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Wednesday, 30 August 2017

तुम बिन


इस
बरसात में भी भीगा बहुत
तुम बिन

सांझ
मंदिर में घंटियाँ बज रही थी
जैसे तुम हंस रही हो
मुझे कुछ ऐसा लगा

तुम्हारा
कोई मेसैज नहीं आया
दिन बहुत उदास गुज़रा

की पैड से
उंगलिया बहुत देर
तक खेलती रहीं
फिर जाने क्या सोच के कॉल नहीं किया
मैसेज किया


जानता हूँ
तुम मेरे मैसेज का
जवाब तो न दोगी
पर पढ़ोगी ज़रूर

(बिना चेहरे पे कोइ भाव लाये
दिल में खुश होते हुए )

और रख दोगी मोबाइल चुपचाप

खैर ,,,

तुम अपना काम करो
मै तो ऐसी बक बक करता ही रहूंगा

बाय ,,,,,,

मुकेश इलाहाबादी -----------------

Posted by Mukesh Srivast

सिवाय दर्द के मिलता क्या है ?

सिवाय दर्द के मिलता क्या है ?
ईश्क़ करने से फायदा क्या है ?

तुझे न सोचूँ  मेरे बस में नहीं,
तू बता तू मेरा लगता क्या है?

तुझसे मिलने की है बेकरारी,
ईश्क़ नहीं तो माज़रा क्या है ?

मेरी सांसे तेरी, धड़कन तेरी
पास मेरे अब, बचा क्या है ?

बैठा रहूँ,  तेरा इंतज़ार करूँ,
सिवाय इसके,रास्ता क्या है?

मुझसे नहीं धड़कनो से पूछ,
तेरा ये दिल कहता क्या है ?

मुकेश इलाहाबादी -------------

Tuesday, 29 August 2017

चाँद मेरा दोस्त

मेरे
पास विरासत के नाम पे
ढेर सारी वर्जनाओं, सिद्धांतों की क़ैद के
बीच थोड़ा सा आकाश था
जिसे अक्सर एक छोटी सी खिड़की से झाँक लेता था
उसआकाश में
अक्सर मुझे काले, भूरे डरावने बादल ही मंडराते दीखते
लेकिन कभी कभी एक सलोना सा चाँद भी दिख जाता
चाँद कभी बादलों में छुप जाता तो कभी दिख जाता
यूँ तो चाँद मुस्कुराता ही लगता
लेकिन एक दिन गौर से देखने पे मुझे
चाँद की आँखों में भी एक उदासी नज़र आयी
मै चाँद को देख रहा था
चाँद भी मुझे देखने लगा
मै कुछ अन्यमनस्क हो रहा था
कि चाँद खिलखिला के कहने लगा ' क्या देख रहे हो?"
मैंने कहा 'कुछ नहीं'
चाँद 'कुछ तो है ,,,, बोलो बोलो बेहिचक बोलो,
तुम मुझे अपना दोस्त समझो'
मेरी हिम्मत बढ़ी --
और मैंने कहा ' कुछ नहीं देख रहा हूँ , तुम कितने सुंदर हो चाँद '
चाँद पहले तो हंसा फिर कहने लगा
' हूँ, सबको लगता तो ऐसा ही है, सबको मेरी सुंदरता तो दिखती है
पर मेरे चहेरे के दाग़ नहीं दीखते मेरे जिस्म के गड्ढे और दुखों के पहाड़ नहीं दीखते ?
बिन थके बिन रुके धरती का धरती का चक्कर लगाना नहीं दीखता?
राहू द्वारा डसा जाना नहीं दीखता,  
मेरी तनहाई नहीं दिखती
और हंसने लगा और चाँद आगे कहने लगा' खैर छोड़ो ,, तुम अपनी बताओ ,,
मै कुछ कहता इसके पहले चाँद को बादल ने ढँक लिया,
और मै उसका इंतज़ार करता रहा देर तक ,,

क्रमशः

मुकेश इलाहाबादी ----------------------------

कभी फूल सा हथेली में ले के चूम लेना

कभी फूल सा हथेली में ले के चूम लेना
मोती हूँ मै, बिखर जाऊं तो समेट लेना

यूँ तो मै तुझे छोड़ के कंही जाऊँगा नहीं
गर कभी रूठ के जाऊँ भी तो रोक लेना

वैसे तो मै शीरी ज़बान में बात करता हूँ
फिर भी कुछ बुरा लगे तो कह सुन लेना


दिल अपना निकाल के रख दिया है मैंने
कभी वक़्त मिले तो, मेरा ख़त पढ़ लेना

औरो की तो रोज़ ही सुना करती हो मुक्कु
तुम किसी रोज़ मेरी भी ग़ज़ल सुन लेना

मुकेश इलाहाबादी ------------------------

रात चाँद अच्छा नहीं लगता

तेरे जाने के बाद,

रात चाँद अच्छा नहीं लगता
दिन सूरज अच्छा नहीं लता

नींद नहीं अच्छी लगती,मुझे
कोई ख़ाब अच्छा नहीं लगता

महंगाई व मुफिलसी में, घर  
मेहमान अच्छा नहीं लगता

जाड़ा अच्छा नहीं लगता न
सावन अच्छा नहीं लगता

तुम  साथ रहते हो मेरे, तब,,
कोई और अच्छा नहीं लगता

मुकेश इलाहाबादी ---------


Monday, 28 August 2017

इक बार मेरी आँखों के आईने से

इक
बार मेरी आँखों के
आईने से ख़ुद को देखना
तुम
ख़ुद ब ख़ुद
अपनी मुहब्बत में
गिरफ्तार न हो जाओ तो कहना

मुकेश इलाहाबादी ------------

Sunday, 27 August 2017

तुम्हारी बातें जैसे

तुम्हारी
बातें जैसे
कोई बुलबुल चहचहा जाए
मुंडेर पे

तुम्हारी
हंसी, जैसे
किसी कोई बिखेर दे
ढेर सरे सफ़ेद मोती ज़मीन पे

तुम्हारी
आँखे, जैसे
मंदिर में टिमटिमाते दो दिए

तुम्हारी
साँसे, जैसे
इत्र की सीसी खुल के ढ्नंग  जाये
और महमहा जाये सारा आलम

सच ! ऐसी ही हो तुम

बस ! मेरी नहीं हो तुम

मुकेश इलाहाबादी --------------