शब्द यात्री - श्वास — आत्मा और संसार के मध्य सेतु

 शब्द यात्री - श्वास — आत्मा और संसार के मध्य सेतु

मन का पुल जिस रस्सी पर टिका है, वह है श्वास।

श्वास केवल वायु का आवागमन नहीं है। वह प्राण का स्पंदन है। शरीर और चेतना के बीच चलने वाला एक मौन संवाद है।

मन अशांत होता है तो श्वास अशांत हो जाती है।

मन शांत होता है तो श्वास में संगीत उतर आता है।

इसलिए प्राचीन ऋषियों ने प्राण को केवल जीवन की शक्ति नहीं माना, बल्कि चेतना का द्वार माना।

जो अपनी श्वास को देखना सीख जाता है, वह धीरे-धीरे अपने मन को देखना सीख जाता है।

और जो मन को देखना सीख जाता है, वह अपने भीतर छिपे साक्षी को पहचानने लगता है।


श्वास बाहर जाती है।

श्वास भीतर आती है।

पर कोई है जो दोनों को देख रहा है।

वह देखने वाला न बाहर जाता है, न भीतर आता है।

वह केवल साक्षी है।

मुकेश ,,,,,,,,,,,,

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