पाणिनीय दर्शन भाग–५ संधि और रूपपरिवर्तन — परिवर्तन के भीतर व्यवस्था की खोज
पाणिनीय दर्शन
भाग–५
संधि
और रूपपरिवर्तन — परिवर्तन के भीतर व्यवस्था की खोज
जब
ध्वनि बदलती है, तो शब्द की पहचान कैसे बनी रहती है?
पिछले
भाग में हमने पाणिनीय
ध्वनिव्यवस्था को देखा था।
शिवसूत्रों, प्रत्याहार और इत्संज्ञा के
माध्यम से यह स्पष्ट
हुआ कि पाणिनि ध्वनियों
को केवल सुनाई देने
वाली घटनाओं के रूप में
नहीं, बल्कि व्याकरणिक रूप से कार्यशील इकाइयों के रूप में
व्यवस्थित करते हैं।
अब प्रश्न स्वाभाविक रूप से आगे
बढ़ता है।
यदि
ध्वनियाँ अलग-अलग इकाइयाँ
हैं, तो जब वे
एक-दूसरे के सम्पर्क में
आती हैं, तब क्या
होता है?
भाषा
में हम देखते हैं
कि दो शब्द या
दो ध्वनियाँ पास आने पर
उनके रूप में परिवर्तन
हो सकता है। कभी
एक ध्वनि दूसरी में परिवर्तित होती
है, कभी कोई ध्वनि
लुप्त हो जाती है,
कहीं नई ध्वनि का
आगमन होता है, कहीं
गुण या वृद्धि होती
है।
यह सब पहली दृष्टि
में परिवर्तन जैसा दिखाई देता
है।
लेकिन
पाणिनीय दृष्टि पूछती है—
क्या
यह परिवर्तन वास्तव में अव्यवस्था है, या इसके पीछे भी कोई कठोर नियम है?
यहीं
से संधि और रूपपरिवर्तन का क्षेत्र आरम्भ
होता है। इस भाग का मूल
दार्शनिक प्रश्न इसलिए यह है—
यदि
भाषिक रूप निरन्तर बदलते रहते हैं, तो उस परिवर्तन के भीतर स्थायित्व कहाँ है?
परिवर्तन
भाषा का स्वभाव है
भाषा
स्थिर पदार्थ नहीं है। ध्वनियाँ उच्चारण
में एक-दूसरे से
प्रभावित होती हैं।
शब्दों
के मेल से उनके
रूप बदलते हैं।
व्याकरणिक
प्रत्ययों के जुड़ने से
भी मूल रूप में
परिवर्तन आता है।
इसलिए
भाषा को केवल— “जो
है” के रूप में
देखना पर्याप्त नहीं।
उसे—
“जो बनता है” के रूप में
भी देखना पड़ता है।
पाणिनीय
व्याकरण का महत्त्व इसी
दूसरे पक्ष में विशेष
रूप से दिखाई देता
है।
वह केवल सिद्ध शब्दों
की सूची नहीं देता।
वह यह समझने का प्रयास करता
है कि—
एक
रूप से दूसरा रूप किस नियम के अनुसार सिद्ध होता है।
संधि
— मिलन में परिवर्तन
“संधि”
का सामान्य अर्थ है— मिलन।
लेकिन भाषिक मिलन हमेशा निष्क्रिय
नहीं होता।
दो ध्वनियाँ एक-दूसरे के
समीप आती हैं तो
उनका परस्पर प्रभाव हो सकता है।
स्वरों
के संयोग में परिवर्तन हो
सकता है।
व्यंजनों
के संयोग में परिवर्तन हो
सकता है।
शब्दों
या पदों के सम्पर्क
में भी रूपगत परिवर्तन
दिखाई दे सकता है।
इसलिए
संधि को केवल— “दो
शब्दों को जोड़ना” कहना
पर्याप्त नहीं।
पाणिनीय
दृष्टि में यह— ध्वनियों
और रूपों के पारस्परिक सम्बन्ध से उत्पन्न नियमबद्ध परिवर्तन का क्षेत्र है।
संधि
में क्या बदलता है?
यह प्रश्न जितना सरल लगता है,
उतना है नहीं।
जब दो ध्वनियाँ मिलती
हैं और नया रूप
बनता है, तो हमें
देखना पड़ता है—
क्या
पहली ध्वनि बदली?
क्या
दूसरी बदली?
क्या
दोनों का कोई नया
रूप बना?
क्या
कोई ध्वनि लुप्त हुई?
क्या
कोई ध्वनि बीच में आई?
यही
कारण है कि पाणिनीय
व्याकरण में परिवर्तन के
अनेक प्रकारों को अलग-अलग
नियमों के द्वारा व्यवस्थित
किया गया है।
यहाँ—
परिवर्तन स्वयं अध्ययन का विषय बन जाता है।
आदेश
— एक रूप के स्थान पर दूसरा
पाणिनीय
व्याकरण में आदेश की संकल्पना अत्यन्त
महत्वपूर्ण है। सरल रूप में—
किसी
निर्धारित परिस्थिति में एक भाषिक
तत्व के स्थान पर
दूसरा तत्व आ जाए।
यह परिवर्तन आकस्मिक नहीं।
वह किसी विशिष्ट नियम
से निर्धारित होता है। इससे एक
महत्त्वपूर्ण सिद्धान्त सामने आता है—
रूप
बदल सकता है, लेकिन परिवर्तन भी नियम के अधीन है।
यही
पाणिनीय दृष्टि की शक्ति है।
भाषा
में परिवर्तन होने का अर्थ
यह नहीं कि भाषा
अराजक है।
परिवर्तन
भी— व्यवस्थित प्रक्रिया हो सकता है।
लोप
— अनुपस्थिति भी नियमबद्ध हो सकती है
पाणिनीय
व्याकरण में लोप का स्थान विशेष
है।
किसी
व्याकरणिक प्रक्रिया में कोई तत्व
अन्तिम रूप में दिखाई
न दे, तो इसका
अर्थ यह नहीं कि
वह विश्लेषण की दृष्टि से
कभी था ही नहीं।
किसी
नियम के अनुसार उसका
लोप हो सकता है।
यहाँ
भाग–४ में चर्चा
किए गए इत्संज्ञक तत्वों
की बात फिर एक
नये स्तर पर समझ
में आती है।
हमने
वहाँ देखा था— जो
व्याकरणिक रूप में कार्य
करता है, वह अन्तिम
रूप में आवश्यक नहीं
कि दिखाई दे।
अब हम देखते हैं—
किसी रूप का परिवर्तन स्वयं लोप के द्वारा भी हो सकता है।
इससे
व्याकरणिक प्रक्रिया में एक रोचक
अन्तर बनता है— दृश्य
रूप जो अन्ततः उच्चरित
या लिखित है।
प्रक्रियात्मक
रूप जो सिद्धि की
प्रक्रिया में किसी चरण
पर उपस्थित था। यह अन्तर पाणिनीय विश्लेषण की सूक्ष्मता को
दिखाता है।
आगम
— जो पहले नहीं था, वह कैसे आया?
यदि
लोप में कोई तत्व
हटता है, तो दूसरी
दिशा में प्रश्न उठता
है—
क्या
व्याकरणिक प्रक्रिया में कोई नया तत्व आ भी सकता है? - हाँ।
यहीं
आगम जैसी प्रक्रियाएँ महत्त्वपूर्ण
होती हैं।
किसी
निश्चित व्याकरणिक परिस्थिति में कोई तत्व
जो पूर्वरूप में प्रत्यक्ष नहीं
था, प्रक्रिया के परिणामस्वरूप उपस्थित
हो सकता है।
इससे
रूपपरिवर्तन का एक व्यापक
चक्र सामने आता है— आदेश
— लोप — आगम
अर्थात्—
कुछ बदल सकता है,
कुछ हट सकता है,
कुछ आ सकता है।
लेकिन तीनों ही— नियमबद्ध हो सकते हैं।
परिवर्तन
का अर्थ विनाश नहीं
यहाँ
एक गहरी दार्शनिक सम्भावना
दिखाई देती है।
यदि
किसी रूप में परिवर्तन
हुआ तो क्या मूल
रूप समाप्त हो गया?
व्याकरणिक
दृष्टि से ऐसा कहना
बहुत सरल होगा।
लेकिन
प्रक्रिया की दृष्टि से
देखें तो— मूल रूप
एक विशिष्ट व्याकरणिक स्थिति में था, नियम
सक्रिय हुआ,
और उसके बाद नया
रूप सिद्ध हुआ।
इसलिए
परिवर्तन को केवल— “पुराने
का विनाश” कहना पर्याप्त नहीं।
वह—
एक संरचना से दूसरी संरचना में संक्रमण भी हो सकता
है।
यही
कारण है कि पाणिनीय
व्याकरण में “परिवर्तन” को
समझने के लिए प्रक्रिया
का अध्ययन आवश्यक है।
गुण
और वृद्धि — परिवर्तन की सूक्ष्मता
पाणिनीय
प्रणाली में गुण और वृद्धि जैसी संज्ञाएँ केवल
ध्वनि-विवरण नहीं हैं।
वे विशिष्ट ध्वनि-रूप परिवर्तनों को
व्यवस्थित करने वाली तकनीकी
श्रेणियाँ हैं।
अष्टाध्यायी
के आरम्भ में ही— अदेङ्
गुणः। १।१।२
जैसे
सूत्रों के माध्यम से
गुण की संज्ञात्मक व्यवस्था
सामने आती है।
यह तथ्य बहुत महत्वपूर्ण
है। पाणिनि किसी परिवर्तन को
केवल उदाहरण के रूप में
नहीं छोड़ते।
वे—
परिवर्तन को तकनीकी श्रेणी में बदलते हैं। फिर उस श्रेणी
पर आगे नियम कार्य
कर सकते हैं।
इस प्रकार— परिवर्तन → संज्ञा → नियम का सम्बन्ध बनता है।
परिवर्तन
को नाम देना — परिवर्तन को नियंत्रित करना
यहाँ
पाणिनीय पद्धति का एक महत्त्वपूर्ण
सिद्धान्त सामने आता है।
जब किसी प्रकार के
रूपपरिवर्तन को एक तकनीकी
संज्ञा दी जाती है,
तब वह परिवर्तन आगे
व्याकरणिक तन्त्र में एक पहचानी
जाने वाली इकाई बन
जाता है।
इससे—
भाषा का विविध व्यवहार
एक— व्यवस्थित वर्ग
में बदल जाता है।
यह वही पद्धति है
जिसे हमने भाग–२
में व्यापक स्तर पर देखा
था।
वहाँ
संज्ञाएँ नियमों के संचालन की
इकाइयाँ बनी थीं।
यहाँ—
रूपपरिवर्तन स्वयं संज्ञात्मक होकर नियमों की इकाई बनता है।
इससे
अष्टाध्यायी की आन्तरिक एकता
और स्पष्ट होती है।
संधि
और शब्द की पहचान
अब उस प्रश्न पर
लौटें जिससे हमने भाग आरम्भ
किया था—
जब
ध्वनि बदलती है, तो शब्द की पहचान कैसे बनी रहती है?
मान
लीजिए किसी शब्द का
बाहरी रूप संधि के
कारण बदल गया।
क्या
उसका मूल व्याकरणिक सम्बन्ध
समाप्त हो जाता है?
- नहीं।
व्याकरण
उस रूपपरिवर्तन को नियम के
भीतर रखता है।
इससे
हमें एक महत्त्वपूर्ण अन्तर
दिखाई देता है—
बाहरी
रूप बदल सकता है, लेकिन व्याकरणिक सम्बन्ध बना रह सकता है।
अर्थात्—
रूपगत परिवर्तन ≠ संरचनात्मक विनाश।
यही
इस भाग का पहला
बड़ा दार्शनिक निष्कर्ष है।
रूप और संरचना
यहाँ
भाग–३ से हमारी
यात्रा जुड़ती है। भाग–३ में हमने
शब्द की संरचना को
प्रकृति और प्रत्यय आदि
के माध्यम से समझा था।
अब भाग–५ में
देखते हैं कि वही
संरचना आगे— ध्वनि-परिवर्तन,
आदेश, लोप, आगम, गुण,
वृद्धि आदि प्रक्रियाओं से प्रभावित हो
सकती है।
इससे
स्पष्ट होता है कि
पाणिनीय शब्द— एक स्थिर ईंट
नहीं है। वह— नियमों के भीतर गतिशील संरचना है।
परिवर्तन
में क्रम का प्रश्न
यदि
अनेक नियम किसी एक
रूप पर लागू हो
सकते हैं तो एक
अत्यन्त कठिन समस्या पैदा
होती है—
पहले
कौन-सा नियम लागू होगा? यदि क्रम बदल
जाए तो क्या अन्तिम
रूप भी बदल सकता
है?
यह प्रश्न पाणिनीय व्याकरण में अत्यन्त महत्वपूर्ण
है।
क्योंकि
किसी प्रक्रिया में— पहले A हुआ,
फिर— B हुआ, तो परिणाम
कुछ और हो सकता
है।
यदि
पहले B और फिर A हो
जाए, तो परिणाम बदल
सकता है। इसलिए नियमों की केवल सूची
पर्याप्त नहीं।
उनके—
कार्य-संबन्ध और क्रम को समझना भी
आवश्यक है।
नियम-संघर्ष — जब दो नियम आमने-सामने हों
भाग–२ में हमने
नियमों की पारस्परिकता की
चर्चा की थी।
अब वही समस्या शब्दरूप
के स्तर पर दिखाई
देती है।
मान
लें— नियम A लागू हो सकता
है। और— नियम B भी लागू हो
सकता है।
तो क्या दोनों लागू
होंगे? यदि हाँ, तो
किस क्रम में?
यदि
केवल एक लागू होगा,
तो क्यों?
यहीं
पाणिनीय परम्परा की परिभाषात्मक और
नियम-संगठनात्मक शक्ति सामने आती है।
इस प्रकार— व्याकरण में परिवर्तन का विज्ञान, नियमों के पारस्परिक सम्बन्ध के विज्ञान से अलग नहीं है।
यहाँ
भाग–२ की संरचना
अब व्यवहारिक रूप लेती है।
“विप्रतिषेधे
परं कार्यम्” — एक निर्णायक सिद्धान्त पाणिनीय परम्परा का प्रसिद्ध सूत्र
है—
विप्रतिषेधे
परं कार्यम्। १।४।२
सामान्य
अर्थ में— जब दो नियमों में परस्पर विरोध हो, तो बाद वाला कार्य करता है।
इस सूत्र की व्याख्या अत्यन्त
सूक्ष्म है और इसके
प्रयोग की सीमा को
परिभाषाओं तथा व्याकरणिक सन्दर्भों
के साथ समझना पड़ता
है।
लेकिन
यहाँ इसका एक बुनियादी
महत्व स्पष्ट है।
पाणिनीय
प्रणाली यह मानकर नहीं
चलती कि नियम हमेशा
अकेले काम करेंगे।
वह यह भी सोचती
है कि— नियमों के बीच टकराव हो सकता है। और उस टकराव
को हल करने के
लिए सिद्धान्त चाहिए।
यही
किसी परिपक्व formal system की पहचान है।
“परं”
का अर्थ केवल समय नहीं
यहाँ
एक सूक्ष्म सावधानी आवश्यक है।
“परं
कार्यम्” को केवल— “जो
बाद में समय की
दृष्टि से आया वही
लागू होगा” मान लेना उचित
नहीं।
व्याकरणिक
“पूर्व” और “पर” की
व्याख्या सन्दर्भानुसार अधिक तकनीकी हो
सकती है।
इसलिए
इस सूत्र को— नियमों के पारस्परिक संघर्ष में प्राथमिकता निर्धारित करने वाला सिद्धान्त
समझना
अधिक सुरक्षित है।
यही
कारण है कि पाणिनीय
व्याकरण का अध्ययन केवल
सूत्र-पाठ नहीं है।
सूत्र
के— कार्यक्षेत्र, सम्बन्ध, परिभाषा, और— प्रयोग-सन्दर्भ
को भी समझना पड़ता है।
परिवर्तन
और स्थायित्व — दार्शनिक प्रश्न
अब हम इस भाग
के मूल प्रश्न के
निकट पहुँचते हैं।
भाषा
बदलती है। ध्वनियाँ बदलती हैं। रूप बदलते हैं। प्रत्यय जुड़ते हैं। कहीं लोप होता है।
कहीं आगम होता है।
फिर
भी हम कहते हैं—
“यह वही शब्द है।”
तो—
वहीपन कहाँ है?
क्या
वह ध्वनि में है?
लेकिन
ध्वनि बदल गई।
क्या
वह बाहरी रूप में है?
वह भी बदल गया।
क्या
वह केवल अर्थ में
है?
यह प्रश्न अभी खुला है।
या—
वहीपन उस व्याकरणिक संरचना में है जो परिवर्तन के पीछे बनी रहती है?
पाणिनीय
व्याकरण इस अंतिम दार्शनिक
प्रश्न का पूर्ण समाधान
प्रत्यक्ष रूप से नहीं
देता, लेकिन उसकी प्रक्रिया-व्यवस्था
हमें इस प्रश्न तक
अवश्य पहुँचाती है।
परिवर्तन
और नियम — अराजकता से व्यवस्था
यदि
भाषा में परिवर्तन है,
तो पहली दृष्टि में
हमें अव्यवस्था दिखाई दे सकती है।
लेकिन
पाणिनीय व्याकरण हमें दूसरी दृष्टि
देता है।
वह कहता है— परिवर्तन
भी नियमबद्ध हो सकता है।
लोप
का नियम है। आगम का
नियम है। आदेश का नियम है।
गुण का नियम है। वृद्धि का
नियम है। संधि का नियम है।
और नियमों के संघर्ष का
भी नियम है।
अर्थात्—
परिवर्तन स्वयं व्यवस्था के भीतर समाहित है। यही पाणिनीय प्रणाली
की गहरी बौद्धिक उपलब्धि
है।
भाषा
में “स्थिरता” कहाँ है?
अब एक दार्शनिक मॉडल
सामने रखा जा सकता
है।
भाषा
में तीन स्तर हैं—
१.
दृश्य रूप - जो हमें सुनाई
या दिखाई देता है।
२.
रूपपरिवर्तन - जिसके कारण दृश्य रूप
बदलता है।
३.
नियम-संरचना -जो परिवर्तन को
नियंत्रित करती है।
इस मॉडल में— दृश्य
रूप बदल सकता है,
लेकिन—
नियम-संरचना स्थायित्व प्रदान करती है।
यहाँ
“स्थायित्व” को किसी metaphysical शाश्वत सत्ता
के अर्थ में नहीं
लेना चाहिए।
यह—
व्यवस्था का स्थायित्व है। यही सावधानी पाणिनीय दर्शन की व्याख्या में
आवश्यक है।
कठोर
परीक्षा — क्या परिवर्तन से मूल सत्ता नष्ट हो जाती है?
पूर्वपक्ष
यदि
किसी शब्द का मूल
रूप संधि, लोप या आदेश
के कारण बदल गया,
तो कहा जा सकता
है कि मूल शब्द
अब मौजूद नहीं है।
उत्तर- यह निष्कर्ष बहुत
जल्दी होगा।
व्याकरणिक
प्रक्रिया में परिवर्तन का
अर्थ यह है कि
एक विशिष्ट परिस्थिति में एक रूप
से दूसरा रूप सिद्ध हुआ।
परिवर्तन
के बाद भी उसके
व्याकरणिक कारण और सम्बन्ध
विश्लेषणीय रहते हैं।
इसलिए—
रूप का परिवर्तन उसकी व्याकरणिक पहचान का पूर्ण विनाश नहीं है।
दूसरी
आपत्ति
लेकिन
यदि हम हर परिवर्तन
के पीछे कोई “अदृश्य
मूल सत्ता” मान लें तो
हम व्याकरण से metaphysics निकाल रहे होंगे।
समाधान
- सही। - इसलिए
निष्कर्ष इतना ही होना
चाहिए—
पाणिनीय
रूप-सिद्धि परिवर्तन को नियमबद्ध प्रक्रिया के रूप में प्रस्तुत करती है; इससे किसी स्वतंत्र शाश्वत शब्द-सत्ता का सिद्धान्त अभी सिद्ध नहीं होता।
यह सिद्धान्त हमें आगे के
व्याकरण-दर्शन के लिए तैयार
करता है, लेकिन उसे
पहले से स्थापित नहीं
करता।
पाणिनीय
दर्शन की ओर एक और कदम
अब तक हमारी यात्रा—
भाग–१ : व्याकरण दर्शन क्यों हो सकता है? से शुरू हुई।
फिर— भाग–२ : अष्टाध्यायी की संरचना फिर—
भाग–३ : शब्दरचना फिर— भाग–४ : ध्वनि और प्रत्याहार और अब— भाग–५ : परिवर्तन और संधि तक पहुँच चुकी
है।
इस क्रम में एक
गहरी रेखा दिखाई देती
है— व्यवस्था → संरचना → ध्वनि → परिवर्तन
लेकिन
अभी भाषा का सबसे
बड़ा प्रश्न सामने नहीं आया है।
क्योंकि
शब्दों के बनने और
बदलने से अधिक कठिन
प्रश्न है— शब्द अर्थ कैसे देता है?
अगले
भाग की ओर — शब्द और अर्थ
अब तक हमने शब्द
के— रूप, निर्माण, ध्वनि,
और— परिवर्तन को देखा है।
अब पहली बार हमारी
यात्रा सीधे अर्थ की
ओर जाएगी। जब हम “गौः” कहते
हैं, तो केवल ध्वनि
सुनाई नहीं देती।
एक अर्थ-बोध उत्पन्न
होता है।
जब
“गच्छति” कहते हैं, तो
केवल ध्वनि-समूह नहीं रहता।
- एक क्रिया का बोध होता
है।
तो प्रश्न है— शब्द और अर्थ के बीच सम्बन्ध क्या है?
क्या
शब्द स्वयं अर्थ का वाहक
है?
क्या
शब्द और अर्थ का
सम्बन्ध स्वाभाविक है?
क्या
यह परम्परा से बना है?
क्या
व्याकरण इस सम्बन्ध को
निर्धारित करता है या
केवल उसका विश्लेषण करता
है?
और सबसे महत्वपूर्ण—
क्या
पाणिनीय व्याकरण में शब्द-अर्थ सम्बन्ध की कोई ऐसी आधारभूमि है जिससे आगे व्याकरण-दर्शन विकसित हुआ?
यही
प्रश्न भाग–६ का केन्द्र होगा।
निष्कर्ष
पाणिनीय
व्याकरण में भाषा परिवर्तनशील
है।
ध्वनियाँ
बदलती हैं। रूप बदलते हैं। कहीं संधि होती है।
कहीं आदेश। कहीं
लोप। कहीं आगम। कहीं गुण-वृद्धि।
लेकिन
इन परिवर्तनों के भीतर एक
गहरी बात बनी रहती
है— परिवर्तन स्वयं नियमबद्ध है।
इसलिए
पाणिनीय दृष्टि हमें भाषा की
एक अद्भुत तस्वीर देती है— भाषा
स्थिर नहीं है, फिर भी अराजक नहीं है।
उसमें
परिवर्तन है— पर नियमहीन
परिवर्तन नहीं। उसमें विविधता है—
पर असम्बद्ध विविधता नहीं।
उसमें
रूप बदलते हैं— पर परिवर्तन
के पीछे संरचना काम
करती है।
यही
इस भाग की सबसे
महत्वपूर्ण दार्शनिक उपलब्धि है—
पाणिनि
के लिए व्यवस्था का अर्थ स्थिरता नहीं; व्यवस्था वह सिद्धान्त है जो परिवर्तन को भी नियमबद्ध बनाता है।
और अब हमारी यात्रा
उस सीमा पर आ
पहुँची है जहाँ केवल
रूप पर्याप्त नहीं।
क्योंकि
मनुष्य शब्द का उच्चारण
इसलिए नहीं करता कि
केवल ध्वनि उत्पन्न हो।
वह शब्द इसलिए बोलता
है कि— किसी अर्थ का बोध हो।
इसलिए
अगला प्रश्न अनिवार्य है— शब्द अर्थ कैसे देता है?
यहीं
से पाणिनीय व्याकरण की यात्रा— रूप
से अर्थ की ओर मुड़ेगी।
मुकेश
श्रीवास्तव
आत्मसन्तुलन आध्यात्मिक ऊर्जा केंद्र
पाणिनीय
दर्शन — १५ भागों की शोधपरक श्रृंखला
भाग–५ : संधि और रूपपरिवर्तन — परिवर्तन के भीतर व्यवस्था की खोज
नोट
: इस श्रृंखला में प्रत्येक भाग
पाणिनीय दर्शन के एक स्वतंत्र
और नये पक्ष का
अध्ययन करता है। पूर्ववर्ती
भागों में विवेचित विषयों
की अनावश्यक पुनरावृत्ति नहीं की जाएगी।
अष्टाध्यायी को मूल आधार,
वार्तिक और महाभाष्य को
प्राथमिक व्याख्यात्मक आधार तथा परवर्ती
व्याकरण-दर्शन को दार्शनिक विकास
के रूप में ग्रहण
किया जाएगा। माधवाचार्यकृत सर्वदर्शनसंग्रह का उपयोग तुलनात्मक
एवं ऐतिहासिक स्रोत के रूप में
किया जाएगा। जहाँ पाणिनि, पतञ्जलि
और परवर्ती व्याकरण-दर्शन के विचारों में
ऐतिहासिक अन्तर होगा, वहाँ उन्हें एक-दूसरे पर आरोपित नहीं
किया जाएगा।
(इस
ब्लॉग के सभी लेख ब्लॉग होल्डर की अनुमति के बिना कहीं भी उल्लेख करने की अनुमति नहीं है।)
Comments
Post a Comment