पतञ्जलि योगदर्शन — भाग २ योग क्या है? — “योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः” का दार्शनिक विवेचन
पतञ्जलि योगदर्शन — भाग २
योग
क्या है? — “योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः” का दार्शनिक विवेचन
पिछले
भाग से आगे
पहले
भाग में हमने देखा
कि पतञ्जलि का योग केवल
आसन, प्राणायाम अथवा मानसिक शान्ति
की कोई तकनीक नहीं
है। वह मनुष्य के
अस्तित्व की एक गहरी
दार्शनिक समस्या से आरम्भ होता
है—द्रष्टा और चित्त के सम्बन्ध की समस्या।
पतञ्जलि
ने योग का सम्पूर्ण
मार्ग जिस सूत्र में
समेट दिया है, वह
है— योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः॥ १.२॥
यह सूत्र छोटा है, परन्तु
योगदर्शन का हृदय इसी
में धड़कता है।
यदि
इसे केवल “योग का अर्थ
मन को रोकना है”
कहकर आगे बढ़ जाएँ,
तो पतञ्जलि का आधा दर्शन
भी हमारे हाथ नहीं आएगा।
इसलिए इस सूत्र को
उसके प्रत्येक पद के माध्यम
से समझना आवश्यक है।
सूत्र
के चार पद
योगः
चित्त-वृत्ति-निरोधः। - चार मूल शब्द—
योगः — चित्त — वृत्ति — निरोधः।
इन चारों को समझे बिना
योग को समझना सम्भव
नहीं।
यहाँ
एक महत्त्वपूर्ण बात है। पतञ्जलि
ने यह नहीं कहा—
“मनोनिरोधः।”
उन्होंने कहा— “चित्तवृत्तिनिरोधः।”
अर्थात्
योग की समस्या केवल
मन की चंचलता नहीं
है; समस्या चित्त की उन वृत्तियों
की है जिनके कारण
द्रष्टा अपने वास्तविक स्वरूप
से असंबद्ध होकर चित्त के
साथ तादात्म्य कर लेता है।
‘योग’
— केवल जोड़ना नहीं
‘योग’
शब्द को सामान्यतः ‘जोड़ना’
कहा जाता है। यह
अर्थ लोकप्रिय है, लेकिन पतञ्जलि
के योगदर्शन में योग का
निर्णायक अर्थ स्वयं पतञ्जलि
के सूत्र से निर्धारित होता
है।
योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः॥
-इसलिए यहाँ योग का
अर्थ किसी दो वस्तुओं
को जोड़ देना मात्र
नहीं है।
बल्कि
योग एक ऐसी अवस्था
और साधना-प्रक्रिया है जिसमें चित्त
की वृत्तियाँ नियंत्रित होकर अन्ततः निवृत्त
होती हैं और द्रष्टा
अपने स्वरूप में स्थित होता
है।
अगला
सूत्र इस बात को
स्पष्ट करता है— तदा
द्रष्टुः स्वरूपेऽवस्थानम्॥ १.३॥
“तब द्रष्टा अपने स्वरूप में स्थित होता है।” अर्थात् योग की परिभाषा
को उसके फल से
अलग करके नहीं समझना
चाहिए।
वृत्तिनिरोध
→ द्रष्टा का स्वरूपावस्थान। यही पतञ्जलि की
योग-दृष्टि की मूल दिशा
है।
‘चित्त’
क्या है?
अब सूत्र का सबसे महत्त्वपूर्ण
शब्द सामने आता है— चित्त
आधुनिक
हिन्दी में हम प्रायः
चित्त और मन को
एक-दूसरे का पर्याय मान
लेते हैं। लेकिन पतञ्जलि
के दर्शन में चित्त को
केवल आधुनिक अर्थ के ‘mind’ में
सीमित करना उचित नहीं।
योगदर्शन
में चित्त वह सूक्ष्म अन्तःकरणीय
क्षेत्र है जिसमें—
विचार
उत्पन्न होते हैं, अनुभवों
के संस्कार अंकित होते हैं, स्मृतियाँ
रहती हैं, कल्पनाएँ बनती
हैं, भावनाएँ उठती हैं, निर्णय
और मानसिक प्रतिक्रियाएँ घटित होती हैं।
इसलिए
चित्त को केवल विचारों
का समूह मानना भी
अधूरा होगा।
चित्त
एक गतिशील मानसिक क्षेत्र है। उसमें निरन्तर परिवर्तन होते रहते हैं।
कभी
वह किसी वस्तु को
ग्रहण करता है, कभी
उसका स्मरण करता है, कभी
कल्पना करता है, कभी
किसी वस्तु को गलत रूप
में ग्रहण करता है।
यही
गतियाँ आगे वृत्ति कहलाती हैं।
चित्त
और द्रष्टा एक ही नहीं हैं
यहाँ
पतञ्जलि योगदर्शन का अत्यन्त महत्त्वपूर्ण
प्रश्न उठता है—
यदि
चित्त बदलता रहता है, तो उस परिवर्तन को जानने वाला कौन है?
विचार
बदलते हैं। भावनाएँ बदलती हैं। स्मृतियाँ बदलती हैं। शरीर बदलता है। मनःस्थितियाँ बदलती हैं।
लेकिन
मनुष्य कहता है— “मेरे
विचार बदल गए।” “मेरी मनःस्थिति बदल गई।”
इस भाषा में एक
सूक्ष्म संकेत छिपा है।
यदि
विचार ‘मेरे’ हैं, तो क्या
मैं स्वयं विचार हूँ?
यदि
स्मृति ‘मेरी’ है, तो क्या
मैं स्मृति हूँ?
यदि
मनःस्थिति बदलती है, तो क्या
मैं भी उसी अनुपात
में बदल जाता हूँ?
पतञ्जलि
का दर्शन इसी भेद को
साधना की भूमि पर
ले जाता है।
वह कहता है— चित्त
परिवर्तनशील है; द्रष्टा उसके परिवर्तन का साक्षी है।
इसीलिए
अगले सूत्र में— तदा द्रष्टुः स्वरूपेऽवस्थानम्॥
‘द्रष्टा’
शब्द आता है। योग का
लक्ष्य चित्त को नष्ट करना
नहीं है।
लक्ष्य
है— द्रष्टा को चित्त की वृत्तियों से अस्मितापूर्वक अभिन्न मानने की स्थिति से मुक्त करना।
‘वृत्ति’
क्या है?
‘वृत्ति’
का सामान्य अर्थ है—गतिशीलता,
अवस्था, रूप या परिवर्तन।
पतञ्जलि
के संदर्भ में वृत्ति चित्त
की वह विशेष अवस्था
है जिसमें चित्त किसी प्रकार के
विषय-रूप को ग्रहण
करता है।
जब हम किसी वस्तु
को देखते हैं, उसके बारे
में सोचते हैं, उसका स्मरण
करते हैं या उसकी
कल्पना करते हैं, तो
चित्त किसी विशेष रूप
में प्रवृत्त होता है।
इसीलिए
चित्त को एक शांत
झील की तरह और
वृत्ति को उसमें उठने
वाली तरंग की तरह
समझना उपयोगी हो सकता है।
लेकिन
यह केवल उपमा है;
इसे पतञ्जलि की तकनीकी परिभाषा
न मानें।
चित्त
आधार है; वृत्ति उसकी विशेष गतिशील अभिव्यक्ति है।
पाँच
वृत्तियाँ
पतञ्जलि
आगे कहते हैं— वृत्तयः
पञ्चतय्यः क्लिष्टाक्लिष्टाः॥ १.५॥
अर्थात्
वृत्तियाँ पाँच प्रकार की
हैं और वे क्लिष्ट
तथा अक्लिष्ट हो सकती हैं।
अगले
सूत्र में वे पाँचों
के नाम देते हैं—
प्रमाणविपर्ययविकल्पनिद्रास्मृतयः॥
१.६॥
अर्थात्—
१. प्रमाण २. विपर्यय ३. विकल्प ४. निद्रा ५. स्मृति
इन पाँचों का विस्तृत विवेचन
हमारी श्रृंखला के अगले भागों
में होगा।
अभी
केवल इतना समझना पर्याप्त
है कि पतञ्जलि के
लिए चित्त की हर गति
एक ही प्रकार की
नहीं है।
कुछ
वृत्तियाँ यथार्थ ज्ञान से सम्बन्धित हो
सकती हैं, कुछ मिथ्याज्ञान
से, कुछ कल्पना से,
कुछ निद्रा से और कुछ
स्मृति से।
इसलिए
योग का अर्थ केवल
“बुरे विचार रोकना” नहीं है।
चित्त
की सभी वृत्तियों के साथ साधक का सम्बन्ध बदलना है।
‘निरोध’
का अर्थ क्या है?
अब हम सूत्र के
सबसे अधिक गलत समझे
जाने वाले शब्द पर
आते हैं—
निरोध
आम बोलचाल में निरोध का
अर्थ हो सकता है—रोक देना, दबा
देना, बन्द कर देना।
यदि
पतञ्जलि के सूत्र को
इसी अर्थ में लिया
जाए, तो योग किसी
मानसिक दमन की तकनीक
बन जाएगा।
लेकिन
योगदर्शन की पूरी साधना-संरचना इस अर्थ को
स्वीकार नहीं करती।
यदि
विचार को केवल दबा
दिया जाए, तो वह
समाप्त नहीं होता; वह
किसी अन्य रूप में
लौट सकता है।
इसलिए
निरोध को केवल दमन समझना उचित नहीं।
निरोध
का सम्बन्ध चित्त की वृत्तियों के
अनियंत्रित प्रवाह के निवर्तन, संयमन
और अन्ततः उनके उपशमन से
है।
यह एक साधित अवस्था है, जिसमें चित्त
अपने निरन्तर विषयाकार प्रवाह से मुक्त होकर
स्थिरता की ओर जाता
है।
इसीलिए
पतञ्जलि आगे कहते हैं—
अभ्यासवैराग्याभ्यां
तन्निरोधः॥ १.१२॥
अर्थात्—
उस निरोध की सिद्धि अभ्यास और वैराग्य से होती है।
इससे
स्पष्ट है कि निरोध
कोई अचानक किया गया मानसिक
आदेश नहीं है।
यह साधना से विकसित होने
वाली स्थिति है।
निरोध
दमन क्यों नहीं है?
इस प्रश्न को जीवन के
एक साधारण अनुभव से समझ सकते
हैं।
मान
लीजिए किसी व्यक्ति से
कहा जाए— “इस समय किसी भी विचार के बारे में मत सोचो।”
वह जैसे ही विचार
रोकने का प्रयास करेगा,
उसी विचार की उपस्थिति और
अधिक स्पष्ट हो सकती है।
क्यों?
क्योंकि मन को आदेश
देना और मन की
वृत्ति का वास्तविक उपशमन—दो अलग बातें
हैं।
पतञ्जलि
का योग चित्त के
साथ युद्ध नहीं करता।
वह चित्त को समझता है,
उसका निरीक्षण करता है, उसके
संस्कारों को पहचानता है
और अभ्यास-वैराग्य के द्वारा उसके
प्रवाह को रूपान्तरित करता
है।
इसलिए
योग का मार्ग— दमन
से अधिक परिष्कार का मार्ग है।
चित्तवृत्ति
और पुरुष का सम्बन्ध
अब सूत्र की सबसे गहरी
परत सामने आती है।
यदि
चित्त वृत्तिशील है और पुरुष
द्रष्टा है, तो समस्या
कहाँ पैदा होती है?
पतञ्जलि
कहते हैं— वृत्तिसारूप्यमितरत्र॥ १.४॥
अर्थात्—
अन्यथा द्रष्टा वृत्ति के स्वरूप जैसा प्रतीत होता है।
यहीं
योग की समस्या का
वास्तविक उद्घाटन होता है।
जब चित्त की कोई वृत्ति
उठती है, तब द्रष्टा
उस वृत्ति के साथ तादात्म्य
कर लेता है।
क्रोध
उठता है— “मैं क्रोधित हूँ।”
दुःख
उठता है— “मैं दुःखी हूँ।”
भय उठता है— “मैं
भयभीत हूँ।”
विचार
उठता है— “मैं यही सोच हूँ।”
लेकिन
पतञ्जलि की दृष्टि से
यहाँ एक भेद छिपा
हुआ है— क्रोध चित्त की वृत्ति है; द्रष्टा उसका ज्ञाता है।
दुःख
का अनुभव चित्त में घटित हो रहा है; द्रष्टा उसका साक्षी है।
यह भेद बौद्धिक रूप
से समझ लेना ही
योग की पूर्ण सिद्धि
नहीं है।
इसी
भेद को साधना के
द्वारा प्रत्यक्ष करना योग की
दिशा है।
‘तदा’
का रहस्य
पतञ्जलि
कहते हैं— तदा द्रष्टुः स्वरूपेऽवस्थानम्॥ १.३॥
यहाँ
एक शब्द विशेष ध्यान
देने योग्य है—
तदा
— तब। - कब?
जब
चित्तवृत्तिनिरोध
होता है—तब।
अर्थात्
तीसरा सूत्र दूसरे सूत्र से अलग नहीं
है।
पहला—
योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः।
दूसरा—
तदा द्रष्टुः स्वरूपेऽवस्थानम्।
योग
हुआ तो क्या होगा? द्रष्टा अपने स्वरूप में स्थित होगा।
इसलिए
योगदर्शन में निरोध स्वयं
अंतिम रहस्य नहीं है।
निरोध
के पार जो उद्घाटित
होता है, वह अधिक
महत्त्वपूर्ण है— द्रष्टा।
और
यदि निरोध न हो? पतञ्जलि तुरन्त विपरीत स्थिति भी बताते हैं—
वृत्तिसारूप्यमितरत्र॥
१.४॥
अर्थात्
जब द्रष्टा अपने स्वरूप में
स्थित नहीं होता, तब
वह वृत्तियों के साथ सारूप्य
को प्राप्त होता है।
यही
मनुष्य के सामान्य अनुभव
की स्थिति है।
हम
अपनी भूमिकाओं, इच्छाओं, स्मृतियों, उपलब्धियों, असफलताओं और भावनाओं से
अपनी पहचान बना लेते हैं।
मैं
पिता हूँ। मैं लेखक हूँ। मैं सफल हूँ। मैं असफल हूँ। मैं सुखी हूँ। मैं दुःखी हूँ।
ये सभी जीवन में
उपयोगी पहचानें हो सकती हैं,
लेकिन पतञ्जलि का प्रश्न इससे
अधिक गहरा है—
इन
सभी पहचानों को जानने वाला कौन है?
योग
उस प्रश्न को भीतर ले
जाता है। योग का अर्थ संसार से भागना नहीं
यहाँ
एक सामान्य भ्रान्ति दूर करना आवश्यक
है।
यदि
योग का लक्ष्य चित्तवृत्तिनिरोध
है, तो क्या योग
संसार से पलायन सिखाता
है?
पतञ्जलि
का उत्तर ऐसा नहीं है।
योग
संसार को नकारने से
पहले संसार के प्रति हमारी चित्तगत प्रतिक्रिया को समझता है।
समस्या
केवल वस्तु नहीं है।
समस्या
उस वस्तु के प्रति चित्त
में उत्पन्न होने वाली वृत्ति,
उससे जुड़ा राग-द्वेष, स्मृति,
संस्कार और तादात्म्य भी
है।
इसलिए
योग का वास्तविक संघर्ष
बाहर की दुनिया से
नहीं, अविद्याजन्य चित्त-संरचना से है।
क्लेश
और कर्म का विस्तृत
विवेचन आगे होगा।
चित्त
को शांत करना और चेतना को मिटाना—दो अलग बातें
एक और गम्भीर भ्रम
है— यदि चित्त की वृत्तियाँ रुक जाएँगी, तो क्या चेतना भी समाप्त हो जाएगी?
पतञ्जलि
की दृष्टि में ऐसा नहीं
है।
योग
का उद्देश्य चेतना को नष्ट करना
नहीं, बल्कि चित्त की वृत्तियों से
द्रष्टा के स्वरूप को
पृथक् पहचानना है।
इसलिए—
वृत्तिनिरोध ≠ चेतना का अभाव।
बल्कि
पतञ्जलि की दिशा में—
वृत्तियों के उपशमन से द्रष्टा का स्वरूप अधिक स्पष्ट होता है।
इसीलिए
योग को बेहोशी, शून्यता
या मानसिक निष्क्रियता के साथ समान
नहीं किया जा सकता।
योग
और आधुनिक ‘माइंड-कंट्रोल’
आज कभी-कभी योग
को “mind control” कहा जाता है।
यह शब्द कुछ स्तर
पर उपयोगी प्रतीत हो सकता है,
लेकिन पतञ्जलि की पूरी दृष्टि
को व्यक्त नहीं करता।
क्योंकि
योग केवल मन पर
अधिकार पाने का अभ्यास
नहीं है।
यदि
साधक केवल अपने विचारों
को नियंत्रित करने लगे लेकिन
स्वयं को उन्हीं विचारों
का स्वामी मानता रहे, तो योग
की अन्तिम समस्या हल नहीं होती।
पतञ्जलि
की दिशा है—
चित्त
को जानना → चित्त की वृत्तियों को समझना → उनका निरोध साधना → द्रष्टा के स्वरूप में प्रतिष्ठित होना।
इसलिए
योग का प्रश्न “मन को
कैसे नियंत्रित करें?” से आगे जाकर
पूछता है— “मन को देखने वाला कौन है?”
यही
पतञ्जलि को सामान्य मानसिक
अनुशासन से दार्शनिक योग
तक ले जाता है।
अभ्यास
और वैराग्य की आवश्यकता
यदि
चित्तवृत्तिनिरोध इतना महत्त्वपूर्ण है,
तो वह होगा कैसे?
पतञ्जलि
का उत्तर अत्यन्त स्पष्ट है— अभ्यासवैराग्याभ्यां तन्निरोधः॥ १.१२॥
दो आधार— अभ्यास और वैराग्य। अभ्यास चित्त को स्थिर दिशा
देता है।
वैराग्य
उसे विषयों के आकर्षण में
बहने से रोकता है।
एक को हम चाहें
तो दिशा कह सकते हैं
और दूसरे को अनासक्ति।
केवल
अभ्यास हो और वैराग्य
न हो तो साधना
किसी उपलब्धि के प्रति आसक्ति
बन सकती है।
केवल
वैराग्य हो और अभ्यास
न हो तो वह
निष्क्रिय उदासीनता बन सकता है।
पतञ्जलि
दोनों को साथ रखते
हैं। इनका विस्तृत विवेचन भाग ५ में
किया जाएगा।
योग
की पूरी यात्रा का बीज
यदि
अभी तक की बात
को एक क्रम में
रखें तो पतञ्जलि का
दर्शन एक अद्भुत संरचना
बनाता है—
चित्त
है। चित्त में वृत्तियाँ हैं। वृत्तियों के साथ द्रष्टा
का सारूप्य हो जाता है।
इस सारूप्य के कारण वास्तविक
स्वरूप विस्मृत होता है।
योग
वृत्तिनिरोध की साधना करता
है। निरोध होने पर— द्रष्टुः
स्वरूपेऽवस्थानम्।
और यही आगे चलकर
विवेक, क्लेशक्षय और कैवल्य की
दिशा खोलता है।
अर्थात्
योगदर्शन का बीज केवल
“मन को शांत करना”
नहीं है।
उसका
बीज है— द्रष्टा और चित्त के बीच वास्तविक भेद का बोध।
सांख्य से यहाँ सम्बन्ध कहाँ जुड़ता है?
पहले
भाग में हमने संकेत
किया था कि योग
और सांख्य का सम्बन्ध अत्यन्त
निकट है।
यहाँ
उसका एक मूल सूत्र
दिखाई देता है।
सांख्य
के अनुसार पुरुष चेतन द्रष्टा है
और प्रकृति परिवर्तनशील है।
योगदर्शन
उसी व्यापक दार्शनिक भूमि पर चित्त
और उसकी वृत्तियों को
साधना का केन्द्र बनाता
है।
इसलिए
योग में— द्रष्टा और चित्त का भेद अत्यन्त
महत्वपूर्ण है।
लेकिन
पतञ्जलि केवल दार्शनिक भेद
बताकर नहीं रुकते।
वे पूछते हैं— यदि द्रष्टा चित्त नहीं है, तो चित्त के साथ यह तादात्म्य समाप्त कैसे होगा?
यहीं
से योग का व्यावहारिक
दर्शन आरम्भ होता है।
इस
सूत्र की सबसे सरल और सबसे गहरी व्याख्या
यदि
“योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः”
को तीन स्तरों पर
समझें, तो—
पहला
स्तर — सामान्य - चित्त की चंचल वृत्तियों को शांत करना।
दूसरा
स्तर — दार्शनिक - द्रष्टा का चित्त-वृत्तियों से सारूप्य समाप्त होना।
तीसरा
स्तर — आध्यात्मिक - द्रष्टा का अपने स्वरूप में प्रतिष्ठित होना।
तीसरे
सूत्र के बिना दूसरे
सूत्र को समझना अधूरा
है।
इसलिए
योग केवल— “विचार मत करो” नहीं है।
बल्कि—
“विचारों के साथ अपनी वास्तविक पहचान मत मिलाओ।”
और उससे भी आगे—
“उस द्रष्टा को पहचानो जो विचारों के आने-जाने को जानता है।”
एक
दार्शनिक सावधानी
यहाँ
“द्रष्टा” शब्द को आधुनिक
मनोविज्ञान के ‘observer’ या ‘watcher’ का सीधा पर्याय
भी नहीं मानना चाहिए।
पतञ्जलि
के दर्शन में द्रष्टा का
सम्बन्ध पुरुष से है और
पुरुष की सत्ता सांख्य-योग की व्यापक
तत्त्वमीमांसा से जुड़ी है।
इसलिए
आगे जब हम पुरुष,
प्रकृति, बुद्धि, अहंकार और चित्त की
अधिक सूक्ष्म मीमांसा करेंगे, तब इस विषय
को और स्पष्ट किया
जाएगा।
अभी
इतना जानना पर्याप्त है— चित्त दृश्य और परिवर्तनशील क्षेत्र है; द्रष्टा उससे भिन्न चेतन सत्ता है।
योग
इसी सम्बन्ध की उलझन को
सुलझाने की साधना है।
भाग
का निष्कर्ष
पतञ्जलि
ने योग का परिचय
किसी लम्बे सिद्धान्त से नहीं दिया।
उन्होंने केवल कहा— योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः॥
लेकिन
इस एक सूत्र में
पूरी यात्रा छिपी हुई है।
योग
— साधना और अवस्था।
चित्त
— अन्तःकरण का परिवर्तनशील क्षेत्र।
वृत्ति
— चित्त की विविध गतियाँ।
निरोध
— उन वृत्तियों के अनियंत्रित प्रवाह
का साधित उपशमन।
और परिणाम— तदा द्रष्टुः स्वरूपेऽवस्थानम्॥
यानी—
जब चित्त अपनी निरन्तर वृत्तियों में नहीं बहता, तब द्रष्टा अपने स्वरूप में स्थित होता है।
इसलिए
पतञ्जलि का योग मनुष्य
को विचारहीन बनाने का प्रयास नहीं
है।
वह मनुष्य को यह पहचानने
की साधना देता है कि—
विचार
आते हैं, जाते हैं।
स्मृतियाँ आती हैं, जाती हैं।
भावनाएँ उठती हैं, शांत होती हैं।
मनःस्थितियाँ बदलती हैं।
लेकिन—
क्या वह भी बदलता है जो इन सबके परिवर्तन को जानता है?
यही
प्रश्न आगे की पूरी
योगयात्रा का केन्द्र बनने
वाला है।
अगले
भाग की भूमिका
अब योग की मूल
परिभाषा स्पष्ट हो चुकी है।
अगला
प्रश्न स्वाभाविक है—
यदि
चित्त की वृत्तियाँ योग
की साधना का केन्द्र हैं,
तो ये वृत्तियाँ कौन-कौन सी हैं?
पतञ्जलि
उनका स्पष्ट वर्गीकरण करते हैं— प्रमाणविपर्ययविकल्पनिद्रास्मृतयः॥
१.६॥
अर्थात्—
प्रमाण, विपर्यय, विकल्प, निद्रा और स्मृति।
अगले
भाग में हम इन
पाँचों वृत्तियों को केवल मनोवैज्ञानिक
अर्थ में नहीं, बल्कि
पतञ्जलि की अपनी दार्शनिक
संरचना में समझेंगे—और
देखेंगे कि यथार्थ ज्ञान भी वृत्ति क्यों है, निद्रा भी वृत्ति क्यों है और स्मृति वर्तमान में उपस्थित न होते हुए भी चित्त की गति कैसे बनी रहती है।
यहीं
से पतञ्जलि का चित्त-दर्शन अपनी वास्तविक गहराई
में प्रवेश करेगा।
मुकेश
श्रीवास्तव
आत्मसन्तुलन आध्यात्मिक ऊर्जा केंद्र
(इस
ब्लॉग के सभी लेख ब्लॉग होल्डर की अनुमति के बिना कहीं भी उल्लेख करने की अनुमति नहीं है।)
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