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Wednesday, 10 August 2016

भर गये ज़ख्मों के निशान कौन रक्खे

भर गये ज़ख्मों के निशान कौन रक्खे
गमजदा रातों का हिसाब कौन रक्खे
ऑखें मेरी पत्थर की हो गयी, दोस्त
इन ऑखोमें हसीन ख्वाब कौन रक्खे
है आग सा जलता हुआ बदन मेरा
जिस्म पे मखमली लिबास कौन रक्खे
दिल निकाल के भेजा खत में तुझे
तेरी नही नही का जवाब कौन रक्खे
तुझे भूला हूं मुकेश बडी मुस्किल से
बीते हुये लम्हों को याद कौन रक्खे
मुकेश इलाहाबादी ..........................

Tuesday, 9 August 2016

बातों में तल्खियॉ देखी

बातों में तल्खियॉ देखी
दिलों में बेचैनियॉ देखी
जिस्म तो पास पास हैं
रिश्तों मे तल्खियॉ देखी
उूबे और थके हुये लोग
चहरों पे उबासियॉ देखी
मुरझाये मुरझाये से फूल
डरी हुयी तितलियॉ देखी
जाने कैसा शहर है ये ?
हर जगह बेचैनयॉ देखी
मुकेश इलाहाबा

Sunday, 7 August 2016

मै, कोई नजूमी तो नहीं

मै,
कोई नजूमी तो नहीं
जो तेरे हाथों की
लकीरें पढ सकूं
हॉ,
मै तेरी खामोश निगाहों
और,
धडकती सॉसो को पढने
का हुनर जरुर रखता हूं

‘नजूमी ... हाथ देखने वाला ज्यातिषी’
मुकेश इलाहाबादी...

ज़मी ने चॉद से कहा,

सुमी,
जानती हो?
एक दिन
ज़मी ने चॉद से कहा,
‘तुम मेरे बहुत बहुत प्यारे दोस्त हो पर तुम मुझे अर्हिनिश निहारते रहते हो देखते रहते हो पर जब मेरे और तुम्हारे बीच मे बादल आ जाते हैं और तुम मुझे देख नही पाते हो, तब तुम मुझे कैसे महसूसते हो पहचानते हो?
चॉद पहले मुस्कुराया फिर हॅसा और बोला ‘ मै तुम्हे तुम्हारे रुप के अलावा तुम्हे तुम्हारी गंध से पहचान लेता हूं। तुम्हारे बदन से गेंदा, गुलाब, गुलमोहर और तमाम तमाम फूलों के अलावा जो माटी की सोंधी सोंधी महक आती है मै उससे तुम्हे पहचान लेता हूं।
ज़मी ये सुन के खिलखिलाने लगी, इतराने लगी, बाली ‘ और इसी लिये तो ज़मीन, धरती, वसुधा आदि आदि नामों के अलावा मेरा एक नाम ‘गन्धा’ भी है।
चॉद ने कहा ‘ हूॅ ! जानता हूं प्रिये’
फिर ज़मी ने कहा ‘अच्छा ये बताओ जैसेे मुझमे तमाम खुशबुऐं हैं तो कया तुममे भी कोई खुशबू है? और अगर है तो मै कैसे जानूं कि तुम भी मेरी तरह महकते हो‘।
चॉद ने कहा ‘अच्छा ! ऐसी बात, तो तुम अपनी अंजुरी फैलाऔ, ज़मी ने अपनी अंजुरी मे ऑचल लपेट के चॉद के सामने कर दिया।
चॉद ने ज़मी के ऑचल मे सुगंध के कुछ बीज छितरा दिये।
और कहा ‘प्रिये ! आज के बाद से मै धरती पे इन फूलों के रुप मे अपनी सुगंध के साथ खिलूंगा उगूंगा। और तुम्हारे आस पास महकता रहूंगा।
ज़मी खुष हो गयी। हंसने लगी मुस्कुराने लगी नाचने लगी अपनी धुरी पे जोर जोर से।
तभी से कुछ लोग कहते हैं । धरती पे चॉद रातरानी और रजनीगंधा के रुप मे खिलता है महकता है गमकता है। जैसे चॉद सिर्फ रात को उगता हैं
बस ! सुमी, देखना एक दिन मै भी जब फ़ना हो जाउंगा। इस ज़मी से तब मै भी रजनीगंध और रातरानी से खिलूंगा और महकूंगा तुम्हारी सॉसों मे और फिर कभी भी कभी भी तुमसे जुदा नही हाउूंगा कभी भी नहीं।
मेरी प्यारी सुमी सुन रही हो न?
या फिर आज भी तुम सो गयी हो थक कर। न जाने किसके इंतजार में?
शायद मेरे रकीब के इंतजार में?
खैर कोई बात नही मेरी प्यारी सुमी।

बॉय बॉय बॉय
मुकेश इलाहाबादी ..

Friday, 5 August 2016

गर कुछ अच्छा लगता है

अच्छी कविता
खुशनुमा शाम
या ,
बादलोंके बीच
अधखिला चाँद
और ,,
रजनीगंधा के
फूलों के अलावा
गर कुछ अच्छा लगता है
तो, वो सिर्फ
और सिर्फ
तुम हो  - सुमी

मुकेश इलाहाबादी ------

Thursday, 4 August 2016

रातों में जुगनू सा चमकता है

रातों में जुगनू सा चमकता है
यादों में चन्दन सा  महकता है

सुर्ख रंग हैं  उसके  आरिज़ के
चेहरा गुलमोहर सा दमकता है

लगा लेती है जब लाल बिंदी
माथा उसका खूब चमकता है

वो झटक दे अपनी ज़ुल्फ़ें तो
बादल भी देरतक बरसता है

जिसके हिज़्र में,मुकेश बाबू
दिल मेरा देर तक सुलगता है

मुकेश इलाहाबादी ---------

Wednesday, 3 August 2016

कह तो दूं सुनेगा कौन

कह तो दूं सुनेगा कौन
बात मेरी मानेगा कौन
सच की राह कारवां है
साथ मेरे चलेगा कौन
दुनिया सरांयखाना है
यहां पर रहेगा कौन
दिल मेरा खाली मकॉ
इस घर मे रहेगा कौन
ईश्क की झीनी चादर
बता मुुकेश बुनेगा कौन
मुकेश इलाहाबादी .....