सांख्य दर्शन — भाग १५ सांख्य का अंतिम प्रश्न : पुरुषार्थ, विवेक और कैवल्य
सांख्य दर्शन — भाग १५
सांख्य
का अंतिम प्रश्न : पुरुषार्थ, विवेक और कैवल्य
पिछले
चौदह भागों में हमने सांख्य
के मूल दर्शन को
क्रमशः समझा—दुःख से
आरम्भ करके प्रमाण, प्रकृति,
पुरुष, पच्चीस तत्त्व, त्रिगुण, कर्तृत्व और भोक्तृत्व तक।
अब इस पूरी यात्रा
का अंतिम प्रश्न है— प्रकृति यह सब करती ही क्यों है?
यदि
पुरुष स्वयं अकर्ता है, तो प्रकृति
का यह विशाल विकासक्रम
किस प्रयोजन से है?
सांख्य
का उत्तर है— पुरुषार्थ।
प्रकृति
का विकास पुरुष के भोग और अपवर्ग के लिए है।
ईश्वरकृष्ण
की प्रसिद्ध कारिका है—
पुरुषस्य
दर्शनार्थं कैवल्यार्थं तथा प्रधानस्य।
पङ्ग्वन्धवदुभयोरपि
संयोगस्तत्कृतः सर्गः॥
अर्थात्
प्रकृति और पुरुष का
संयोग पुरुष के अनुभव तथा
अन्ततः कैवल्य के लिए है।
यहीं
सांख्य का सम्पूर्ण दर्शन
एक उद्देश्य में सिमट जाता
है।
प्रकृति
पुरुष के लिए क्यों कार्य करती है?
प्रकृति
स्वयं के लिए संसार
नहीं बनाती। उसमें चेतना नहीं, लेकिन उसमें क्रियाशीलता है।
पुरुष
में चेतना है, लेकिन वह
स्वयं क्रियाशील नहीं।
इसलिए
दोनों का संयोग संसार
के अनुभव को सम्भव बनाता
है।
प्रकृति—
दृश्य है। पुरुष— द्रष्टा है। प्रकृति— कार्य करती है। पुरुष— उस कार्य को प्रकाशित करता है।
इसी
सम्बन्ध से अनुभव की
सम्पूर्ण दुनिया प्रकट होती है।
भोग
क्यों आवश्यक है?
सांख्य
भोग को केवल इन्द्रिय-सुख नहीं मानता।
जीवन
के समस्त अनुभव— सुख, दुःख, मोह,
सफलता, असफलता, इच्छा, संघर्ष, जन्म और मृत्यु—
प्रकृति
के अनुभवात्मक क्षेत्र का हिस्सा हैं।
मनुष्य इन्हीं अनुभवों के बीच धीरे-धीरे यह पहचान
सकता है कि—
जो
बदलता है, वह मेरा वास्तविक स्वरूप नहीं।
इस अर्थ में भोग
केवल आकर्षण नहीं। वह— विवेक की भूमिका तैयार करने वाला अनुभव भी है।
दुःख
से आरम्भ हुई यात्रा कहाँ समाप्त होती है?
सांख्य
का आरम्भ हमने त्रिविध दुःख
से किया था— आध्यात्मिक,
आधिभौतिक और आधिदैविक।
मनुष्य
दुःख से बचना चाहता
है। लेकिन सांख्य केवल दुःख के
अस्थायी उपचार से संतुष्ट नहीं
होता।
वह पूछता है— दुःख की जड़ कहाँ है? उत्तर मिलता है— अविवेक।
पुरुष और प्रकृति का
भेद न पहचानना।
जब प्रकृति के धर्म पुरुष
पर आरोपित होते हैं— तब
कर्तृत्व और भोक्तृत्व उत्पन्न
होते हैं।
यही
संसार-बन्धन है।
विवेक
ही समाधान है
इसलिए
सांख्य का मोक्ष किसी
स्थान की प्राप्ति नहीं।
यह किसी नए लोक में
जाना नहीं।
यह किसी पदार्थ को
प्राप्त करना भी नहीं।
यह है— प्रकृति और पुरुष का यथार्थ विवेक।
जब बुद्धि पूर्णतः पहचान लेती है— “यह
दृश्य है, मैं द्रष्टा हूँ।” तब तादात्म्य समाप्त
होने लगता है।
प्रकृति
के परिवर्तन चलते रहते हैं।
लेकिन पुरुष उनसे अपना स्वरूप
अलग पहचान लेता है।
यही—
कैवल्य।
प्रकृति
की निवृत्ति
सांख्य
की दृष्टि में प्रकृति पुरुष
की शत्रु नहीं। वह उसके अनुभव और
मुक्ति—दोनों में सहायक है।
इसीलिए
कारिका में नर्तकी की
अत्यन्त सुंदर उपमा आती है—
रङ्गस्य दर्शयित्वा निवर्तते नर्तकी यथा नृत्यात्।
जैसे
नर्तकी अपना नृत्य दिखाकर
मंच से हट जाती
है, वैसे ही प्रकृति
पुरुष को अपना स्वरूप
दिखाकर निवृत्त हो जाती है।
प्रकृति का प्रयोजन पूरा हो जाता
है।
पुरुष
के लिए उसका कार्य
समाप्त।
कैवल्य
का वास्तविक अर्थ
कैवल्य
का अर्थ है— पुरुष
की अपने विशुद्ध स्वरूप में स्थित स्वतंत्रता।
पुरुष
पहले भी शुद्ध था।
इसलिए मुक्ति में पुरुष का
कोई नया निर्माण नहीं
होता।
बदलती
है केवल— बुद्धि की दृष्टि। अज्ञान में— “मैं प्रकृति हूँ।” विवेक में— “प्रकृति मेरे अनुभव का क्षेत्र है।”
यही
अन्तर बन्धन और कैवल्य के
बीच की दूरी है।
सांख्य
की अन्तिम स्थापना
इस पूरी १५-भागीय
यात्रा को कुछ वाक्यों
में समेटें तो सांख्य कहता
है—
प्रकृति
परिवर्तनशील है। पुरुष चेतन साक्षी है। प्रकृति त्रिगुणात्मक है।
उसके
विकास से सम्पूर्ण अनुभव-जगत् प्रकट होता है।
पुरुष
अपने को प्रकृति से अभिन्न मानता है तो बन्धन का अनुभव होता है।
प्रकृति–पुरुष विवेक उत्पन्न होता है तो कैवल्य की प्राप्ति होती है।
इसलिए
सांख्य का लक्ष्य संसार
को नष्ट करना नहीं—
संसार
के साथ गलत तादात्म्य को समाप्त करना है।
पन्द्रह
भागों की पूरी यात्रा
हमारी
प्रारम्भिक सांख्य-श्रृंखला को एक क्रम
में देखें—
१.
सांख्य का परिचय और उसका मूल प्रश्न
↓
२. दुःख और मोक्ष की समस्या
↓
३. पुरुष और प्रकृति का द्वैत
↓
४. प्रकृति और त्रिगुण
↓
५. प्रकृति से सृष्टि-विकास
↓
६. महत्, बुद्धि और अहंकार
↓
७. मन, इन्द्रियाँ और सूक्ष्म तत्त्व
↓
८. तन्मात्रा और महाभूत
↓
९. पुरुष का स्वरूप और अनेकत्व
↓
१०. सत्कार्यवाद और कार्य-कारण सिद्धान्त
↓
११. प्रकृति–पुरुष संयोग और संसार
↓
१२. प्रमाण और यथार्थ ज्ञान
↓
१३. पच्चीस तत्त्वों का सम्पूर्ण मानचित्र
↓
१४. त्रिगुण का रहस्य
↓
१५. कर्तृत्व, भोक्तृत्व, विवेक और कैवल्य
इस प्रकार प्रारम्भिक अध्ययन की यात्रा— दुःख
से आरम्भ होकर कैवल्य तक पहुँचती है।
अब
आगे क्या?
यह १५-भागीय श्रृंखला
सांख्य का परिचय और समग्र दर्शन थी।
इसका
उद्देश्य प्रत्येक सिद्धान्त की सम्पूर्ण शास्त्रीय
परीक्षा करना नहीं था।
वह कार्य अब दूसरे चरण
में होगा।
सांख्य
दर्शन — विस्तार खण्ड उसमें हम—
- ईश्वरकृष्ण की प्रत्येक सांख्यकारिका को क्रम से लेंगे,
- मूल संस्कृत पाठ देंगे,
- पदच्छेद और अन्वय करेंगे,
- शाब्दिक तथा भावार्थ देंगे,
- कारिका का दार्शनिक भाष्य करेंगे,
- आवश्यकतानुसार सांख्यसूत्र और षष्टितन्त्र के सूत्रों को सामने रखेंगे,
- प्राचीन भाष्यों और टीकाओं से तुलना करेंगे,
- अन्य दर्शनों की आपत्तियाँ और सांख्य के उत्तर देखेंगे,
- तथा जहाँ आवश्यक होगा, आधुनिक दर्शन और विज्ञान के साथ संवाद स्थापित करेंगे।
अर्थात्
अभी हमने— “सांख्य क्या कहता है?” समझा है।
विस्तार
खण्ड में हमारा प्रश्न
होगा—
“सांख्य
ऐसा क्यों कहता है, उसका प्रमाण क्या है, उसके विरुद्ध क्या आपत्तियाँ हैं और उसकी दार्शनिक शक्ति कहाँ तक है?”
यही
दोनों खण्डों के बीच का
मूल अन्तर होगा।
उपसंहार
सांख्य
मनुष्य से अन्त में
कोई कठिन धार्मिक विश्वास
माँगता हुआ नहीं दिखाई
देता।
वह केवल कहता है—
देखो।
अपने
शरीर को देखो। अपने मन
को देखो। अपनी बुद्धि को देखो। अपने अहंकार
को देखो। इन सबके परिवर्तन को
देखो।
और फिर पूछो— इन
सबको देखने वाला कौन है?
जिस
दिन यह प्रश्न केवल
बौद्धिक प्रश्न न रहकर विवेक
का प्रत्यक्ष अनुभव बन जाता है,
उसी दिन सांख्य की
यात्रा अपने लक्ष्य की
ओर पहुँचती है।
प्रकृति
को जानना सांख्य का ज्ञान है।
पुरुष
को प्रकृति से पृथक् जानना उसका विवेक है।
और—
पुरुष का अपने स्वरूप में स्थित होना ही कैवल्य है।
सांख्य दर्शन — प्रथम खण्ड समाप्त
१५
भागों की यह श्रृंखला यहीं पूर्ण होती है।
आगे
जब “सांख्य दर्शन — विस्तार खण्ड” आरम्भ होगा, तो हम पुनरावृत्ति
से बचते हुए सीधे
मूल ग्रन्थों में प्रवेश करेंगे—कारिका-दर-कारिका और सूत्र-दर-सूत्र।
मुकेश
श्रीवास्तव
आत्मसन्तुलन आध्यात्मिक ऊर्जा केंद्र
(इस
ब्लॉग के सभी लेख ब्लॉग होल्डर की अनुमति के बिना कहीं भी उल्लेख करने की अनुमति नहीं है।)
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