दर्शन — रामानुज का विशिष्टाद्वैत - भाग–9 : श्रीभाष्य, गीताभाष्य, वेदार्थसंग्रह और रामानुजाचार्य के प्रमुख ग्रन्थ

 रामानुज का विशिष्टाद्वैतइतिहास, दर्शन, भक्ति और आधुनिक चिन्तन के आलोक में समग्र अध्ययन

दर्शनभाग–9 : श्रीभाष्य, गीताभाष्य, वेदार्थसंग्रह और रामानुजाचार्य के प्रमुख ग्रन्थ

किसी भी महान दार्शनिक की पहचान केवल उसके विचारों से नहीं होती, बल्कि उन ग्रन्थों से भी होती है जिनमें उसके विचार व्यवस्थित रूप से अभिव्यक्त हुए हैं। भारतीय दर्शन में शंकराचार्य के ब्रह्मसूत्रभाष्य, उपनिषद्भाष्य और भगवद्गीताभाष्य ने जिस प्रकार अद्वैत वेदान्त को शास्त्रीय आधार प्रदान किया, उसी प्रकार रामानुजाचार्य ने अपने ग्रन्थों के माध्यम से विशिष्टाद्वैत वेदान्त को दार्शनिक, भाषाशास्त्रीय और तर्कशास्त्रीय दृढ़ता प्रदान की।

रामानुजाचार्य केवल भक्त नहीं थे, केवल समाज-सुधारक नहीं थे और केवल मठाधीश भी नहीं थे। वे उच्चकोटि के दार्शनिक, भाष्यकार और शास्त्रविद् थे। उन्होंने उपनिषद्, भगवद्गीता और ब्रह्मसूत्रजिन्हें संयुक्त रूप से प्रस्थानत्रयी कहा जाता हैकी ऐसी व्याख्या प्रस्तुत की जिसमें ईश्वर, जीव और जगत की वास्तविकता, भक्ति की अनिवार्यता और ईश्वर-कृपा की भूमिका को शास्त्रीय प्रमाणों सहित स्थापित किया गया।

विशिष्टाद्वैत का दार्शनिक वैभव मुख्यतः छह ग्रन्थों पर आधारित है

  1. श्रीभाष्य, वेदार्थसंग्रह, भगवद्गीताभाष्य, वेदान्तदीप, वेदान्तसार, गद्यत्रय (शरणागतिगद्य, श्रीरंगगद्य, वैकुण्ठगद्य)

इनमें से प्रथम पाँच ग्रन्थ दार्शनिक आधार प्रस्तुत करते हैं, जबकि गद्यत्रय विशिष्टाद्वैत की आध्यात्मिक संवेदना का चरम रूप है।

श्रीभाष्य : विशिष्टाद्वैत का दार्शनिक शिखर

रामानुजाचार्य का सबसे महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ श्रीभाष्य है।

यह ब्रह्मसूत्र पर लिखा गया उनका विस्तृत भाष्य है। भारतीय वेदान्त परम्परा में जिस प्रकार शंकराचार्य का ब्रह्मसूत्रभाष्य अद्वैत वेदान्त का मूल आधार माना जाता है, उसी प्रकार श्रीभाष्य विशिष्टाद्वैत का सर्वोच्च प्रामाणिक ग्रन्थ है।

श्रीभाष्य का उद्देश्य

रामानुज का उद्देश्य नया वेदान्त प्रस्तुत करना नहीं था। उनका उद्देश्य यह सिद्ध करना था कि बादरायण के ब्रह्मसूत्रों का वास्तविक अभिप्राय विशिष्टाद्वैत है।

वे यह दिखाने का प्रयास करते हैं किउपनिषद्, भगवद्गीता, और ब्रह्मसूत्र

तीनों का समन्वित अर्थ एक ही हैसगुण, सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान, अनन्त कल्याणगुणों से सम्पन्न नारायण ही परम ब्रह्म हैं।

श्रीभाष्य की कार्य-पद्धति

श्रीभाष्य केवल आस्था का ग्रन्थ नहीं है। उसकी विशेषताएँ हैं

  • कठोर तर्कशास्त्र, पूर्वपक्ष और सिद्धान्त की परम्परा, व्याकरण का सूक्ष्म प्रयोग, मीमांसा-पद्धति का उपयोग, उपनिषदों का समन्वित अध्ययन, प्रतिपक्ष का निष्पक्ष प्रस्तुतीकरण

रामानुज पहले विरोधी मत को पूरी शक्ति से प्रस्तुत करते हैं, फिर क्रमशः उसका उत्तर देते हैं। यह भारतीय शास्त्रार्थ परम्परा का श्रेष्ठ उदाहरण है।

 वेदार्थसंग्रह : उपनिषदों की समन्वित व्याख्या

यदि श्रीभाष्य विशिष्टाद्वैत का दार्शनिक दुर्ग है, तो वेदार्थसंग्रह उसकी भूमिका है।

इस ग्रन्थ का उद्देश्य हैउपनिषदों का समग्र सन्देश क्या है?

रामानुज यह सिद्ध करते हैं कि उपनिषदों में जहाँ कहीं भी अद्वैत की चर्चा है, वहाँ उसका अर्थ निर्विशेष ब्रह्म नहीं, बल्कि चित् और अचित् से विशिष्ट ब्रह्म है।

वे विभिन्न उपनिषदों के प्रतीत होने वाले विरोधी वचनों का समन्वय करते हैं

  • एकत्व के वचन, भेद के वचन, ईश्वर के गुणों के वचन, सृष्टि-वर्णन, अन्तर्यामी ब्रह्म, आत्मा का स्वरूप

इन सबको एक संगठित दार्शनिक प्रणाली में व्यवस्थित करते हैं।

यही कारण है कि वेदार्थसंग्रह केवल उद्धरणों का संग्रह नहीं, बल्कि उपनिषद्-दर्शन की एक समन्वयात्मक व्याख्या है।

भगवद्गीताभाष्य : कर्म, ज्ञान और भक्ति का समन्वय

रामानुजाचार्य का गीताभाष्य विशिष्टाद्वैत की साधना-दृष्टि को समझने के लिए अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है।

उनके अनुसार भगवद्गीता का केन्द्रीय संदेश हैईश्वर-प्राप्ति के लिए कर्म, ज्ञान और भक्ति का समन्वय।

वे गीता को केवल संन्यास का ग्रन्थ नहीं मानते।

उनके अनुसारकर्म मन की शुद्धि करता है। ज्ञान ईश्वर के स्वरूप का बोध कराता है। भक्ति भगवान तक पहुँचाती है। और अन्ततः प्रपत्ति ईश्वर की कृपा का द्वार खोलती है।

विशेष रूप से गीता के अठारहवें अध्याय का प्रसिद्ध श्लोक"सर्वधर्मान् परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।"
(भगवद्गीता 18.66)

रामानुज के लिए प्रपत्ति सिद्धान्त का मूल आधार है।

वे इसे केवल संन्यास का आह्वान नहीं, बल्कि ईश्वर के प्रति पूर्ण आत्मसमर्पण का दिव्य संदेश मानते हैं।

 वेदान्तदीप

वेदान्तदीप को श्रीभाष्य का संक्षिप्त और अपेक्षाकृत सरल रूप माना जाता है।

जहाँ श्रीभाष्य अत्यन्त विस्तृत, तर्कप्रधान और विद्वानों के लिए है, वहीं वेदान्तदीप उसी दार्शनिक दृष्टि का संक्षिप्त प्रकाश प्रस्तुत करता है।

यह विद्यार्थियों और प्रारम्भिक अध्ययन करने वालों के लिए एक मार्गदर्शक ग्रन्थ है।

वेदान्तसार

वेदान्तसार विशिष्टाद्वैत के मूल सिद्धान्तों का और भी संक्षिप्त परिचय देता है।

इसमेंब्रह्म, जीव, जगत, मोक्ष, साधना आदि विषयों का सूत्रात्मक निरूपण मिलता है।

यह ग्रन्थ दार्शनिक प्रवेशिका (Introductory Manual) के रूप में महत्त्वपूर्ण है।

 गद्यत्रय : दर्शन का हृदय

यदि श्रीभाष्य विशिष्टाद्वैत का मस्तिष्क है, तो गद्यत्रय उसका हृदय है।

गद्यत्रय में तीन प्रसिद्ध रचनाएँ हैं

1. शरणागतिगद्य

यह पूर्ण शरणागति का अनुपम दस्तावेज़ है। यहाँ रामानुज स्वयं भगवान और श्री लक्ष्मी के समक्ष आत्मसमर्पण करते हैं। यह केवल साहित्य नहीं, जीवित आध्यात्मिक अनुभव है।

2. श्रीरंगगद्य

यह भगवान श्रीरंगनाथ की स्तुति और प्रार्थना का दिव्य ग्रन्थ है। इसमें ईश्वर के अनन्त कल्याणगुणों का अद्भुत वर्णन मिलता है।

3. वैकुण्ठगद्य

इस ग्रन्थ में वैकुण्ठ का अत्यन्त सुन्दर और आध्यात्मिक वर्णन मिलता है। यह दार्शनिक कल्पना नहीं, भक्ति की चरम अनुभूति का साहित्यिक रूप है।

क्या रामानुज केवल भाष्यकार थे? - नहीं।

रामानुज केवल शास्त्रों की व्याख्या नहीं करते। वे एक नई व्याख्यात्मक पद्धति (Hermeneutics) भी प्रस्तुत करते हैं। उनकी पद्धति के कुछ प्रमुख सिद्धान्त हैं

  • किसी एक मन्त्र के आधार पर सम्पूर्ण दर्शन नहीं बनाया जा सकता।
  • सम्पूर्ण उपनिषद्-साहित्य का समन्वय आवश्यक है।
  • विरोधी प्रतीत होने वाले वचनों का सामंजस्य किया जाना चाहिए।
  • जहाँ सम्भव हो, शास्त्र का स्वाभाविक अर्थ ग्रहण करना चाहिए।
  • ईश्वर के गुणों का निषेध नहीं, उनका समुचित अर्थ करना चाहिए।

इस दृष्टि से रामानुज भारतीय व्याख्या-विज्ञान (Hermeneutics) के भी महत्त्वपूर्ण आचार्य हैं।

 

आधुनिक अकादमिक दृष्टि से महत्त्व

आज विश्व के अनेक विश्वविद्यालयों में श्रीभाष्य और वेदार्थसंग्रह का अध्ययन केवल धार्मिक ग्रन्थों के रूप में नहीं, बल्कि— Metaphysics, Philosophy of Language, Hermeneutics, Comparative Theology, Philosophy of Religion के सन्दर्भ में भी किया जाता है।

विशेष रूप से उनकी व्याख्या-पद्धति, भाषा की सूक्ष्मता और समन्वयात्मक दृष्टि आधुनिक दार्शनिक विमर्शों में भी प्रासंगिक मानी जाती है।

दार्शनिक संवाद

आधुनिक Hermeneutics (व्याख्या-दर्शन) में यह प्रश्न अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है कि किसी प्राचीन ग्रन्थ का अर्थ कैसे निर्धारित किया जाए। क्या किसी एक वाक्य के आधार पर सम्पूर्ण ग्रन्थ का निष्कर्ष निकाला जा सकता है, या सम्पूर्ण ग्रन्थ को समग्रता में पढ़ना चाहिए?

रामानुजाचार्य की पद्धति इस प्रश्न का अत्यन्त परिपक्व उत्तर देती है। वे किसी एक महावाक्य को सम्पूर्ण वेदान्त का आधार नहीं बनाते, बल्कि उपनिषद्, गीता और ब्रह्मसूत्रतीनों का समन्वित अध्ययन करके निष्कर्ष प्रस्तुत करते हैं। आधुनिक व्याख्या-दर्शन की भाषा में इसे Contextual and Integrative Interpretation कहा जा सकता है। यह समानता केवल पद्धतिगत है; दोनों की दार्शनिक आधारभूमि भिन्न है।

मुख्य निष्कर्ष

  • श्रीभाष्य विशिष्टाद्वैत का सर्वाधिक प्रामाणिक दार्शनिक ग्रन्थ है।
  • वेदार्थसंग्रह उपनिषदों की समन्वयात्मक व्याख्या प्रस्तुत करता है।
  • गीताभाष्य कर्म, ज्ञान, भक्ति और प्रपत्ति का संतुलित दर्शन देता है।
  • वेदान्तदीप और वेदान्तसार विशिष्टाद्वैत के संक्षिप्त दार्शनिक ग्रन्थ हैं।
  • गद्यत्रय विशिष्टाद्वैत की आध्यात्मिक संवेदना और शरणागति का उत्कर्ष है।
  • रामानुजाचार्य भारतीय व्याख्या-विज्ञान (Hermeneutics) के भी महत्त्वपूर्ण आचार्य हैं।

 आज के सन्दर्भ में विचारणीय प्रश्न

  1. क्या किसी शास्त्र की व्याख्या उसके समग्र सन्दर्भ के बिना की जा सकती है?
  2. क्या दर्शन और भक्ति का ऐसा समन्वय आज के धार्मिक विमर्शों को अधिक संतुलित बना सकता है?
  3. क्या प्राचीन भाष्य-परम्परा आधुनिक व्याख्या-दर्शन को कुछ नया दे सकती है?
  4. क्या केवल तर्क पर्याप्त है, या आध्यात्मिक अनुभव भी दार्शनिक ज्ञान का एक वैध स्रोत हो सकता है?

 अगले भाग की भूमिका

अब तक हमने विशिष्टाद्वैत के इतिहास, तत्त्वमीमांसा, साधना और ग्रन्थों का अध्ययन किया। अगले भाग में हम भारतीय वेदान्त की तीन प्रमुख धाराओंशंकराचार्य का अद्वैत, रामानुजाचार्य का विशिष्टाद्वैत और मध्वाचार्य का द्वैतका तुलनात्मक अध्ययन करेंगे। विशेष रूप से ब्रह्म, जीव, जगत, मोक्ष, ज्ञान, भक्ति और ईश्वर-जीव सम्बन्ध के आधार पर इन तीनों दर्शनों की समानताओं और भिन्नताओं का निष्पक्ष विश्लेषण किया जाएगा।

 

मुकेश श्रीवास्तव
(आत्मसन्तुलन आध्यात्मिक ऊर्जा केंद्र)

(IS BLOG KE SABHEE LEKH BLOG HOLDER KEE PERMMISSION KE BINA KAHEE BHEE ULLEKH KARNE KEE ANUMATI NAHEE HAI)

 

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