भाग ५७ — गंगा का अवतरण और धर्म के चार आश्रम : नदियों की उत्पत्ति का आख्यान

 भाग ५७ — गंगा का अवतरण और धर्म के चार आश्रम : नदियों की उत्पत्ति का आख्यान

हरिवंशपुराण, भविष्यपर्व — अध्याय १७ के आधार पर

पिछले अध्याय में जनमेजय की जिज्ञासा के उत्तर में परम ब्रह्म, सृष्टि, जीव, कर्म और मोक्ष का विवेचन हुआ था। अब वैशम्पायन का वर्णन सृष्टि के एक दूसरे पक्ष की ओर बढ़ता है। इस अध्याय में सुमेरु पर्वत, ब्रह्मा, ब्रह्म की व्यापकता, गंगा के प्रवाह, वेद, यज्ञ और धर्म के चार आश्रमों का उल्लेख मिलता है।

इस प्रसंग को श्रीकृष्ण की प्रत्यक्ष लीला न मानकर भविष्यपर्व के सृष्टि-वर्णन और धर्म-विवेचन की अगली कड़ी के रूप में पढ़ना चाहिए। यहाँ मूल आख्यान में ग्रन्थ में वर्णित घटनाओं और विचारों का सार दिया गया है, जबकि व्याख्या में उनके अर्थ और महत्त्व पर अलग से विचार किया गया है।

मूल आख्यान : सुमेरु पर्वत और दिव्य पुरुष

महर्षि वैशम्पायन जनमेजय को सुमेरु पर्वत और उससे सम्बद्ध दिव्य पुरुष का वर्णन सुनाते हैं। अध्याय के आरम्भ में मैनाक पर्वत का उल्लेख आता है। पर्वत के स्थिर रहने और उसके स्वरूप से सम्बन्धित नामों की व्याख्या के बाद सुमेरु की विशालता का वर्णन किया गया है।

सुमेरु के विस्तृत शिखर पर तेज से उत्पन्न एक दिव्य पुरुष के निवास की बात कही गई है। उसका प्राकट्य महात्मा और प्रकृति से सम्बद्ध बताया गया है। उसके मस्तक में स्थित ब्रह्मतेज प्रकाशमान पुरुष के रूप में प्रकट होता है और उसके मुख से चार मुखों वाले ब्रह्मा का प्राकट्य होता है। ब्रह्मा के साथ ब्रह्मज्ञान के ज्ञाता द्विजों का उल्लेख भी मिलता है।

इसके बाद महाभूतों के पुनः प्रकट होने और पृथ्वी के जल से ऊपर उठाए जाने का वर्णन आता है। ब्रह्मा का क्षेत्र सुमेरु के शिखर पर बताया गया है, जो स्वर्ग और पृथ्वी के संयोग-स्थल के रूप में वर्णित है। पर्वत की ऊँचाई, विस्तार और परिधि को इतना विशाल कहा गया है कि उसका मापन सामान्य मानवीय गणना से सम्भव नहीं है।

महर्षि बताते हैं कि अनेक तपस्वी और ब्रह्मज्ञान के ज्ञाता सुमेरु के अनेक गुणों का वर्णन करते हैं। देवताओं, मरुद्गणों, रुद्रों, वसुओं, आदित्यों और विश्वेदेवों के साथ उसके सम्बन्ध का भी उल्लेख है। इस प्रकार सुमेरु केवल भौगोलिक विस्तार का विषय नहीं रहता, बल्कि देवताओं और दिव्य शक्तियों से जुड़ा हुआ क्षेत्र बनकर सामने आता है।

मूल आख्यान : ब्रह्म की व्यापकता और वैदिक कर्म

अध्याय आगे कहता है कि तीनों लोक ब्रह्म में स्थित हैं और ब्रह्म व्यक्त तथा अव्यक्त—दोनों रूपों में व्याप्त है। वेदों के ज्ञाता ब्राह्मण विविध वैदिक विधियों और अनुष्ठानों के माध्यम से ब्रह्म की उपासना करते हैं।

यहाँ नित्यकर्मों का उल्लेख मिलता है। वे कर्म, जो वेदों द्वारा अनुमोदित हैं और जिन्हें सत्यनिष्ठ तथा शुद्ध अन्तःकरण वाले लोग करते हैं, कल्याणकारी माने गए हैं। फिर भी अध्याय यह संकेत देता है कि ऐसे कर्मों से प्राप्त होने वाले फल ब्रह्म की व्यापकता का केवल एक छोटा अंश हैं। सम्पूर्ण जगत् को ब्रह्म का अत्यन्त सूक्ष्म अंश बताया गया है।

मनुष्यों की मानसिक प्रवृत्तियों में भिन्नता होने के कारण वे एक ही ब्रह्म की उपासना ब्रह्मा, इन्द्र, मित्र, वरुण आदि विभिन्न नामों से करते हैं। इस वर्णन में उपासना के अनेक रूपों के बीच एक व्यापक परम तत्त्व की धारणा प्रस्तुत की गई है।

इसके बाद स्थूल जगत् और सूक्ष्म मन का उल्लेख आता है। ग्रन्थ इन दोनों रूपों को बुद्धि और उसके अनुभव से जोड़ते हुए स्त्री-पुरुष के संयोग तथा विविध भोगों की व्यवस्था का वर्णन करता है। आगे ब्रह्मा और देवी के सम्बन्ध का प्रसंग आता है।

मूल आख्यान : दिव्य जलधारा और गंगा का अवतरण

इस अध्याय का मुख्य आकर्षण गंगा के प्रवाह से जुड़ा हुआ वर्णन है। ब्रह्मा, देवी, पार्वती और महेश्वर से सम्बद्ध प्रसंग के बाद स्वर्ग से पृथ्वी की ओर आने वाली जलधारा का उल्लेख मिलता है। इस धारा को दिव्य स्वरूप प्रदान किया गया है और उसके प्रवाह को गंगा के नाम से जोड़ा गया है।

ग्रन्थ के अनुसार वह जलधारा ब्रह्मा के क्षेत्र से सम्बद्ध होकर पर्वतों के बीच से आगे बढ़ती है। मार्ग में आने वाले पर्वतों को पार करते हुए वह सात मार्गों से पृथ्वी पर उतरती है। इसी प्रवाह के कारण उसे गंगा कहा गया है।

आगे गंगा के गोदावरी के रूप में सात धाराओं में विभक्त होने तथा जाह्नवी के रूप में अनेक पवित्र तीर्थों से होकर बहने का उल्लेख मिलता है। मनमथा नाथ दत्त के अंग्रेज़ी अनुवाद में यह विवरण इसी रूप में प्रस्तुत है। इन नामों और प्रवाहों का आपसी सम्बन्ध मूल पाठ की जटिलता के कारण सावधानी से समझना चाहिए; इन्हें बिना पाठ-समीक्षा के आधुनिक नदियों के सम्पूर्ण भौगोलिक इतिहास के समान नहीं मानना चाहिए।

गंगा का यह वर्णन केवल जल के बहने की घटना नहीं है। इसमें दिव्य क्षेत्र से पृथ्वी तक पहुँचने वाली धारा, पर्वतों के बीच उसका मार्ग और अनेक पवित्र स्थलों से उसका सम्बन्ध एक साथ सामने आता है।

मूल आख्यान : वेद, यज्ञ और धर्म के चार आश्रम

गंगा के वर्णन के बाद अध्याय फिर सृष्टि और धर्म की व्यवस्था की ओर लौटता है। इसमें कहा गया है कि महाभूतों के प्रकट होने के बाद बुद्धि से सम्बद्ध कर्मों का क्रम आरम्भ होता है। ब्रह्मा के चार कमल-सदृश मुखों से वेदों के प्रकट होने का वर्णन मिलता है। वेद मनुष्यों के लिए आध्यात्मिक शिक्षा के स्रोत माने गए हैं।

यज्ञ को ज्ञान से उत्पन्न व्यवस्था बताया गया है और चार ऋत्विजों को उसके चार आधारों के रूप में प्रस्तुत किया गया है। इस वर्णन में यज्ञ, वेद और ज्ञान को परस्पर सम्बद्ध माना गया है।

इसके बाद धर्म के चार आश्रमों का वर्णन आता है। ये हैं—

  • ब्रह्मचर्य — विद्यार्थी का जीवन, जिसमें अध्ययन और अनुशासन प्रमुख हैं।

  • गृहस्थ — परिवार और सामाजिक उत्तरदायित्वों से जुड़ा जीवन।

  • वानप्रस्थ — वन में निवास करने वाले धार्मिक साधक की अवस्था, जिसमें तप और आत्मचिन्तन का महत्त्व बढ़ता है।

  • ब्रह्मनिष्ठ अवस्था — महान् ब्रह्म के साथ एकत्व की ओर उन्मुख जीवन।

अध्याय इन चार अवस्थाओं को धर्म की व्यवस्था से जोड़ता है और उन्हें उच्च आध्यात्मिक लक्ष्य की ओर ले जाने वाला मार्ग बताता है। इसके बाद योगाभ्यास तथा वेदान्त के यथार्थ बोध से मनुष्य की मानसिक क्षमताओं के विकास का उल्लेख मिलता है। वेदों का सम्बन्ध ब्रह्मचर्य के अभ्यास से जोड़ा गया है।

अन्त में पितरों की तृप्ति को गृहस्थों के आचरण से और सुमेरु पर स्थित ऋषियों की तृप्ति को योग से सम्बद्ध बताया गया है। इस प्रकार अध्याय विभिन्न जीवन-मार्गों के अपने-अपने कर्तव्यों और महत्त्व को सामने रखता है।

व्याख्या : सुमेरु का महत्त्व

सुमेरु का वर्णन पुराण की ब्रह्माण्ड-कल्पना में एक महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है। उसे देवताओं, ऋषियों और दिव्य शक्तियों से सम्बद्ध क्षेत्र के रूप में प्रस्तुत किया गया है। उसकी असीमित ऊँचाई और विस्तार का उल्लेख उसे सामान्य पर्वतों से अलग करता है।

दार्शनिक दृष्टि से सुमेरु को जगत् की विराटता का प्रतीक मानकर पढ़ा जा सकता है। मनुष्य अपने आसपास के संसार को सीमित अनुभवों के आधार पर समझता है, जबकि पुराण का सुमेरु उस व्यापक जगत् की कल्पना सामने रखता है जो सामान्य माप और अनुभव से परे है।

यह प्रतीकात्मक अर्थ हमारी व्याख्या है; मूल आख्यान का प्रत्यक्ष कथन सुमेरु की दिव्य स्थिति, विशालता और देवताओं से उसके सम्बन्ध का वर्णन करता है।

व्याख्या : एक ब्रह्म और अनेक उपासनाएँ

अध्याय का एक महत्त्वपूर्ण विचार यह है कि तीनों लोक ब्रह्म में स्थित हैं और ब्रह्म व्यक्त तथा अव्यक्त रूपों में व्याप्त है। इसी के साथ विभिन्न देवताओं के नामों से उपासना का उल्लेख किया गया है।

इससे एक व्यापक धार्मिक विचार सामने आता है—उपासना के अनेक रूप हो सकते हैं, किन्तु उनके पीछे एक परम तत्त्व की खोज भी हो सकती है। अलग-अलग नामों और रूपों के माध्यम से मनुष्य उस सत्ता को समझने का प्रयास करता है जिसे अपनी सीमित बुद्धि से पूरी तरह ग्रहण करना कठिन है।

इस विचार को सभी वैदिक और पुराणिक परम्पराओं का एकमात्र सिद्धान्त नहीं मानना चाहिए। यह इस अध्याय की विशिष्ट प्रस्तुति है, जिसमें अनेक देवताओं की उपासना और ब्रह्म की व्यापकता को एक साथ रखा गया है।

व्याख्या : गंगा का प्रवाह और पवित्रता की परम्परा

गंगा के अवतरण का आख्यान भारतीय धार्मिक और सांस्कृतिक स्मृति में विशेष स्थान रखता है। इस अध्याय में गंगा को स्वर्गीय क्षेत्र से पृथ्वी पर उतरने वाली दिव्य धारा के रूप में प्रस्तुत किया गया है। पर्वतों के बीच से उसका प्रवाह और अनेक पवित्र स्थलों से उसका सम्बन्ध उसके धार्मिक महत्त्व को स्पष्ट करता है।

इस वर्णन को पढ़ते समय दो स्तरों का अन्तर बनाए रखना चाहिए। पहला, मूल आख्यान में गंगा के दिव्य अवतरण और उसके अनेक प्रवाहों की कथा है। दूसरा, उस कथा से निकाला जाने वाला सांस्कृतिक अर्थ है—नदी जीवन, पवित्रता और तीर्थ-परम्परा का आधार बनती है।

नदी मनुष्य के जीवन के लिए जल उपलब्ध कराती है, बस्तियों और कृषि को सहारा देती है तथा विभिन्न क्षेत्रों को जोड़ती है। धार्मिक परम्परा में उसके साथ पवित्रता और पुण्य की धारणाएँ भी जुड़ती हैं। यह सांस्कृतिक व्याख्या गंगा के महत्त्व को व्यापक रूप में समझने में सहायता देती है, लेकिन इसे मूल पाठ का शब्दशः कथन नहीं समझना चाहिए।

गोदावरी और जाह्नवी से सम्बन्धित वर्णन के मामले में विशेष सावधानी आवश्यक है। दत्त के अनुवाद में गंगा के गोदावरी-रूप और जाह्नवी के अनेक प्रवाहों का उल्लेख है। इन पंक्तियों की ऐतिहासिक अथवा भौगोलिक व्याख्या करने के लिए संस्कृत मूल और अन्य पाठ-परम्पराओं से तुलना आवश्यक होगी।

व्याख्या : वेद, यज्ञ और कर्म की सीमा

अध्याय वैदिक कर्मों को कल्याणकारी मानता है, किन्तु साथ ही यह भी कहता है कि उनसे प्राप्त होने वाले फल ब्रह्म की व्यापकता के सामने सीमित हैं। यह विचार कर्मकाण्ड और ब्रह्मज्ञान के सम्बन्ध को समझने में उपयोगी है।

इसका अर्थ कर्मों को निरर्थक घोषित करना नहीं है। नित्यकर्म, यज्ञ और अनुशासित आचरण का अपना स्थान है। किन्तु यदि मनुष्य केवल बाहरी अनुष्ठान को ही आध्यात्मिक जीवन की पूर्णता मान ले, तो वह उस व्यापक ज्ञान की ओर नहीं बढ़ पाएगा जिसे अध्याय ब्रह्म से जोड़ता है।

इस प्रकार अध्याय कर्म के महत्त्व को स्वीकार करते हुए ज्ञान की व्यापकता पर भी बल देता है। कर्म और ज्ञान को एक-दूसरे का पूर्ण विकल्प मानने के बजाय उनके भिन्न उद्देश्यों और भूमिकाओं को समझना अधिक उचित है।

व्याख्या : चार आश्रम और जीवन की क्रमिक साधना

चार आश्रमों का वर्णन मनुष्य के जीवन को केवल भोग और उपलब्धियों की यात्रा न मानकर कर्तव्य, अनुशासन और आत्मचिन्तन की प्रक्रिया के रूप में देखने का अवसर देता है।

ब्रह्मचर्य में अध्ययन और संयम, गृहस्थ जीवन में उत्तरदायित्व, वानप्रस्थ में आत्मचिन्तन और ब्रह्मनिष्ठ अवस्था में परम सत्य की खोज—इनके माध्यम से जीवन के विभिन्न चरणों को अलग-अलग उद्देश्य दिए गए हैं।

यहाँ एक महत्त्वपूर्ण बात ध्यान देने योग्य है। आश्रम-व्यवस्था का मूल वर्णन एक पारम्परिक धार्मिक-सामाजिक आदर्श प्रस्तुत करता है। आधुनिक जीवन में प्रत्येक व्यक्ति की परिस्थितियाँ समान नहीं होतीं; इसलिए इन चार अवस्थाओं को हर व्यक्ति के जीवन में अनिवार्य रूप से एक ही ढंग से घटित होने वाला क्रम मानना उचित नहीं होगा। फिर भी अध्ययन, उत्तरदायित्व, आत्मचिन्तन और ज्ञान की ओर बढ़ने का विचार आज भी नैतिक तथा दार्शनिक विमर्श का विषय हो सकता है।

प्रसंग का निष्कर्ष

भविष्यपर्व का यह अध्याय सुमेरु, ब्रह्मा, ब्रह्म की व्यापकता, गंगा के प्रवाह, वेद, यज्ञ और चार आश्रमों को एक ही व्यापक सृष्टि-दृष्टि के भीतर रखता है। इसमें प्रकृति और धर्म, नदी और तीर्थ, कर्म और ज्ञान तथा सामाजिक उत्तरदायित्व और आध्यात्मिक साधना—इन सभी का वर्णन मिलता है।

इस अध्याय का महत्त्व केवल गंगा की उत्पत्ति की कथा में नहीं है। यह भी दिखाता है कि हरिवंशपुराण का भविष्यपर्व श्रीकृष्ण की प्रत्यक्ष लीलाओं से आगे बढ़कर सृष्टि, धर्म और ब्रह्मज्ञान के प्रश्नों पर विचार करता है। इसलिए शोधग्रन्थ में इन प्रसंगों को उनके मूल विषय और अध्याय-क्रम के साथ प्रस्तुत करना आवश्यक है।

अगले अध्याय में वैशम्पायन गन्धर्वों आदि की उत्पत्ति का वर्णन आगे बढ़ाते हैं। वहाँ सृष्टि के दिव्य वर्गों और उनके प्राकट्य का प्रसंग आएगा; उसे भी मूल आख्यान और व्याख्या के पृथक् स्तरों पर समझना उपयोगी होगा।

मुकेश श्रीवास्तव आत्मसन्तुलन आध्यात्मिक ऊर्जा केंद्र (इस ब्लॉग के लेखों के किसी भी अंश या पूरे लेख का उपयोग करने के पहले लेखक की अनुमति अनिवार्य है।)

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