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Saturday, 15 October 2016

जब -जब हँसते हो मुस्काते हो

जब -जब हँसते हो मुस्काते हो
ताज़ा खिले गुलाब से लगते हो

तेरा रूप तेरी बातें सबसे न्यारी
क्या परियों के देश से आये हो

तेरी मुस्कान में इत्ता जादू क्यूँ
तुम  क्यूँ  इतने प्यारे लगते हो

तुझसे, रिश्ता नहीं, दोस्ती नहीं ,
फिर क्यूँ ,तुम अपने लगते हो ?

क्या तुम भी आवारा मुकेश की
ग़ज़लें तनहा रातों  में सुनते हो

मुकेश इलाहाबादी ------------




Friday, 14 October 2016

पलकों को मूँदते ही

पलकों को
मूँदते ही
सुनाई देती है
तुम्हारे नाम की
गूँज - अनाहत नाद सी
जिसे सुनते - सुनते
डूब जाता हूँ
किसी, अजानी
नीली रूहानी झील में
जिसमे उतर कर
ताज़ा दम हो जाता हूँ
एक बार फिर
दिन भर के थकाऊ और
धूल भरे सफर के लिए

सुमी - तुम्ही से --

मुकेश इलाहाबादी -----------

Thursday, 13 October 2016

चरागों को बुझा दिया जाए

चरागों को
बुझा दिया जाए
सूरज पे,
पर्दा लगा दिया जाये
चाँद को
बादलों से ढक दिया जाए
कि,
तेरे चेहरे का नूर ही
काफ़ी है रोशनी के लिए
सुमी - के लिए
मुकेश इलाहाबादी -----

Tuesday, 11 October 2016

पलकों के नीचे झाँइयाँ हैं


पलकों के नीचे झाँइयाँ हैं
उदासी की परछाँइयाँ  हैं

देख बुलन्दी के इर्द - गिर्द
पतन की गहरी खाइयाँ है

दोस्त राह -ऐ- मुहब्बत में
हर  कदम पे रुसवाइयाँ हैं

मेरे हर ज़ख्म को देख तू ,
सिर्फ तेरी ही निशानियाँ हैं

तू सब को अपना समझे है
तेरी यही तो नादानियाँ है

मुकेश इलाहाबादी -------

Friday, 7 October 2016

तू ग़ज़ल मेरी गुनगुनाऊँ तुझको

तू ग़ज़ल मेरी गुनगुनाऊँ तुझको
आ इक बार गले लगाऊँ, तुझको
ले आया हूँ, चाँद -सितारे तोड़ के
आ अपने हाथों से सजाऊँ तुझको
मुकेश, अपना ग़म, अपनी खुशी
ग़र इज़ाज़त दे तो सुनाऊँ तुझको

मुकेश इलाहाबादी ---------------

Tuesday, 4 October 2016

अब हाल ऐ दिल क्या सुनाऊँ तुम्हे

अब हाल ऐ दिल क्या सुनाऊँ तुम्हे
कट रहे हैं दिन तेरा नाम ले -ले के
मुकेश इलाहाबादी ----------------

वक़्त के घुमते हुए चाक पे


वक़्त के
घुमते हुए चाक पे
रख दिया
तुम्हारी यादों की
सोंधी मिट्टी गूंथ के
जिससे गढ़ा,
एक खूबसूरत चराग़
और अब रौशन हैं
मेरे, दिन और रात

मुकेश इलाहाबादी -------