दर्शन — मध्वाचार्य का द्वैत दर्शन- भाग–1 : मध्वाचार्य का जीवन, युग और द्वैत दर्शन का उद्भव
मध्वाचार्य का द्वैत दर्शन — इतिहास, तत्त्वमीमांसा, भक्ति, तर्क और आधुनिक चिन्तन के आलोक में समग्र अध्ययन
दर्शन
— भाग–1 : मध्वाचार्य का जीवन, युग और द्वैत दर्शन का उद्भव
भारतीय
दर्शन का इतिहास केवल
विचारों का इतिहास नहीं
है; यह उन सतत्
संवादों का इतिहास भी
है जिनमें प्रत्येक युग ने अपने
प्रश्नों के अनुरूप सत्य
की नई व्याख्या प्रस्तुत
की। उपनिषदों ने ब्रह्म और
आत्मा के रहस्य को
उद्घाटित किया, भगवद्गीता ने ज्ञान, कर्म
और भक्ति का समन्वय किया
तथा ब्रह्मसूत्र ने इन विविध
वैदिक शिक्षाओं को एक सूत्र
में पिरोने का प्रयास किया।
परन्तु इन मूल ग्रन्थों
की व्याख्या समय-समय पर
भिन्न दृष्टियों से हुई, जिनसे
वेदान्त के अनेक सम्प्रदाय
विकसित हुए।
आदि
शंकराचार्य ने अद्वैत वेदान्त
के माध्यम से ब्रह्म की
अद्वितीय सत्ता और जगत की
मायिकता का प्रतिपादन किया।
उनके पश्चात् रामानुजाचार्य ने विशिष्टाद्वैत का
प्रतिपादन करते हुए ब्रह्म,
जीव और जगत के
सम्बन्ध को एक विशिष्ट
एकत्व के रूप में
समझाया। इन्हीं दो महान् परम्पराओं
के बाद तेरहवीं शताब्दी
में एक ऐसे दार्शनिक
का उदय हुआ जिसने
स्पष्ट शब्दों में कहा कि
ईश्वर, जीव और जगत
का भेद केवल व्यवहारिक
नहीं, बल्कि शाश्वत और वास्तविक है।
यह दार्शनिक थे— श्रीमद् आनन्दतीर्थ भगवान् मध्वाचार्य, जिनके दर्शन को हम द्वैत
वेदान्त या तत्त्ववाद के नाम से
जानते हैं।
मध्वाचार्य
का दर्शन भारतीय वैदिक परम्परा के भीतर विकसित
एक स्वतंत्र वैदान्तिक दृष्टि है। इसकी विशेषता
केवल अद्वैत का खण्डन नहीं,
बल्कि एक ऐसे यथार्थवादी
दर्शन का प्रतिपादन है
जिसमें ईश्वर की पूर्ण स्वतंत्रता,
जीव की परतन्त्रता और
जगत की वास्तविकता को
समान रूप से स्वीकार
किया गया है। इस
कारण मध्वाचार्य भारतीय दर्शन के इतिहास में
केवल एक सम्प्रदाय-प्रवर्तक
नहीं, बल्कि यथार्थवाद के प्रमुख दार्शनिक
के रूप में भी
प्रतिष्ठित हैं।
ऐतिहासिक
पृष्ठभूमि : तेरहवीं शताब्दी का भारत
मध्वाचार्य
का समय लगभग तेरहवीं
शताब्दी ईस्वी माना जाता है।
यह काल भारतीय इतिहास
में अनेक प्रकार के
परिवर्तन का युग था।
राजनीतिक स्तर पर दक्षिण
भारत में होयसल, यादव
और अन्य क्षेत्रीय राजवंश
सक्रिय थे। उत्तर भारत
में तुर्क और दिल्ली सल्तनत
का प्रभाव बढ़ रहा था।
समाज में धार्मिक और
सांस्कृतिक विविधताएँ तीव्र थीं, तथा दार्शनिक
स्तर पर वेदान्त, न्याय,
मीमांसा, सांख्य, योग, बौद्ध और
जैन परम्पराएँ निरन्तर बौद्धिक संवाद में संलग्न थीं।
यह
वह समय भी था
जब भक्ति आन्दोलन विभिन्न क्षेत्रों में गति पकड़
रहा था। दक्षिण भारत
के आलवार और नयनार संतों
की परम्परा जनमानस में गहरी पैठ
बना चुकी थी। दार्शनिक
विमर्श केवल मठों और
विद्वानों तक सीमित नहीं
रह गया था; उसका
सम्बन्ध सामान्य भक्त, समाज और धार्मिक
जीवन से भी स्थापित
हो रहा था।
ऐसे
वातावरण में यह प्रश्न
अत्यन्त महत्वपूर्ण था कि ईश्वर
और मनुष्य का वास्तविक सम्बन्ध
क्या है? क्या जीव
अन्ततः ब्रह्म में विलीन हो
जाता है, या उसकी
अपनी स्वतंत्र पहचान बनी रहती है?
क्या यह जगत अन्तिम
सत्य है या केवल
एक आभास? मध्वाचार्य का सम्पूर्ण दर्शन
इन्हीं प्रश्नों के उत्तर के
रूप में विकसित होता
है।
मध्वाचार्य
का जीवन
मध्वाचार्य
का जन्म वर्तमान कर्नाटक
राज्य के पजक (Pajaka) ग्राम
में हुआ। परम्परा के
अनुसार उनका बाल्यकाल का
नाम वासुदेव था। उनके पिता
का नाम मध्यगेह भट्ट
तथा माता का नाम
वेदवती था। बाल्यकाल से
ही उनमें असाधारण बुद्धिमत्ता, शारीरिक सामर्थ्य और धार्मिक प्रवृत्ति
दिखाई देती थी।
कहा
जाता है कि वे
अल्पायु में ही वेद,
व्याकरण, मीमांसा तथा अन्य शास्त्रों
का अध्ययन करने लगे। यद्यपि
परम्परागत जीवन-वृत्तान्तों में
अनेक चमत्कारिक घटनाओं का भी वर्णन
मिलता है, किन्तु ऐतिहासिक
दृष्टि से अधिक महत्त्वपूर्ण
तथ्य यह है कि
उन्होंने प्रारम्भ से ही दार्शनिक
प्रश्नों पर स्वतंत्र चिन्तन
की प्रवृत्ति विकसित कर ली थी।
बाद
में उन्होंने संन्यास ग्रहण किया और अपने
गुरु अच्युतप्रेक्ष से वेदान्त का
अध्ययन किया। संन्यास के समय उन्हें
पूर्णप्रज्ञ नाम प्राप्त हुआ।
शास्त्रार्थों में अपनी अद्भुत
प्रतिभा के कारण वे
शीघ्र ही प्रसिद्ध हुए
और आगे चलकर आनन्दतीर्थ
नाम से विख्यात हुए।
"मध्वाचार्य"
नाम से वे सम्पूर्ण
भारत में प्रसिद्ध हुए।
उनके
जीवन का एक महत्त्वपूर्ण
पक्ष यह है कि
उन्होंने केवल ग्रन्थ-रचना
तक स्वयं को सीमित नहीं
रखा। उन्होंने व्यापक यात्राएँ कीं, अनेक विद्वानों
से शास्त्रार्थ किए, उत्तर भारत
तक गए, बदरिकाश्रम की
यात्रा की और अपने
दर्शन का प्रचार किया।
इस प्रकार उनका जीवन बौद्धिक
साधना और सामाजिक सक्रियता—दोनों का अद्भुत समन्वय
था।
गुरु-परम्परा और वैदिक आधार
मध्वाचार्य
ने स्वयं अपने दर्शन को
कोई नवीन मत नहीं
कहा। उनके अनुसार उनका
उद्देश्य वेद, उपनिषद्, भगवद्गीता
और ब्रह्मसूत्र के वास्तविक अभिप्राय
को स्पष्ट करना था। वे
अपनी परम्परा का सम्बन्ध स्वयं
भगवान् नारायण तथा वेदव्यास से
जोड़ते हैं। इसी कारण
उनके दर्शन में वेदव्यास का
स्थान अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है।
उनकी
रचनाओं में बार-बार
यह आग्रह दिखाई देता है कि
शास्त्र का अर्थ केवल
तर्क से नहीं, बल्कि
सम्पूर्ण वैदिक प्रमाणों के समन्वित अध्ययन
से समझा जाना चाहिए।
उनके लिए उपनिषद्, गीता
और ब्रह्मसूत्र वेदान्त के तीन प्रधान
आधार हैं, किन्तु महाभारत,
भागवत और अन्य पुराण
भी दार्शनिक प्रमाण के रूप में
महत्त्वपूर्ण हैं।
शंकर
और रामानुज के बाद का वैदान्तिक वातावरण
जब
मध्वाचार्य का उदय हुआ,
तब अद्वैत वेदान्त पूरे भारत में
अत्यन्त प्रभावशाली था। शंकराचार्य की
व्याख्या ने उपनिषदों के
अनेक महावाक्यों को अद्वैत के
आलोक में समझाया था।
दूसरी ओर, रामानुजाचार्य ने
विशिष्टाद्वैत के माध्यम से
भक्ति और ईश्वर की
सगुण सत्ता को दार्शनिक आधार
प्रदान किया।
मध्वाचार्य
ने इन दोनों परम्पराओं
का गंभीर अध्ययन किया। उन्होंने विशेष रूप से अद्वैत
की उस व्याख्या पर
प्रश्न उठाया जिसमें जीव और ब्रह्म
की अन्तिम अभिन्नता स्वीकार की जाती है।
उनके अनुसार यदि समस्त भेद
अन्ततः मिथ्या हैं, तो भक्ति,
नैतिक उत्तरदायित्व और ईश्वर की
सर्वोच्चता का वास्तविक आधार
दुर्बल पड़ जाता है।
यह
ध्यान देने योग्य है
कि मध्वाचार्य का उद्देश्य केवल
विरोध करना नहीं था।
वे एक ऐसे वैदान्तिक
प्रतिमान का निर्माण करना
चाहते थे जिसमें वैदिक
ग्रन्थों में वर्णित ईश्वर,
जीव और जगत की
विविधता को वास्तविक माना
जा सके।
द्वैत
दर्शन की आवश्यकता
प्रत्येक
दर्शन अपने समय के
प्रश्नों का उत्तर होता
है। मध्वाचार्य के लिए मुख्य
प्रश्न यह था कि
यदि संसार केवल आभास है,
तो मनुष्य के नैतिक कर्मों
का वास्तविक अर्थ क्या होगा?
यदि जीव अन्ततः ब्रह्म
ही है, तो भक्ति
का सम्बन्ध किसके प्रति होगा? यदि ईश्वर और
जीव में कोई वास्तविक
भेद नहीं है, तो
ईश्वर की सर्वोच्चता कैसे
सुरक्षित रहेगी?
मध्वाचार्य
ने इन प्रश्नों के
उत्तर में एक ऐसे
दर्शन का प्रतिपादन किया
जिसमें ईश्वर पूर्णतः स्वतंत्र सत्ता है और समस्त
जीव तथा जगत उस
पर निर्भर हैं। यहाँ निर्भरता
का अर्थ अस्तित्वहीनता नहीं,
बल्कि वास्तविक परतन्त्रता है। यही विचार
आगे चलकर उनके सम्पूर्ण
द्वैत दर्शन का आधार बनता
है।
इस
दर्शन का एक महत्त्वपूर्ण
पक्ष यह भी है
कि यह संसार को
नकारता नहीं, बल्कि उसे ईश्वर की
व्यवस्था के रूप में
स्वीकार करता है। इस
प्रकार आध्यात्मिकता संसार से पलायन नहीं,
बल्कि उसके यथार्थ स्वरूप
की समझ बन जाती
है।
उडुपी
परम्परा का प्रारम्भ
मध्वाचार्य
का नाम उडुपी से
अविच्छिन्न रूप से जुड़ा
हुआ है। परम्परा के
अनुसार उन्होंने उडुपी में श्रीकृष्ण की
विग्रह-प्रतिष्ठा की और वहाँ
वैष्णव साधना तथा वेदान्त अध्ययन
का एक सशक्त केन्द्र
स्थापित किया। आगे चलकर उन्होंने
अष्टमठ व्यवस्था की स्थापना की,
जिसके माध्यम से पूजा, अध्ययन
और परम्परा का उत्तरदायित्व क्रमशः
विभिन्न मठों को सौंपा
गया।
यह
व्यवस्था केवल धार्मिक संगठन
नहीं थी; यह ज्ञान,
अनुशासन और सामाजिक उत्तरदायित्व
का भी केन्द्र बनी।
उडुपी धीरे-धीरे द्वैत
वेदान्त का प्रमुख आध्यात्मिक
और बौद्धिक केन्द्र बन गया। आने
वाली शताब्दियों में अनेक आचार्यों
ने इसी परम्परा को
आगे बढ़ाया और दक्षिण भारत
से लेकर सम्पूर्ण देश
में इसका प्रभाव स्थापित
किया।
मध्वाचार्य
का दार्शनिक व्यक्तित्व
मध्वाचार्य
की विशेषता यह है कि
वे केवल भक्त नहीं,
केवल तर्कशास्त्री नहीं और केवल
वेदान्ती भी नहीं थे।
उनमें तीनों का अद्भुत समन्वय
दिखाई देता है। उनकी
रचनाएँ यह स्पष्ट करती
हैं कि उनके लिए
दर्शन केवल बौद्धिक अभ्यास
नहीं, बल्कि सत्य की खोज
का साधन था।
उनका
आग्रह था कि शास्त्र,
तर्क और अनुभव—तीनों
का समुचित उपयोग किया जाए। वे
प्रमाणों की चर्चा करते
हैं, विरोधी मतों का विश्लेषण
करते हैं और फिर
अपने निष्कर्ष प्रस्तुत करते हैं। इसी
कारण उनका दर्शन केवल
सम्प्रदायगत साहित्य नहीं, बल्कि भारतीय दार्शनिक परम्परा का एक गंभीर
अध्याय है।
उनकी
प्रमुख रचनाओं में ब्रह्मसूत्रभाष्य, अनुव्याख्यान, भगवद्गीताभाष्य, महाभारत तात्पर्यनिर्णय, भागवत तात्पर्यनिर्णय, तत्त्वोद्योत और तत्त्वविवेक विशेष रूप से उल्लेखनीय
हैं। इन ग्रन्थों के
माध्यम से उन्होंने अपने
सम्पूर्ण दार्शनिक तन्त्र का निर्माण किया,
जिसका विस्तार आगामी भागों में क्रमशः समझा
जाएगा।
मुख्य
निष्कर्ष
मध्वाचार्य
का उदय भारतीय दर्शन
के उस ऐतिहासिक चरण
में हुआ जब वेदान्त
की विविध व्याख्याएँ अपने चरम पर
थीं। उन्होंने शास्त्रीय प्रमाणों के आधार पर
ईश्वर, जीव और जगत
के वास्तविक भेद को स्वीकार
करते हुए एक सुसंगत
यथार्थवादी वेदान्त का प्रतिपादन किया।
उनका जीवन केवल दार्शनिक
चिन्तन तक सीमित नहीं
रहा, बल्कि उन्होंने उडुपी परम्परा, अष्टमठ व्यवस्था और वैष्णव साधना
के माध्यम से एक जीवित
आध्यात्मिक परम्परा की स्थापना की।
इस प्रकार मध्वाचार्य भारतीय दर्शन में एक ऐसे
आचार्य के रूप में
प्रतिष्ठित होते हैं जिन्होंने
वेदान्त को भक्ति, तर्क
और यथार्थवाद के अद्वितीय समन्वय
से समृद्ध किया।
आज
के सन्दर्भ में विचारणीय प्रश्न
- क्या आध्यात्मिक जीवन के लिए ईश्वर और जीव का वास्तविक भेद आवश्यक है, या अद्वैत की अभिन्नता भी समान रूप से पर्याप्त है?
- यदि जगत वास्तविक है, तो पर्यावरण, समाज और नैतिक उत्तरदायित्व के प्रति हमारी दार्शनिक दृष्टि किस प्रकार बदलती है?
- क्या आधुनिक चेतना-अध्ययन (Consciousness
Studies) में मध्वाचार्य के यथार्थवाद से कोई सार्थक संवाद स्थापित किया जा सकता है?
- क्या भारतीय दर्शन का इतिहास परस्पर विरोधी मतों का इतिहास है, या सत्य की विभिन्न व्याख्याओं का निरन्तर संवाद?
अगले
भाग की भूमिका
इस प्रथम भाग में हमने
उस ऐतिहासिक और बौद्धिक पृष्ठभूमि
को समझा जिसके भीतर
मध्वाचार्य का द्वैत वेदान्त
विकसित हुआ। किन्तु अभी
तक हमने केवल उसके
उद्भव की चर्चा की
है; उसके वास्तविक दार्शनिक
स्वरूप का विश्लेषण शेष
है। अगले भाग में
हम यह जानेंगे कि
"द्वैत"
वास्तव में क्या है।
क्या यह केवल ईश्वर
और जीव के बीच
भेद का सिद्धान्त है,
या इससे कहीं अधिक
व्यापक दार्शनिक तन्त्र? "स्वतंत्र" और "परतंत्र" सत्ता का क्या अर्थ
है? मध्वाचार्य यथार्थवाद (Realism) की स्थापना किस
प्रकार करते हैं, और
वेदान्त की अन्य परम्पराओं
के बीच उनका स्थान
कैसे निर्धारित होता है? इन
प्रश्नों के माध्यम से
हम द्वैत दर्शन के मूल सिद्धान्तों
की व्यवस्थित यात्रा आरम्भ करेंगे।
मुकेश
श्रीवास्तव
(आत्मसन्तुलन
आध्यात्मिक ऊर्जा केंद्र)
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