महाभारत - अध्याय 2.2 इतिहास, आख्यान और पुराण : भारतीय परंपरा में भेद और संबंध
अध्याय 2.1 में हमने यह स्थापित किया कि Itihāsa को सीधे modern History का पर्याय नहीं बनाया जा सकता। अब अगला कदम यह देखना है कि भारतीय परंपरा में इतिहास, आख्यान और पुराण किस प्रकार अलग-अलग अर्थ-क्षेत्र रखते हैं और महाभारत इनके साथ किस प्रकार संबंध बनाता है।
अध्याय 2.2
इतिहास, आख्यान और पुराण : भारतीय परंपरा में भेद और संबंध
1. प्रश्न की आवश्यकता
यदि महाभारत को भारतीय परंपरा इतिहास कहती है, तो अगला स्वाभाविक प्रश्न है— इतिहास और आख्यान में क्या अंतर है?
और उससे भी आगे— पुराण का इतिहास से क्या संबंध है?
यह प्रश्न केवल शब्दों का वर्गीकरण नहीं है।
इसके पीछे एक बड़ा ज्ञानमीमांसक प्रश्न छिपा है—
भारतीय परंपरा अतीत को जानने और बताने के कितने अलग-अलग तरीके स्वीकार करती थी?
महाभारत का स्वरूप इसी प्रश्न के उत्तर में अधिक स्पष्ट होने लगता है।
क्योंकि महाभारत में हमें एक साथ—
वंशावली मिलती है, राजाओं की कथाएँ मिलती हैं, युद्ध और राजनीतिक संघर्ष मिलते हैं, ऋषियों के आख्यान मिलते हैं, उपाख्यान मिलते हैं, धर्मोपदेश मिलते हैं, और सृष्टि तथा प्राचीन परंपराओं से जुड़े प्रसंग भी मिलते हैं।
अतः इसे समझने के लिए भारतीय आख्यान-परंपरा की अपनी शब्दावली को समझना आवश्यक है।
“आख्यान” : केवल कहानी नहीं
आधुनिक हिंदी में “आख्यान” शब्द का सामान्य अर्थ कहानी या कथा जैसा लिया जा सकता है।
लेकिन संस्कृत साहित्यिक परंपरा में आख्यान का क्षेत्र इससे अधिक विशिष्ट और व्यापक है।
आख्यान किसी घटना, चरित्र या प्रसंग को कथात्मक रूप में प्रस्तुत करता है।
उसका उद्देश्य केवल सूचना देना नहीं होता।
वह किसी अनुभव को— कथा के माध्यम से अर्थपूर्ण बनाता है।
इसीलिए आख्यान में घटना और उसका अर्थ अलग नहीं रहते।
महाभारत में अनेक बार कोई पात्र किसी कठिन परिस्थिति में होता है और उसके सामने किसी पूर्व घटना की कथा रखी जाती है।
वह पुरानी कथा वर्तमान समस्या पर प्रकाश डालती है।
इस प्रकार आख्यान— स्मृति को वर्तमान के प्रश्न से जोड़ने का माध्यम
बन जाता है।
उपाख्यान : कथा के भीतर दूसरी कथा
महाभारत की सबसे विशिष्ट संरचनात्मक विशेषताओं में से एक है— कथा के भीतर कथा।
मुख्य कथा चल रही है और उसके भीतर कोई पात्र किसी दूसरी कथा को सुनाता है।
फिर उस दूसरी कथा के भीतर भी कोई प्रसंग आ सकता है।
यह केवल साहित्यिक कौशल नहीं।
इसका एक गंभीर बौद्धिक प्रयोजन है।
किसी वर्तमान संकट को समझाने के लिए अतीत से उदाहरण लिया जाता है।
नल-दमयन्ती की कथा युधिष्ठिर के संदर्भ में आती है।
सावित्री की कथा स्त्री-धैर्य और जीवन-मृत्यु के प्रश्नों के संदर्भ में अर्थ ग्रहण करती है।
यक्ष-प्रश्न एक विशिष्ट परिस्थिति में युधिष्ठिर के विवेक की परीक्षा बनता है।
अर्थात् उपाख्यान मुख्य कथा से अलग कोई सजावटी सामग्री नहीं।
वह मुख्य कथा की— व्याख्या भी करता है।
इतिहास और आख्यान : क्या दोनों विरोधी हैं? -नहीं।
यहाँ आधुनिक दृष्टि कभी-कभी अनावश्यक विरोध खड़ा कर देती है।
हम मान लेते हैं— इतिहास = तथ्य - आख्यान = कहानी
और फिर दोनों को परस्पर विरोधी समझ लेते हैं।
लेकिन किसी ऐतिहासिक स्मृति को कथा के रूप में प्रस्तुत किया जाना उसे स्वतः निरर्थक नहीं बना देता।
कथा का स्वरूप और ऐतिहासिकता का प्रश्न दो अलग प्रश्न हैं।
किसी आख्यान में— ऐतिहासिक स्मृति हो सकती है, सांस्कृतिक स्मृति हो सकती है, नैतिक कल्पना हो सकती है, धार्मिक अर्थ हो सकता है, या इन सबका मिश्रण हो सकता है।
इसलिए किसी प्रसंग को “आख्यान” कह देना उसके ऐतिहासिक मूल्य पर अंतिम निर्णय नहीं है।
पुराण : “पुराना” भर नहीं
“पुराण” शब्द को केवल “पुरानी कथा” समझ लेना भी पर्याप्त नहीं।
पुराण भारतीय साहित्यिक और धार्मिक परंपरा में एक विशिष्ट ज्ञान-संसार का प्रतिनिधित्व करता है।
परंपरा में पुराणों से जुड़े विषयों में सृष्टि, प्रतिसृष्टि, वंश, मन्वंतर और वंशानुचरित जैसे तत्वों का उल्लेख मिलता है।
यहाँ एक महत्वपूर्ण बात सामने आती है—
पुराण का संबंध केवल अतीत से नहीं, बल्कि ब्रह्मांड, काल, वंश और धर्म की व्यापक व्यवस्था से है।
इसलिए पुराण का समय-बोध भी केवल रैखिक कालक्रम नहीं।
वहाँ सृष्टि और प्रलय के चक्र हैं। मन्वंतर हैं। युग हैं। वंश हैं।
और मानव इतिहास एक बहुत बड़े ब्रह्मांडीय काल-परिप्रेक्ष्य में रखा जाता है।
इतिहास और पुराण का संबंध
अब प्रश्न है— यदि इतिहास और पुराण अलग हैं, तो दोनों का संबंध क्या है?
भारतीय परंपरा में दोनों के बीच पूर्ण दीवार नहीं दिखाई देती।
वंश और पूर्ववृत्त दोनों में आ सकते हैं।
राजाओं की कथाएँ दोनों में आ सकती हैं।
प्राचीन घटनाओं की स्मृति दोनों में संरक्षित हो सकती है।
लेकिन उनका उद्देश्य और प्रस्तुति अलग हो सकती है।
इतिहास का केंद्र पूर्ववृत्त और मानव-जीवन की विशिष्ट घटनाओं पर हो सकता है।
पुराण उसी अतीत को— ब्रह्मांडीय, वंशगत और धार्मिक समय के भीतर रख सकता है।
इसलिए उन्हें प्रतिद्वंद्वी श्रेणियों की तरह देखना उचित नहीं।
पंचलक्षण और पुराण
पुराण के पारंपरिक स्वरूप की चर्चा में पाँच विषयों का उल्लेख प्रसिद्ध है— सर्ग, प्रतिसर्ग, वंश, मन्वंतर और वंशानुचरित।
इनका संक्षिप्त अर्थ है— सर्ग — सृष्टि की उत्पत्ति, प्रतिसर्ग — पुनःसृष्टि, वंश — देव, ऋषि और राजवंशों की परंपरा, मन्वंतर — मनुओं से संबंधित काल-विभाजन, वंशानुचरित — वंशों से जुड़े चरित्र और घटनाएँ।
इससे स्पष्ट होता है कि पुराण में वंश और इतिहास-सदृश स्मृति के तत्व मौजूद हैं, लेकिन उनका संदर्भ कहीं अधिक व्यापक है।
इसलिए पुराण को आधुनिक अर्थ में केवल “mythology” कहना भी अपर्याप्त होगा।
महाभारत कहाँ स्थित है?
अब सबसे रोचक प्रश्न सामने आता है— महाभारत इतिहास है, आख्यान है या पुराण?
अध्याय 1 में हमने इसी समस्या का प्रारंभिक उत्तर देखा था—
इसे किसी एक आधुनिक श्रेणी में बंद करना कठिन है।
महाभारत स्वयं अपने को इतिहास की परंपरा से जोड़ता है।
लेकिन उसके भीतर आख्यानों और उपाख्यानों की असंख्य धाराएँ हैं।
उसमें वंश-परंपरा है। उसमें सृष्टि और प्राचीन काल की चर्चाएँ हैं। उसमें धर्म और मोक्ष का विमर्श है।
इसलिए महाभारत भारतीय ग्रंथ-परंपरा के अनेक रूपों को अपने भीतर समाहित करता है।
महाभारत : एक “कथा-संसार”
शायद महाभारत को समझने के लिए “एक पुस्तक” की अपेक्षा— एक कथा-संसार
कहना अधिक उपयोगी है। उसमें एक केंद्रीय कथा है— कुरुवंश और उसके संघर्ष की।
लेकिन उसके चारों ओर अनेक कथाएँ विकसित होती हैं।
वे कथाएँ— मुख्य कथा को समझाती हैं, पात्रों को दर्पण देती हैं, धर्म के उदाहरण देती हैं, जीवन की दूसरी संभावनाएँ दिखाती हैं, और पाठक को एक ही प्रश्न को अनेक दृष्टियों से देखने देती हैं।
इसलिए महाभारत में कथा केवल घटनाओं का क्रम नहीं। वह— विचार करने की पद्धति भी है।
आख्यान का दार्शनिक प्रयोजन
महाभारत की एक विशेषता यह है कि वह अमूर्त दर्शन को भी कथा में बदल देता है।
यदि कोई व्यक्ति दुःख में है, तो उसके सामने किसी ऐसे व्यक्ति की कथा रखी जाती है जिसने दुःख सहा।
यदि किसी राजा के सामने धर्म-संकट है, तो पूर्व राजा का उदाहरण आता है।
यदि मृत्यु का प्रश्न है, तो नचिकेता जैसी उपनिषद्-संबंधित परंपराएँ और मृत्यु-विमर्श सामने आते हैं।
यदि वैवाहिक निष्ठा का प्रश्न है, तो सावित्री का आख्यान आता है।
इस प्रकार— महाभारत सिद्धांत को केवल परिभाषित नहीं करता; उसे जीती हुई कथा में दिखाता है।
कथा और प्रमाण को अलग रखना
फिर भी शोधकर्ता के लिए एक सीमा आवश्यक है।
किसी कथा का नैतिक या दार्शनिक महत्व सिद्ध होने से यह स्वतः सिद्ध नहीं होता कि उसमें वर्णित प्रत्येक घटना ऐतिहासिक रूप से उसी प्रकार घटी थी।
उदाहरण के लिए कोई आख्यान सामाजिक मूल्यों को समझने का अत्यंत महत्वपूर्ण स्रोत हो सकता है, भले ही उसके प्रत्येक विवरण को आधुनिक ऐतिहासिक प्रमाण न मिले।
इसलिए हमें दो प्रश्न अलग रखने होंगे— यह कथा क्या अर्थ देती है?
और— यह घटना ऐतिहासिक रूप से कितनी प्रमाणित है?
दोनों महत्वपूर्ण हैं। लेकिन दोनों के प्रमाण-मानदंड अलग हैं।
पुराण को “कल्पना” कह देना भी पर्याप्त नहीं
इसी प्रकार पुराणों के संदर्भ में आधुनिक “myth” शब्द का अत्यधिक सरल उपयोग भी समस्या पैदा करता है।
Myth शब्द आधुनिक अध्ययन में अनेक अर्थों में प्रयुक्त होता है।
लेकिन यदि इसे केवल— “झूठी कहानी” मान लिया जाए, तो भारतीय पुराण-परंपरा की संरचना समझ में नहीं आएगी।
पुराणों में धार्मिक स्मृति, वंश-परंपरा, ब्रह्मांडीय कल्पना, सांस्कृतिक पहचान और नैतिक दृष्टि एक साथ कार्य करती हैं।
इसलिए हमारा शोध किसी कथा की आधुनिक श्रेणी देखकर उसका मूल्य निर्धारित नहीं करेगा।
पहले यह देखेगा— वह कथा भारतीय परंपरा में क्या कार्य करती है।
इतिहास, आख्यान और पुराण : तीन अलग दृष्टियाँ
अब एक प्रारंभिक कार्यकारी अंतर रखा जा सकता है।
इतिहास मुख्यतः— पूर्ववृत्त और ऐतिहासिक स्मृति की ओर संकेत करता है।
आख्यान
मुख्यतः— किसी घटना, चरित्र या अनुभव को कथा के माध्यम से अर्थ देना
का माध्यम है। पुराण
मुख्यतः— सृष्टि, काल, वंश और धर्म को व्यापक सांस्कृतिक-ब्रह्मांडीय संदर्भ में रखना
का माध्यम बनता है। लेकिन यह विभाजन पूर्ण और कठोर नहीं। यही महत्वपूर्ण बात है।
भारतीय ग्रंथ-परंपरा में ये क्षेत्र एक-दूसरे से संवाद करते हैं।
महाभारत में इनका संगम
महाभारत की विशिष्टता इसी संगम में है। वह कहता है— यह पूर्ववृत्त है।
फिर वह उस पूर्ववृत्त को कथा में प्रस्तुत करता है। कथा के भीतर उपाख्यान लाता है।
उन उपाख्यानों से धर्म पर विचार करता है। फिर धर्म से दर्शन की ओर बढ़ता है।
और कहीं-कहीं कथा को व्यापक ब्रह्मांडीय और वंशगत संदर्भ में रखता है।
इस प्रकार— इतिहास → आख्यान → धर्म → दर्शन एक सतत प्रवाह बन जाता है।
इसी कारण महाभारत की प्रकृति को एक शब्द में पकड़ना कठिन है।
“बहुस्तरीय सत्य” की सावधानी
यहाँ “सत्य” शब्द का प्रयोग भी सावधानी से करना होगा।
किसी कथा में कई प्रकार के सत्य हो सकते हैं— घटनात्मक सत्य , क्या घटना वास्तव में हुई?
सांस्कृतिक सत्य - समाज उस घटना को किस रूप में स्मरण करता है?
नैतिक सत्य - उस कथा से कौन-सा धर्मबोध उत्पन्न होता है?
दार्शनिक सत्य - वह मनुष्य और अस्तित्व के बारे में क्या प्रश्न उठाती है?
इन सभी को एक ही प्रकार का “सत्य” मान लेना गलत होगा।
लेकिन यह भी गलत होगा कि केवल घटनात्मक प्रमाण के अभाव में बाकी सभी स्तरों को असत्य मान लिया जाए।
महाभारत की शक्ति : एक ही कथा के अनेक अर्थ
कुरुक्षेत्र की कथा को कोई राजनीतिक संघर्ष की तरह पढ़ सकता है।
कोई पारिवारिक विघटन के रूप में। कोई धर्म-अधर्म के संघर्ष के रूप में।
कोई सत्ता और उत्तराधिकार की समस्या के रूप में। कोई मानवीय अहंकार की त्रासदी के रूप में।
कोई कर्म और नियति के प्रश्न के रूप में। और कोई इसे आत्मज्ञान की भूमिका के रूप में पढ़ सकता है।
इनमें से हर दृष्टि महाभारत के किसी न किसी स्तर को पकड़ती है।
समस्या तब पैदा होती है जब हम किसी एक स्तर को— पूरा महाभारत मान लेते हैं।
भारतीय परंपरा की एक बड़ी विशेषता
भारतीय ग्रंथ-परंपरा में ज्ञान को केवल एक शैली में सुरक्षित रखने की आवश्यकता नहीं मानी गई।
जो बात सूत्र में कही जा सकती थी, वह सूत्र में कही गई। जो कथा में अधिक प्रभावी थी, वह आख्यान बनी।
जो वंश-स्मृति से जुड़ी थी, वह वंशावली में आई। जो धर्म-विचार से जुड़ी थी, वह संवाद और उपदेश में आई।
इस दृष्टि से महाभारत को समझना एक प्रकार से भारतीय ज्ञान-परंपरा की संरचना को समझना भी है।
शोध के लिए इसका क्या अर्थ है?
इस अंतर को समझने के बाद हमारी शोध-पद्धति और स्पष्ट हो जाती है।
महाभारत में जब कोई प्रसंग मिलेगा, तो हम तुरंत यह नहीं पूछेंगे— “क्या यह सचमुच हुआ था?”
हम पहले चार प्रश्न पूछेंगे—
पहला: यह प्रसंग पाठ में किस रूप में आया है?
दूसरा: इसकी कथा-संरचना क्या है?
तीसरा: इसका धार्मिक या दार्शनिक प्रयोजन क्या है?
चौथा: इसके ऐतिहासिक मूल्य के लिए स्वतंत्र प्रमाण क्या हैं?
इससे कथा और इतिहास दोनों अपने-अपने उचित स्थान पर रहेंगे।
इस उपाध्याय का मुख्य निष्कर्ष
इतिहास, आख्यान और पुराण को तीन बंद डिब्बों की तरह देखना भारतीय परंपरा को समझने में सहायक नहीं होगा।
इनके बीच भेद हैं— लेकिन संबंध भी हैं।
इतिहास अतीत की स्मृति और पूर्ववृत्त से जुड़ता है।
आख्यान उस स्मृति को जीवंत कथा में बदलता है।
पुराण अतीत और वंश को व्यापक ब्रह्मांडीय तथा धार्मिक समय में रखता है।
और महाभारत इन अनेक धाराओं को एक विशाल ग्रंथ-संसार में समाहित करता है।
इसलिए महाभारत को समझने का अधिक उचित तरीका यह होगा कि हम पूछें—
उसमें इतिहास कहाँ है? आख्यान कहाँ है? पुराण-संबंधी तत्व कहाँ हैं?
और उससे भी अधिक महत्वपूर्ण— ये तीनों एक-दूसरे के साथ क्या कर रहे हैं?
अगले प्रश्न की ओर
अब तक हमने यह समझने का प्रयास किया कि भारतीय परंपरा में इतिहास, आख्यान और पुराण को किस प्रकार देखा जा सकता है।
लेकिन अभी एक महत्वपूर्ण प्रश्न शेष है।
यदि महाभारत स्वयं को इतिहास की परंपरा में रखता है, तो—
महाभारत के पास अपने “इतिहास” होने का आधार क्या है?
क्या ग्रंथ स्वयं अपने स्वरूप और उद्देश्य के बारे में कुछ कहता है?
क्या वह अपने को केवल कथा के रूप में प्रस्तुत करता है?
या वह अपने विषय, प्रयोजन और परंपरा के बारे में कोई आत्म-साक्ष्य देता है?
यहीं से अगला उपाध्याय आरम्भ होगा—
अध्याय 2.3 — महाभारत को “इतिहास” कहने के प्राचीन आधार : ग्रंथ का आत्म-साक्ष्य
इस भाग में हम बाहरी आधुनिक निष्कर्षों से पहले महाभारत स्वयं अपने बारे में क्या कहता है, इसे प्राथमिकता देंगे।
और यही हमारे शोध की एक मूल पद्धति भी होगी—
पहले ग्रंथ को स्वयं बोलने दें; उसके बाद उसकी व्याख्या करें।
— मुकेश श्रीवास्तव
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