दर्शन — रामानुज का विशिष्टाद्वैत - भाग–5 : जगत (अचित्) का स्वरूप

रामानुज का विशिष्टाद्वैतइतिहास, दर्शन, भक्ति और आधुनिक चिन्तन के आलोक में समग्र अध्ययन

दर्शनभाग–5 : जगत (अचित्) का स्वरूप

भारतीय दर्शन के इतिहास में "जगत" का प्रश्न सदैव विवाद का विषय रहा है। क्या यह विश्व वास्तविक है या केवल प्रतीति (Appearance)? क्या प्रकृति परम सत्य का रूप है या अज्ञान की उपज? क्या पर्वत, नदियाँ, वृक्ष, मनुष्य और सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड वास्तव में अस्तित्व रखते हैं, या वे केवल ब्रह्म की अविद्याजन्य अभिव्यक्तियाँ हैं?

रामानुजाचार्य का विशिष्टाद्वैत इन प्रश्नों का अत्यन्त स्पष्ट और यथार्थवादी उत्तर देता है। उनके अनुसार जगत (अचित्) पूर्णतः वास्तविक है। वह तो मिथ्या है, भ्रम है और ही केवल मानसिक कल्पना। यह सम्पूर्ण विश्व ईश्वर की सृष्टि है, उसी पर आश्रित है और उसी की महिमा का प्रत्यक्ष प्रकाशन है।

विशिष्टाद्वैत में यदि ईश्वर चेतन परम सत्ता है और जीव चेतन व्यक्तिगत सत्ता है, तो जगत अचेतन (अचित्) सत्ता है। इन तीनोंईश्वर, जीव और जगतके बिना विशिष्टाद्वैत की तात्त्विक संरचना पूर्ण नहीं होती।

 अचित् क्या है?

"अचित्" शब्द का अर्थ हैजो चेतन नहीं है।

इसमें सम्पूर्ण भौतिक जगत सम्मिलित है

  • पंचमहाभूत, प्रकृति, शरीर, इन्द्रियाँ, मन (सूक्ष्म प्रकृति के रूप में), काल, समस्त दृश्य ब्रह्माण्ड

अर्थात् जो कुछ भी चेतन जीव नहीं है, वह अचित् की श्रेणी में आता है।

किन्तु अचित् का अर्थ यह नहीं कि वह निरर्थक या असत्य है।

वह वास्तविक है, ईश्वर की सत्ता पर आश्रित है और जीव के आध्यात्मिक विकास का क्षेत्र भी है।

प्रकृति का स्वरूप

विशिष्टाद्वैत में जगत का उपादान आधार प्रकृति है। प्रकृति अनादि है, किन्तु स्वतन्त्र नहीं। वह ईश्वर पर पूर्णतः निर्भर है।

भगवद्गीता में भगवान कहते हैं"मयाध्यक्षेण प्रकृतिः सूयते सचराचरम्।" (गीता 9.10)

अर्थात्मेरे अधीन प्रकृति सम्पूर्ण चराचर जगत की रचना करती है।

रामानुजाचार्य इस श्लोक की व्याख्या करते हुए बताते हैं कि प्रकृति स्वतन्त्र सृजनकर्ता नहीं है। वह ईश्वर की अधीन शक्ति है।

इस प्रकार सृष्टि का वास्तविक नियामक ईश्वर ही है।

जगत की वास्तविकता

विशिष्टाद्वैत का सबसे प्रसिद्ध सिद्धान्तों में से एक है

जगत वास्तविक है।

यदि संसार मिथ्या हो

तोकर्म भी मिथ्या होगा। धर्म भी मिथ्या होगा। भक्ति भी मिथ्या होगी।  ईश्वर की सृष्टि भी मिथ्या हो जाएगी।

रामानुजाचार्य इसे स्वीकार नहीं करते। वे कहते हैं

उपनिषद् बार-बार जगत की उत्पत्ति, स्थिति और लय का वर्णन करती हैं।

यदि जगत असत्य होता, तो इन वर्णनों का कोई अर्थ नहीं रह जाता।

इसलिए जगत का अस्तित्व वास्तविक है, यद्यपि वह स्वतन्त्र नहीं है।

क्या जगत नश्वर है?

हाँ। किन्तु नश्वर होने का अर्थ असत्य होना नहीं है। एक वृक्ष जन्म लेता है, बढ़ता है और एक दिन सूख जाता है।

क्या इसलिए वह कभी था ही नहीं? -  नहीं। वह वास्तविक था, यद्यपि परिवर्तनशील था।

रामानुज के अनुसारपरिवर्तनशीलता और असत्यता समानार्थी नहीं हैं।

यही बात सम्पूर्ण जगत पर लागू होती है।

मायावाद का खण्डन

विशिष्टाद्वैत का यह पक्ष अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है।

रामानुजाचार्य शंकराचार्य के मायावाद की विस्तृत समीक्षा करते हैं। उनका प्रश्न है

यदि संसार केवल अविद्या का परिणाम है

तोअविद्या किसकी है?

यदि ब्रह्म की हैतो ब्रह्म अपूर्ण हो जाएगा।

यदि जीव की हैतो जीव स्वयं कब उत्पन्न हुआ?

यदि जीव भी अविद्या का परिणाम हैतो यह तर्क अनन्त चक्र में चला जाएगा।

इसी प्रकार वे यह भी पूछते हैं

यदि ज्ञान प्राप्त होने पर संसार मिथ्या सिद्ध हो जाता हैतो ज्ञानी व्यक्ति संसार में व्यवहार क्यों करता है?

इन प्रश्नों के आधार पर रामानुज निष्कर्ष निकालते हैं कि संसार को मिथ्या मानना शास्त्र और अनुभवदोनों के विपरीत है।

शास्त्रीय आधार

तैत्तिरीयोपनिषद् कहती है"यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते..." अर्थात्जिससे यह सम्पूर्ण जगत उत्पन्न हुआ।

यदि उत्पन्न होने वाली वस्तु ही मिथ्या होतो सृष्टि-वर्णन निरर्थक हो जाएगा।

छान्दोग्य उपनिषद् भी सम्पूर्ण विश्व को ब्रह्म की अभिव्यक्ति मानती है।

रामानुज इन सभी मन्त्रों का स्वाभाविक अर्थ स्वीकार करते हैं।

जगत ईश्वर की अभिव्यक्ति

विशिष्टाद्वैत में जगत को ईश्वर से पृथक नहीं माना जाता। किन्तु यह भी नहीं कहा जाता कि जगत ही ईश्वर है।

बल्किजगत ईश्वर की सत्ता पर पूर्णतः आश्रित है। वह उसकी शक्ति का प्रकाश है।

जैसे सूर्य के बिना प्रकाश नहीं रह सकतावैसे ही ईश्वर के बिना जगत का कोई अस्तित्व नहीं।

किन्तु प्रकाश सूर्य नहीं है। यही सम्बन्ध विशिष्टाद्वैत की मौलिकता को व्यक्त करता है।

शरीर-शरीरी भाव की भूमिका

रामानुजाचार्य जगत और ईश्वर के सम्बन्ध को समझाने के लिए एक अत्यन्त मौलिक सिद्धान्त प्रस्तुत करते हैं

शरीर-शरीरी भाव।

यद्यपि इसका विस्तृत अध्ययन अगले भाग में होगा, फिर भी यहाँ उसका संकेत आवश्यक है।

जिस प्रकारशरीर आत्मा पर निर्भर है, उसी प्रकारसम्पूर्ण जगत ईश्वर पर निर्भर है।

शरीर आत्मा से पृथक रहकर जीवित नहीं रह सकता।

इसी प्रकार जगत ईश्वर से पृथक कोई स्वतन्त्र सत्ता नहीं।

किन्तु शरीर वास्तविक है। उसी प्रकार जगत भी वास्तविक है।

यही विशिष्टाद्वैत का अद्भुत समन्वय है।

प्रकृति और पर्यावरण

यदि सम्पूर्ण जगत ईश्वर का शरीर है

तोप्रकृति का विनाश केवल पर्यावरणीय संकट नहीं, बल्कि आध्यात्मिक संवेदनहीनता भी है।

विशिष्टाद्वैत हमें प्रकृति को उपभोग की वस्तु नहीं, बल्कि ईश्वर की अभिव्यक्ति के रूप में देखने की प्रेरणा देता है।

इस दृष्टि सेवृक्षारोपण, नदियों की रक्षा, जीव-जंतुओं का संरक्षण, पृथ्वी का सम्मानसिर्फ सामाजिक दायित्व नहीं, बल्कि धार्मिक उत्तरदायित्व भी बन जाते हैं।

दार्शनिक संवाद

आधुनिक Ecological Philosophy (पर्यावरण-दर्शन) में यह विचार तेजी से विकसित हुआ है कि मनुष्य प्रकृति का स्वामी नहीं, बल्कि उसका सहभागी है। विशिष्टाद्वैत इससे एक कदम आगे बढ़कर कहता है कि प्रकृति केवल संसाधन नहीं, बल्कि ईश्वर की अभिव्यक्ति है। इसलिए उसका सम्मान केवल उपयोगितावादी दृष्टि से नहीं, बल्कि आध्यात्मिक दृष्टि से भी किया जाना चाहिए।

यहाँ आधुनिक पारिस्थितिकी और विशिष्टाद्वैत के बीच एक सार्थक संवाद सम्भव है। दोनों प्रकृति की गरिमा को स्वीकार करते हैं, किन्तु विशिष्टाद्वैत उस गरिमा का अन्तिम आधार ईश्वर में स्थापित करता है।

 मुख्य निष्कर्ष

  • अचित् सम्पूर्ण अचेतन जगत का दार्शनिक नाम है।
  • जगत वास्तविक है; वह मिथ्या नहीं है।
  • प्रकृति ईश्वर की अधीन शक्ति है, स्वतन्त्र सत्ता नहीं।
  • परिवर्तनशीलता का अर्थ असत्यता नहीं है।
  • रामानुजाचार्य ने मायावाद की तर्कपूर्ण समीक्षा करते हुए जगत की वास्तविकता का प्रतिपादन किया।
  • जगत ईश्वर से पृथक नहीं, बल्कि उस पर पूर्णतः आश्रित है; इसी सम्बन्ध को आगे "शरीर-शरीरी भाव" से स्पष्ट किया जाएगा।

आज के सन्दर्भ में विचारणीय प्रश्न

  1. यदि सम्पूर्ण जगत ईश्वर पर आश्रित वास्तविक सत्ता है, तो क्या पर्यावरण-संरक्षण धार्मिक आचरण का भी अंग माना जाना चाहिए?
  2. क्या परिवर्तनशील वस्तुओं को असत्य कहना दार्शनिक रूप से उचित है?
  3. यदि प्रकृति ईश्वर की अभिव्यक्ति है, तो आधुनिक उपभोक्तावाद की समीक्षा किस प्रकार की जानी चाहिए?
  4. क्या आध्यात्मिक दृष्टि से प्रकृति का सम्मान मानव-केंद्रित (Anthropocentric) नैतिकता से अधिक व्यापक आधार प्रदान करता है?

अगले भाग की भूमिका

अब तक हमने विशिष्टाद्वैत के तीन मूल तत्त्वोंब्रह्म (ईश्वर), जीव (चित्) और जगत (अचित्)का पृथक-पृथक अध्ययन किया। अगले भाग में हम इस दर्शन के सबसे मौलिक और अद्वितीय सिद्धान्तचित्अचित्ईश्वर का सम्बन्धका विश्लेषण करेंगे। विशेष रूप से शरीर-शरीरी भाव, अप्रथक्सिद्धि तथा समस्त ब्रह्माण्ड ईश्वर का शरीर हैइन सिद्धान्तों का गहन विवेचन किया जाएगा। यही वह भाग है जहाँ विशिष्टाद्वैत अपनी मौलिक दार्शनिक पहचान प्राप्त करता है।

 

मुकेश श्रीवास्तव
(आत्मसन्तुलन आध्यात्मिक ऊर्जा केंद्र)

(IS BLOG KE SABHEE LEKH BLOG HOLDER KEE PERMMISSION KE BINA KAHEE BHEE ULLEKH KARNE KEE ANUMATI NAHEE HAI)

 

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