतना-अध्ययन और धार्मिक बहुलता
(Religious Pluralism) के
समकालीन विमर्शों में भी प्रासंगिक
बना हुआ है।
मुख्य
निष्कर्ष
- रामानुजाचार्य ने वेदान्त की ऐसी व्याख्या प्रस्तुत की जिसमें ज्ञान और भक्ति का समन्वय हुआ।
- उनका दर्शन दक्षिण भारत की वैष्णव भक्ति परम्परा और वैदिक वेदान्त का संगम है।
- यामुनाचार्य की वैचारिक परम्परा ने विशिष्टाद्वैत की आधारभूमि तैयार की।
- शंकर के अद्वैत के बाद उत्पन्न दार्शनिक प्रश्नों के उत्तर के रूप में विशिष्टाद्वैत का विकास हुआ।
- श्रीवैष्णव सम्प्रदाय के संगठन और विस्तार में रामानुजाचार्य की भूमिका ऐतिहासिक रूप से अत्यन्त महत्त्वपूर्ण रही।
- विशिष्टाद्वैत का उद्देश्य केवल दार्शनिक प्रतिपादन नहीं, बल्कि ईश्वर, जीव और जगत के सम्बन्ध को जीवनोपयोगी रूप में समझाना था।
आज
के सन्दर्भ में विचारणीय प्रश्न
- क्या दर्शन केवल बौद्धिक चिन्तन है, या वह जीवन और साधना का मार्ग भी होना चाहिए?
- क्या भक्ति और तर्क एक-दूसरे के विरोधी हैं, अथवा वे परस्पर पूरक हो सकते हैं?
- यदि जगत वास्तविक है, तो पर्यावरण, समाज और नैतिक उत्तरदायित्व के प्रति हमारी दृष्टि कैसी होनी चाहिए?
- क्या आधुनिक मनुष्य के लिए ईश्वर की "कृपा" और "शरणागति" जैसी अवधारणाओं का कोई दार्शनिक अर्थ आज भी सम्भव है?
अगले
भाग की भूमिका
इस
प्रथम भाग में हमने
रामानुजाचार्य के जीवन, उनके
युग और विशिष्टाद्वैत के
उद्भव की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
को समझा। अगले भाग में
हम स्वयं "विशिष्टाद्वैत" शब्द के दार्शनिक
अर्थ का विश्लेषण करेंगे।
"विशिष्ट" और "अद्वैत" दोनों शब्दों की व्युत्पत्ति, ब्रह्म
की विशिष्टता, एकत्व और भेद का
समन्वय तथा विशिष्टाद्वैत की
मूल तात्त्विक संरचना का क्रमबद्ध अध्ययन
किया जाएगा। इतिहास की चर्चा वहाँ
पुनः नहीं होगी; पूरा
ध्यान दर्शन के मूल सिद्धान्तों
पर केन्द्रित रहेगा।
मुकेश
श्रीवास्तव
(आत्मसन्तुलन
आध्यात्मिक ऊर्जा केंद्र)
(IS BLOG KE SABHEE LEKH BLOG HOLDER KEE PERMMISSION KE
BINA KAHEE BHEE ULLEKH KARNE KEE ANUMATI NAHEE HAI)
Comments
Post a Comment