दर्शन-जैन धर्म- भाग–3 : भगवान महावीर स्वामी — जीवन, साधना और धर्मक्रान्ति
जैन
धर्म — इतिहास, दर्शन, साधना और आधुनिक विज्ञान के आलोक में समग्र अध्ययन
भाग–3 : भगवान महावीर स्वामी — जीवन, साधना और धर्मक्रान्ति
भगवान
महावीर स्वामी जैन धर्म के
चौबीसवें एवं अंतिम तीर्थंकर हैं। यद्यपि जैन
परम्परा उन्हें धर्म का संस्थापक
नहीं मानती, फिर भी यह
निर्विवाद है कि उन्होंने
जैन धर्म को एक
सुदृढ़ दार्शनिक, नैतिक और संघीय स्वरूप
प्रदान किया। उनके जीवन में
वैराग्य, कठोर तप, आत्मानुशासन
और करुणा का ऐसा अद्वितीय
समन्वय दिखाई देता है, जिसने
भारतीय धार्मिक चिन्तन को गहराई से
प्रभावित किया।
महावीर
स्वामी का जन्म परम्परानुसार
599 ईसा पूर्व (कुछ आधुनिक इतिहासकार
लगभग 540 ईसा पूर्व के
आसपास का काल मानते
हैं) वैशाली गणराज्य के निकट कुण्डग्राम
में हुआ। उनके पिता
राजा सिद्धार्थ ज्ञात्रिक (नाय) कुल के
प्रमुख थे और माता
त्रिशला वैशाली के लिच्छवि गणराज्य
से सम्बन्ध रखती थीं। उनका
बाल्यकाल राजसी वैभव में बीता,
किन्तु प्रारम्भ से ही उनका
स्वभाव गंभीर, संयमी और चिंतनशील था।
जैन
ग्रन्थों में उनका बाल्य
नाम वर्धमान बताया गया है। कहा
जाता है कि उनके
जन्म के पश्चात राज्य
में समृद्धि बढ़ी, इसलिए उन्हें वर्धमान कहा गया। बाद
में कठिन तप, अदम्य
धैर्य और निर्भीकता के
कारण वे "महावीर" के नाम से
प्रसिद्ध हुए। यह नाम
केवल वीरता का नहीं, बल्कि
इन्द्रियों, वासनाओं और अहंकार पर विजय का प्रतीक है।
लगभग
तीस वर्ष की आयु
में महावीर ने सांसारिक जीवन
का त्याग कर संन्यास ग्रहण
किया। यह त्याग किसी
निराशा या पलायन का
परिणाम नहीं था, बल्कि
सत्य और आत्म-मुक्ति
की खोज का आरम्भ
था। उन्होंने अपने सभी सांसारिक
संबंधों, संपत्ति और सुविधाओं का
परित्याग कर कठोर तप
और आत्म-साधना का
मार्ग अपनाया।
अगले
लगभग बारह वर्षों तक उन्होंने अत्यन्त
कठिन तपस्या की। इस अवधि
में उन्होंने मौन, ध्यान, उपवास,
आत्मसंयम और सहनशीलता का
अभ्यास किया। जैन परम्परा में
यह केवल शारीरिक कष्ट
सहने की प्रक्रिया नहीं
थी, बल्कि राग, द्वेष, मोह और कर्म-बन्धनों के क्षय की आध्यात्मिक साधना
थी। वे अपमान, कष्ट,
भूख, प्यास और विपरीत परिस्थितियों
में भी पूर्ण समत्व
बनाए रखते थे।
अंततः
ऋजुपालिका नदी के तट पर,
जृम्भिकग्राम के समीप, उन्हें
केवलज्ञान (कैवल्य ज्ञान) की प्राप्ति हुई।
जैन दर्शन में केवलज्ञान का
अर्थ है—समस्त वस्तुओं
और उनके समस्त रूपों
का प्रत्यक्ष, पूर्ण और अविकल ज्ञान।
यह सर्वज्ञता किसी अलौकिक चमत्कार
का परिणाम नहीं, बल्कि कर्मावरणों के पूर्ण क्षय
का फल मानी जाती
है। केवलज्ञान प्राप्त करने के पश्चात
महावीर अरिहन्त कहलाए।
ज्ञान
प्राप्ति के बाद महावीर
ने लगभग तीस वर्षों
तक व्यापक रूप से धर्मोपदेश
दिया। उन्होंने राजाओं, व्यापारियों, गृहस्थों, स्त्रियों और साधुओं—सभी
वर्गों को सम्बोधित किया।
उनके उपदेशों की सबसे बड़ी
विशेषता थी कि वे
जन्म, जाति और सामाजिक
प्रतिष्ठा से अधिक आचरण
और आत्मसंयम को महत्त्व देते
थे।
महावीर
ने जैन संघ को
सुव्यवस्थित स्वरूप प्रदान किया। उन्होंने चारांग संघ की स्थापना की,
जिसमें साधु, साध्वी, श्रावक और श्राविका—चारों को समान रूप
से धर्ममार्ग का अधिकारी माना
गया। यह उस समय
की सामाजिक परिस्थितियों में एक महत्त्वपूर्ण
परिवर्तन था, क्योंकि इससे
महिलाओं को भी आध्यात्मिक
साधना का संगठित अवसर
प्राप्त हुआ।
महावीर
स्वामी ने धर्म के
आधार के रूप में
पाँच महाव्रत स्थापित किए— अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह
इन
व्रतों का उद्देश्य केवल
बाहरी अनुशासन नहीं, बल्कि मन, वचन और
कर्म की शुद्धि है।
गृहस्थों के लिए इन्हीं
का अपेक्षाकृत सरल रूप अणुव्रत
के रूप में निर्धारित
किया गया। इस प्रकार
जैन धर्म ने संन्यासियों
और गृहस्थों—दोनों के लिए पृथक-पृथक साधना-पथ
विकसित किए।
महावीर
की शिक्षाओं का मूल केन्द्र
था—आत्मा की शुद्धि। उन्होंने स्पष्ट
कहा कि मनुष्य का
वास्तविक शत्रु कोई बाहरी व्यक्ति
नहीं, बल्कि उसके भीतर का
क्रोध, मान, माया और
लोभ है। जब तक
ये कषाय विद्यमान हैं,
तब तक कर्म-बन्धन
बना रहता है। इसलिए
मुक्ति का मार्ग बाहरी
कर्मकाण्डों में नहीं, बल्कि
आन्तरिक परिवर्तन में निहित है।
दार्शनिक
दृष्टि से महावीर का
एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण योगदान अनेकान्त-दृष्टि की भावना है।
यद्यपि अनेकान्तवाद का व्यवस्थित विकास
बाद के आचार्यों ने
किया, किन्तु उसके बीज महावीर
के संवादों में स्पष्ट दिखाई
देते हैं। वे किसी
भी प्रश्न को एकांगी दृष्टि
से नहीं देखते थे,
बल्कि परिस्थिति, दृष्टिकोण और सापेक्षता के
आधार पर उत्तर देते
थे। यही दृष्टि आगे
चलकर जैन तर्कशास्त्र की
आधारशिला बनी।
महावीर
स्वामी का निर्वाण परम्परानुसार
पावापुरी (बिहार) में हुआ। दीपावली
का पर्व जैन परम्परा
में उनके निर्वाण दिवस
के रूप में भी
मनाया जाता है। उनके
पश्चात उनके शिष्यों और
आचार्यों ने उनकी शिक्षाओं
को संग्रहीत किया, जिनसे आगे चलकर जैन
आगम साहित्य का विकास हुआ।
आज
के वैश्विक परिप्रेक्ष्य में महावीर का
जीवन केवल धार्मिक श्रद्धा
का विषय नहीं है।
उनका संदेश—अहिंसा, आत्मसंयम, सीमित उपभोग, सहिष्णुता और उत्तरदायित्व—मानव
सभ्यता के सामने उपस्थित
अनेक संकटों के समाधान की
दिशा में प्रेरणा देता
है। विशेष रूप से पर्यावरण-संरक्षण, नैतिक नेतृत्व और मानसिक स्वास्थ्य
के क्षेत्र में उनके विचारों
का पुनर्मूल्यांकन किया जा रहा
है।
महावीर
स्वामी का जीवन यह
सिखाता है कि वास्तविक
विजय दूसरों पर नहीं, बल्कि
स्वयं पर प्राप्त की
जाती है। इसी कारण
वे "महावीर" कहलाते हैं—वह वीर
जिसने अपने भीतर के
अज्ञान और आसक्ति पर
विजय प्राप्त की।
मुख्य
निष्कर्ष
- महावीर स्वामी जैन धर्म के चौबीसवें तीर्थंकर हैं।
- उन्होंने कठोर तपस्या के पश्चात केवलज्ञान प्राप्त किया।
- उन्होंने चारांग संघ का संगठन किया और पाँच महाव्रतों को व्यवस्थित रूप दिया।
- उनकी शिक्षाओं का केन्द्र आत्मसंयम, कर्म-क्षय और मोक्ष है।
- उनका जीवन आत्म-विजय और नैतिक नेतृत्व का आदर्श प्रस्तुत करता है।
आज
के सन्दर्भ में विचारणीय प्रश्न
- क्या आत्म-अनुशासन के बिना स्थायी नैतिक जीवन सम्भव है?
- क्या बाहरी उपलब्धियों से अधिक कठिन अपने मन पर विजय प्राप्त करना है?
- क्या सीमित उपभोग आधुनिक समाज के लिए एक व्यवहारिक आदर्श बन सकता है?
- क्या महावीर का अहिंसा-सिद्धान्त आज के वैश्विक संघर्षों में नई दिशा दे सकता है?
अगले
भाग की भूमिका
अगले
भाग में हम जैन
दर्शन के मूल सिद्धान्तों का अध्ययन करेंगे।
जीव, अजीव, कर्म, आस्रव, बन्ध, संवर, निर्जरा और मोक्ष जैसे
मूल तत्त्वों को वैज्ञानिक, दार्शनिक
और सरल भाषा में
समझने का प्रयास किया
जाएगा। यही सिद्धान्त सम्पूर्ण
जैन दर्शन की आधारशिला हैं।
मुकेश
श्रीवास्तव
(आत्मसन्तुलन
आध्यात्मिक ऊर्जा केंद्र)
(IS BLOG KE SABHEE LEKH BLOG HOLDER KEE PERMMISSION KE
BINA KAHEE BHEE ULLEKH KARNE KEE ANUMATI NAHEE HAI)
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