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Friday, 8 June 2012

अपनी कविता के बारे में --------



अपनी कविता के बारे में --------

मित्रों,
मै,
कवि नही
कवि मना हूं
भावों से बना हूं
जीवन भर उन्मुक्त बहा हूं

न मानूं बंधन को
न जानू कविता के
छंदो बंदों के तटबंधों को
हरदम भावों में ही बहा हूं

जब भाव बहा करते हैं
उसमें खूब नहाता हूं फिर कुछ भावों कों
शब्दों की अंजुरी में भर भर लाता हूं
उसको ही अपनी कविता कहता हूं

मालूम है मुझको
मेरी कविताएं,
कविता के मीटर के बाहर रह जाती है
सारे नियमों को तोड़ बहा करती है

पर यह भी मालूम है मित्रों
आप न देते इस पर ध्यान
इन कमियों को मुझे बता कर
इन भावों को देते पूरा मान

मुकेश इलाहाबादी -------------------

बहेलिये तेरे जाल में न आयेंगे परिंदे

बैठे ठाले की तरंग ----------

बहेलिये तेरे जाल में न आयेंगे परिंदे
नई शदी के हैं बेख़ौफ़ बेबाक से परिंदे

ऊंची से ऊंची उड़ान को तैयार हैं सभी
ये अब तेरी हर चाल हैं समझते परिंदे

रह रह  के हवा का रुख परखते हैं, औ 
हरबार अपने जंवा पर तोलते हैं परिंदे

ज़मी से  अपना जाल  समेत  बहेलिये
ये ऊंचे से ऊंचे  मचानों पे बैठते हैं परिंदे

अब कुछ न कुछ तबदीली हो के रहेगी  
हर  रोज़ नई नई उड़ान भरते हैं ये परिंदे

मुकेश इलाहाबादी ----------------------

ब ज़िद हैं हम,कि हर बार करेंगे

बैठे ठाले की तरंग -------------
ब ज़िद हैं हम,कि हर बार करेंगे
गुनाह-ऐ-मुहब्बत सौ बार करेंगे

कितनी ही बेवफाई कर लो मुझसे
हम तो  तुम्ही  पे  ऐतबार  करेंगे

जब तक आने का वादा न करोगी
मिन्नतें हम तुमसे बार बार करेंगे

मुकेश इलाहाबादी -----------------

Wednesday, 6 June 2012

फिजाओं में मिस्री सी क्यूँ घुली है ?


फिजाओं में
मिस्री सी क्यूँ घुली है ?
सुना है --------
उन्होंने
अपनी बिखरी जुल्फों को
झटक के फिर समेटा है

मुकेश इलाहाबादी -----------

Monday, 4 June 2012

वो -- मुस्कुराना ख्वाब में


बैठे ठाले की तरंग ---------------

वो --
मुस्कुराना ख्वाब में
औ  ----
कुनमुनाना नींद में
अच्छा लगा ---- देखना
तुमको - तुम्हारी नींद में
वो --
ढलका हुआ आँचल
औ --
करवट बदलना - नींद में
अच्छा लगा --- देखना
तुमको - तुम्हारी नींद में
सोचता हूँ ---
एक बोसा दे दूं
तुमको - तुम्हारी नींद में
फिर ---
बाहों में मुस्कुराता देखूं
तुमको तुम्हारी -- नींद में

मुकेश इलाहाबादी ------------

ख्वाब में ही सही

बैठे ठाले की तरंग -------------

ख्वाब में ही सही
तेरी सूरत तो नज़र आती है

गो की मेरा घर
तेरे घर से दूर बहोत है
पै, तेरे रूह की सेंक
इधर तक आती तो है

गर निगोड़ी हवा
राह में यूँ न भटकती
तेरे आँचल की खुशबू
मेरे तक आती तो है

ये शहर की चुप्पियाँ
कानो में फुफुफुसाती हैं
ज़माने में कंही न कंही
अपनी रुसवाई तो है

मुकेश इलाहाबादी ----------------

Friday, 1 June 2012

वह ज़मी की तह तक गया है


बैठे ठाले की तरंग -----------

वह ज़मी की तह तक गया है
तभी बुलंदियों को छू गया है
देखना समंदर के पार जाएगा
तूफां और सफीनो से न डरा है
आफताब सा उगेगा एक दिन
खुद को इतना जला लिया है
बीज बन के माटी में मिला था
वही आज फूल बन के खिला है
पत्थर बना डाला है खुद को
अब वो सदियों तक का सिला है

मुकेश इलाहाबादी ----------------