दर्शन — भाग–2 : विशिष्टाद्वैत क्या है? — दर्शन का मूल स्वरूप
रामानुज का विशिष्टाद्वैत — इतिहास, दर्शन, भक्ति और आधुनिक चिन्तन के आलोक में समग्र अध्ययन
दर्शन
— भाग–2 : विशिष्टाद्वैत क्या है? — दर्शन का मूल स्वरूप
भारतीय
दर्शन में वेदान्त की
अनेक धाराएँ विकसित हुईं, परन्तु उनमें एक प्रश्न सदैव
केन्द्रीय बना रहा—परम
सत्य क्या है, और उसका जीव तथा जगत से क्या सम्बन्ध है? इसी प्रश्न के
उत्तर में अद्वैत, विशिष्टाद्वैत
और द्वैत जैसी विभिन्न दार्शनिक
प्रणालियाँ सामने आईं। इनमें रामानुजाचार्य
का विशिष्टाद्वैत वेदान्त एक ऐसा अद्वितीय
दर्शन है जो न
तो पूर्ण अभेद को स्वीकार
करता है और न
ही पूर्ण भेद को। वह
दोनों के बीच ऐसा
समन्वय प्रस्तुत करता है जो
भारतीय दार्शनिक परम्परा में मौलिक और
प्रभावशाली माना जाता है।
विशिष्टाद्वैत
का मूल प्रतिपादन यह
है कि ब्रह्म एक ही है, परन्तु वह चित् (जीव) और अचित् (जगत) से विशिष्ट है। अतः न तो
जीव और जगत ब्रह्म
से पूर्णतः पृथक हैं, और
न ही वे मिथ्या
हैं। वे ब्रह्म की
सत्ता से अविभाज्य रूप
में सम्बद्ध वास्तविक तत्त्व हैं।
"विशिष्टाद्वैत"
शब्द का अर्थ
'विशिष्टाद्वैत'
दो शब्दों से मिलकर बना
है—
- विशिष्ट = विशेषणों या वास्तविक विशिष्टताओं से युक्त।
- अद्वैत = दूसरा कोई स्वतंत्र परम तत्त्व नहीं; परम सत्य एक ही है।
अर्थात्
विशेषणों से युक्त अद्वैत।
यहाँ
"विशिष्ट" का अर्थ केवल
गुणयुक्त नहीं है, बल्कि
ऐसा एकत्व है जो अपने
भीतर वास्तविक विविधता को समाहित करता
है। यदि ब्रह्म को
एक विशाल जीवित सत्ता माना जाए, तो
जीव और जगत उसके
अविभाज्य अंग हैं। इसलिए
ब्रह्म का अद्वैत बना
रहता है, किन्तु उसकी
पूर्णता इन विशिष्टताओं के
साथ ही समझी जाती
है।
रामानुज
के लिए यह केवल
भाषिक व्याख्या नहीं, बल्कि सम्पूर्ण वेदान्त की मूल तात्त्विक
संरचना है।
अद्वैत
क्यों?
रामानुजाचार्य
अद्वैत शब्द को अस्वीकार
नहीं करते। वे स्वीकार करते
हैं कि परम सत्य अन्ततः एक ही है।
यदि
अनेक स्वतंत्र परम सत्य स्वीकार
किए जाएँ, तो सम्पूर्ण अस्तित्व
का आधार विखण्डित हो
जाएगा। इसलिए उपनिषदों के महावाक्यों—जैसे
"एकमेवाद्वितीयम्"
(छान्दोग्य उपनिषद् 6.2.1)—को वे पूर्ण
सम्मान देते हैं।
किन्तु
उनका प्रश्न यह है कि
यदि ब्रह्म एक है, तो
क्या उसका अर्थ यह
है कि जीव और
जगत का अस्तित्व असत्य
हो जाता है?
उनका
उत्तर है—नहीं।
ब्रह्म
एक है, परन्तु उसकी
एकता ऐसी नहीं है
जो विविधता का निषेध करे;
वह विविधता को अपने भीतर
समाहित करती है।
विशिष्ट
क्यों?
यही
विशिष्टाद्वैत का सबसे मौलिक
पक्ष है।
रामानुज
के अनुसार यदि हम केवल
"अद्वैत" कहें और यह
न बताएँ कि वह अद्वैत
किस प्रकार का है, तो
अनेक दार्शनिक समस्याएँ उत्पन्न होती हैं।
उपनिषद्
ब्रह्म को— सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान,
अनन्त, करुणामय, जगत का कारण,
जीवों का अन्तर्यामी, बताते
हैं।
यदि
इन सभी विशेषताओं को
केवल मायिक या व्यावहारिक मान
लिया जाए, तो उपनिषदों
का स्वाभाविक अर्थ बाधित होता
है।
इसीलिए
रामानुज कहते हैं कि
ब्रह्म विशिष्ट है—अर्थात् वह
अपने वास्तविक गुणों तथा चित्-अचित्
के अविभाज्य सम्बन्ध से युक्त है।
ब्रह्म
की विशिष्टता
विशिष्टाद्वैत
में ब्रह्म केवल एक निराकार
तत्त्व नहीं है।
वह—
- अनन्त कल्याणगुणों से सम्पन्न है।
- सर्वज्ञ है।
- सर्वशक्तिमान है।
- करुणामय है।
- जगत का उपादान और निमित्त कारण है।
- समस्त जीवों का अन्तर्यामी है।
इस प्रकार ब्रह्म कोई निर्जीव दार्शनिक
सिद्धान्त नहीं, बल्कि जीवित, चेतन, सक्रिय और कृपालु परम
सत्ता है।
यही
कारण है कि विशिष्टाद्वैत
में ईश्वर की उपासना का
दार्शनिक आधार अत्यन्त सुदृढ़
हो जाता है।
चित्
और अचित् की वास्तविकता
रामानुज
के अनुसार सम्पूर्ण अस्तित्व तीन मूल तत्त्वों
में समझा जा सकता
है—
- ईश्वर (ब्रह्म)
- चित् (जीव)
- अचित् (जगत)
इनमें
से केवल ईश्वर ही
स्वतन्त्र है। जीव और जगत वास्तविक
हैं, परन्तु वे ईश्वर पर
आश्रित हैं।
यहाँ
"आश्रित" का अर्थ यह
नहीं कि उनका अस्तित्व
भ्रम है, बल्कि यह
कि वे अपनी सत्ता
के लिए ईश्वर पर
निर्भर हैं।
यही
विशिष्टाद्वैत की अद्वितीय विशेषता
है।
अद्वैत
और भेद का समन्वय
भारतीय
दर्शन में दो प्रमुख
प्रवृत्तियाँ दिखाई देती हैं—
पहली—सब कुछ अन्ततः
एक है।
दूसरी—जीव और ईश्वर
सदा भिन्न हैं।
रामानुज
इन दोनों ध्रुवों के बीच एक
तीसरा मार्ग प्रस्तुत करते हैं।
वे कहते हैं—
जीव
और जगत ब्रह्म से
भिन्न भी हैं और
अभिन्न भी।
भिन्न
इस अर्थ में कि
उनकी अपनी पहचान है।
अभिन्न
इस अर्थ में कि
वे ब्रह्म से कभी पृथक
अस्तित्व नहीं रखते।
इस सम्बन्ध को वे आगे
चलकर "शरीर-शरीरी भाव"
और "अप्रथक्सिद्धि" जैसे सिद्धान्तों से
स्पष्ट करते हैं, जिनका
विस्तृत विवेचन आगामी भागों में किया जाएगा।
क्या
यह केवल धार्मिक दर्शन है?
अक्सर
यह समझ लिया जाता
है कि विशिष्टाद्वैत केवल
भक्ति का दर्शन है।
वास्तव
में यह धारणा अधूरी
है।
रामानुज
का सम्पूर्ण दर्शन कठोर तर्क, भाष्य-परम्परा और शास्त्रीय प्रमाणों
पर आधारित है।
उनकी
रचनाएँ विशेष रूप से श्रीभाष्य
और वेदार्थसंग्रह यह स्पष्ट करती
हैं कि उन्होंने ब्रह्मसूत्र
और उपनिषदों की व्याख्या अत्यन्त
व्यवस्थित दार्शनिक पद्धति से की है।
भक्ति
उनके दर्शन का परिणाम है,
उसका विकल्प नहीं।
दर्शन
की आधारभूत संरचना
विशिष्टाद्वैत
की सम्पूर्ण दार्शनिक संरचना कुछ मूल सिद्धान्तों
पर आधारित है—
एक
परम ब्रह्म - केवल एक ही
परम सत्य है—नारायण।
वास्तविक
जगत- जगत मिथ्या नहीं,
बल्कि वास्तविक है।
वास्तविक
जीव - प्रत्येक जीव वास्तविक है
और उसका व्यक्तित्व बना
रहता है।
निर्भर
सम्बन्ध - जीव और जगत
ईश्वर पर पूर्णतः आश्रित
हैं।
अनन्त
गुणयुक्त ब्रह्म - ब्रह्म निर्गुण नहीं, बल्कि अनन्त कल्याणगुणों से सम्पन्न है।
भक्ति
और कृपा - मुक्ति केवल बौद्धिक ज्ञान
से नहीं, बल्कि ईश्वर की कृपा और
भक्ति से सम्भव होती
है।
दार्शनिक
संवाद
विशिष्टाद्वैत
की तुलना यदि आधुनिक दर्शन
के Holism (समग्रवाद) से की जाए,
तो एक रोचक समानता
दिखाई देती है। समग्रवाद
यह मानता है कि किसी
तन्त्र को उसके पृथक-पृथक अवयवों से
पूरी तरह नहीं समझा
जा सकता; सम्पूर्णता अपने अंगों से
अधिक होती है। विशिष्टाद्वैत
भी ब्रह्म को ऐसी समग्र
सत्ता के रूप में
देखता है जिसके भीतर
जीव और जगत वास्तविक
रूप से विद्यमान हैं।
किन्तु
दोनों में एक मूलभूत
अन्तर है। आधुनिक समग्रवाद
सामान्यतः दार्शनिक या वैज्ञानिक अवधारणा
है, जबकि विशिष्टाद्वैत में
यह समग्रता एक चेतन, सर्वज्ञ, करुणामय ईश्वर के रूप में
प्रतिष्ठित होती है। इसलिए
दोनों के बीच संवाद
सम्भव है, किन्तु उन्हें
समान मान लेना उचित
नहीं होगा।
मुख्य
निष्कर्ष
- "विशिष्टाद्वैत" का अर्थ है—विशिष्टताओं से युक्त अद्वैत।
- ब्रह्म एकमात्र परम सत्य है, किन्तु वह चित् और अचित् से विशिष्ट है।
- जीव और जगत वास्तविक हैं; वे मिथ्या नहीं हैं।
- विशिष्टाद्वैत एकत्व और विविधता का समन्वित दर्शन प्रस्तुत करता है।
- यह दर्शन भक्ति और तर्क, दोनों को समान रूप से महत्त्व देता है।
- इसकी सम्पूर्ण दार्शनिक संरचना ईश्वर, जीव और जगत के अविभाज्य सम्बन्ध पर आधारित है।
आज
के सन्दर्भ में विचारणीय प्रश्न
- क्या विविधता को स्वीकार करते हुए भी वास्तविक एकता की कल्पना सम्भव है?
- यदि जगत वास्तविक है, तो क्या पर्यावरण और समाज के प्रति हमारी नैतिक जिम्मेदारी भी आध्यात्मिक कर्तव्य बन जाती है?
- क्या आधुनिक विज्ञान की समग्रवादी दृष्टियाँ विशिष्टाद्वैत के साथ सार्थक संवाद स्थापित कर सकती हैं?
- क्या ईश्वर को केवल निराकार सत्ता मानना पर्याप्त है, या उसके गुणों और व्यक्तित्व का भी दार्शनिक महत्त्व है?
अगले
भाग की भूमिका
अब तक हमने विशिष्टाद्वैत
के मूल स्वरूप को
समझा। अगले भाग में
इस दर्शन के केन्द्रबिन्दु—ब्रह्म
(नारायण)—का विस्तृत अध्ययन
किया जाएगा। वहाँ यह देखा
जाएगा कि रामानुजाचार्य ब्रह्म
को किस प्रकार अनन्त
कल्याणगुणों से सम्पन्न, सर्वज्ञ,
सर्वशक्तिमान और करुणामय परम
पुरुष के रूप में
स्थापित करते हैं। साथ
ही यह भी समझेंगे
कि विशिष्टाद्वैत में ब्रह्म केवल
जगत का कारण ही
नहीं, बल्कि समस्त अस्तित्व का अन्तःस्थित आधार
भी है।
मुकेश
श्रीवास्तव
(आत्मसन्तुलन
आध्यात्मिक ऊर्जा केंद्र)
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