महाभारत — वनपर्व — प्रसंग 10 : इन्द्र का आगमन और अर्जुन की स्वर्गयात्रा

 महाभारत — वनपर्व — प्रसंग 10 : इन्द्र का आगमन और अर्जुन की स्वर्गयात्रा

शिव जा चुके थे।

यम, वरुण और कुबेर भी अर्जुन को अपने-अपने दिव्यास्त्र देकर अपने लोकों को लौट चुके थे।

हिमालय की ऊँची चोटी पर अर्जुन अकेला खड़ा था।

उसकी तपस्या पूर्ण हो चुकी थी। देवताओं ने उसे पहचान लिया था। उसे वे अस्त्र प्राप्त हो चुके थे जिनकी कल्पना भी सामान्य मनुष्य नहीं कर सकता।

लेकिन अभी एक देवता शेष थे। - इन्द्र। और इन्द्र केवल एक लोकपाल नहीं थे। वे अर्जुन के पिता भी थे।

आकाश को चीरता हुआ दिव्य रथ

महाभारत का वर्णन अचानक अत्यन्त दृश्यात्मक हो जाता है।

अर्जुन इन्द्र के रथ के बारे में सोच ही रहा था कि आकाश से एक अद्भुत रथ प्रकट हुआ।

वह बादलों को चीरता हुआ आया।

उसकी चमक से आकाश प्रकाशित हो उठा।

उसकी गति और गर्जना ऐसी थी मानो आकाश में विशाल मेघसमूह गरज रहे हों।

उस रथ पर अनेक प्रकार के अस्त्र-शस्त्र रखे थे—तलवारें, भयंकर आकार के प्रास, गदाएँ, तीक्ष्ण बाण, वज्र के समान चमकते आयुध और ऐसे उपकरण जिनका स्वरूप आज के सामान्य युद्ध-हथियारों से बिल्कुल अलग है। उसके साथ विशाल नाग भी बताए गए हैं, जिनके मुख अग्नि के समान थे; श्वेत पत्थरों के ढेर थे; और रथ को दस हजार स्वर्णवर्ण अश्व खींच रहे थे, जिनकी गति वायु के समान थी। 

यहाँ महाभारत की कल्पना अपनी चरम ऊँचाई पर दिखाई देती है। यह कोई साधारण राजरथ नहीं है।

यह देवराज का रथ है। उसका प्रत्येक अंग उसके स्वामी की शक्ति का परिचायक है।

वैजयन्त ध्वज

अर्जुन उस रथ को देखता है।

उस पर एक ध्वजदण्ड है—वैजयन्त

महाभारत उसे अत्यन्त चमकीला बताता है। उसका वर्ण गहरे नील कमल अथवा मरकत के समान बताया गया है और वह स्वर्णाभूषणों से सुशोभित है। 

यह छोटा-सा विवरण भी महाभारत की युद्ध-संस्कृति को समझने के लिए उपयोगी है।

प्राचीन भारतीय युद्ध में ध्वज केवल सजावट नहीं था। वह पहचान था।

राजा और योद्धा के लिए ध्वज उसके रथ की पहचान बन सकता था।

इसलिए इन्द्र के रथ का वैजयन्त भी केवल सौन्दर्य-वर्णन नहीं, उसकी विशिष्ट पहचान है।

मातलि का आगमन

रथ को चलाने वाला व्यक्ति था— मातलि। इन्द्र का सारथि।

मातलि रथ से उतरता है और अर्जुन के सामने आकर प्रणाम करता है।

वह कहता है कि शक्र स्वयं अर्जुन को देखना चाहते हैं।

इन्द्र ने आदेश दिया है कि कुन्तीपुत्र को लेकर वह स्वर्ग आए।

और एक बात विशेष रूप से कही जाती है— अर्जुन को देवताओं ने पहचान लिया है।

अब देवता उसे अपने लोक में देखना चाहते हैं।  यहाँ अर्जुन की यात्रा का स्वरूप बदल जाता है।

अब वह केवल किसी देवता के पास जाकर वर माँगने वाला तपस्वी नहीं है।

अब देवता स्वयं उसे अपने लोक में बुला रहे हैं।

अर्जुन का तत्काल उत्तर

अर्जुन तुरन्त रथ पर नहीं चढ़ता। यह भी महाभारत के चरित्र-चित्रण में महत्वपूर्ण है।

वह मातलि से कहता है कि पहले तुम रथ पर चढ़ो और घोड़ों को स्थिर करो।

फिर वह स्वयं उसमें प्रवेश करेगा।

अर्जुन इस रथ को साधारण मनुष्य के लिए लगभग अप्राप्य बताता है।

वह कहता है कि जिस रथ तक पहुँचने के लिए बड़े-बड़े राजसूय और अश्वमेध जैसे यज्ञ भी पर्याप्त नहीं हैं, जिस पर महान राजा, देवता और दानव भी सहज अधिकार नहीं रखते, उस रथ पर बैठना साधारण उपलब्धि नहीं है। 

और फिर एक अत्यन्त सुंदर उपमा आती है।

अर्जुन कहता है कि वह इस रथ पर उसी प्रकार चढ़ेगा जैसे कोई धर्मात्मा मनुष्य सत्य और धर्म के राजमार्ग पर प्रवेश करता है।

यहाँ अर्जुन का तपस्वी रूप फिर सामने आता है।

उसके पास अब असाधारण शक्ति है, लेकिन वह उस शक्ति से मदांध नहीं हुआ।

स्वर्ग जाने से पहले गंगा

अर्जुन रथ पर चढ़ने से पहले स्वयं को पवित्र करता है। वह गंगा में स्नान करता है।

फिर अपनी नियमित प्रार्थनाएँ करता है। पितरों को जल अर्पित करता है।

उसके बाद वह स्वर्गारोहण के लिए तैयार होता है। 

यह छोटा-सा विवरण अत्यन्त महत्वपूर्ण है।

अर्जुन के लिए स्वर्गयात्रा कोई पर्यटन नहीं है।

यह एक धार्मिक संस्कार है। 

उसकी यात्रा के पहले— स्नान है। प्रार्थना है। पितृतर्पण है। और फिर देवयान है।

अर्थात् महाभारत उसकी स्वर्गयात्रा को एक विधिवत् आध्यात्मिक यात्रा के रूप में प्रस्तुत करता है।

हिमालय से आकाश की ओर

अब अर्जुन मातलि के साथ रथ पर बैठता है। मातलि लगाम संभालता है।

और रथ ऊपर उठता है। महाभारत के अनुसार उन घोड़ों की गति मन अथवा वायु के समान है।

रथ ऊपर जाता है और अर्जुन पृथ्वी से उस संसार को देखता है जिसे मनुष्य सामान्यतः आकाश में चमकते हुए तारों के रूप में देखता है।

यहाँ कथा में एक असाधारण संवाद आता है।

अर्जुन पूछता है— ये जो प्रकाशमान स्थान हैं, ये क्या हैं?

मातलि उत्तर देता है कि ये उन पुण्यात्माओं के स्थान हैं जिन्हें पृथ्वी से मनुष्य तारों के रूप में देखता है। 

तारे और पुण्यात्माओं के लोक

यह महाभारत के ब्रह्माण्ड-विचार का अत्यन्त रोचक अंश है।

आज हम तारों को भौतिक खगोलीय पिंडों के रूप में देखते हैं।

लेकिन महाभारत की कथा-दृष्टि में आकाश केवल निर्जीव पदार्थ का विस्तार नहीं है।

वहाँ लोक हैं। वहाँ पुण्यात्माओं के निवास हैं। वहाँ ऋषि हैं। गन्धर्व हैं। अप्सराएँ हैं। सिद्ध हैं।

और मनुष्य की दृष्टि से जो केवल प्रकाश का बिन्दु है, वह महाभारत के पात्र के लिए किसी जीवित लोक का प्रवेशद्वार हो सकता है।

यहाँ आधुनिक विज्ञान और महाभारत को जबरन एक-दूसरे में मिला देना उचित नहीं होगा।

यह कहना कि “महाभारत ने आधुनिक खगोल विज्ञान पहले ही खोज लिया था”—ऐसा निष्कर्ष पाठ से नहीं निकलता।

लेकिन यह अवश्य कहा जा सकता है कि महाभारत का आकाश-बोध अत्यन्त विकसित धार्मिक-ब्रह्माण्डीय कल्पना से जुड़ा हुआ है।

आकाश में कौन-कौन हैं?

अर्जुन की यात्रा के दौरान उसे अनेक दिव्य प्राणी दिखाई देते हैं।

गन्धर्व हैं। अप्सराएँ हैं। ऋषि हैं। गुह्यक हैं। विभिन्न दिव्य लोक हैं।

महाभारत उन्हें एक ऐसी दुनिया के रूप में चित्रित करता है जहाँ गति पृथ्वी की भौतिक सीमाओं से बंधी नहीं है।

देवता कहीं भी जा सकते हैं। दिव्य रथ आकाश में विचरण करते हैं।

और पुण्य के अनुसार जीव अलग-अलग लोकों में स्थित हैं। 

इससे वनपर्व का एक और महत्वपूर्ण पक्ष सामने आता है— महाभारत का “वन” केवल पृथ्वी का जंगल नहीं है।

वन से आरम्भ हुई अर्जुन की यात्रा अन्ततः पृथ्वी, पर्वत, आकाश और देव-लोकों को जोड़ देती है।

ऐरावत का दर्शन

आगे बढ़ते हुए अर्जुन एक अद्भुत हाथी को देखता है। वह है— ऐरावत।

महाभारत उसे चार दाँतों वाला बताता है।

उसका आकार कैलास पर्वत की चोटियों के समान भव्य है।

वह इन्द्र के लोक के द्वार पर स्थित है। 

यह वर्णन बाद की भारतीय कला और पुराणपरम्परा में अत्यन्त प्रसिद्ध होने वाले ऐरावत की कल्पना का भी महत्वपूर्ण पाठ-साक्ष्य है।

लेकिन यहाँ भी हमें सावधानी रखनी चाहिए।

हम अभी केवल यह दर्ज कर रहे हैं कि महाभारत में ऐरावत का यह स्वरूप किस प्रकार वर्णित है।

बाद की पुराणकथाएँ और कलात्मक परम्पराएँ इसके ऊपर अपनी अनेक परतें जोड़ती हैं।

सिद्धों का मार्ग

अर्जुन जिस मार्ग से जाता है, उसे महाभारत सिद्धों का मार्ग कहता है।

यह शब्द अत्यन्त रोचक है। अर्थात् स्वर्ग की यात्रा के लिए केवल भौतिक आकाश का वर्णन पर्याप्त नहीं है।

उसके साथ आध्यात्मिक योग्यता भी जुड़ी है। अर्जुन स्वयं भी उस समय केवल योद्धा नहीं है।

वह तपस्या कर चुका है। उसने देवताओं को प्रसन्न किया है।

उसने दिव्यास्त्र प्राप्त किए हैं। इसलिए उसका स्वर्गारोहण उसके तप और वीरता दोनों की परिणति के रूप में प्रस्तुत होता है।

अमरावती दिखाई देती है

अन्ततः अर्जुन उस नगर को देखता है— अमरावती। इन्द्र की नगरी।

महाभारत उसे अत्यन्त सुन्दर और दिव्य नगर के रूप में प्रस्तुत करता है।

यहाँ आगे अर्जुन को नन्दनवन दिखाई देगा।  ऋतुओं के फूलों से युक्त वृक्ष होंगे।

अप्सराएँ होंगी। सिद्ध और चारण होंगे। और स्वयं इन्द्र की सभा होगी।

लेकिन अभी हम उस नगर के भीतर नहीं जाएंगे। क्योंकि महाभारत ने स्वयं कथा को क्रमबद्ध रखा है।

पहले— रथ। फिर— आकाशमार्ग।  फिर— दिव्य लोक। फिर— ऐरावत। और अन्ततः— अमरावती।

अगले प्रसंग में हम अमरावती के भीतर प्रवेश करेंगे।

इस प्रसंग का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष

इस पूरे प्रसंग को केवल “अर्जुन स्वर्ग चला गया” कह देने से उसकी आधी शक्ति समाप्त हो जाती है।

क्योंकि महाभारत ने स्वर्गारोहण को एक दृश्य-यात्रा की तरह लिखा है।

हम अर्जुन के साथ रथ पर बैठे हैं। मातलि सारथि है। नीचे हिमालय छूट रहा है। रथ बादलों को चीर रहा है।

आकाश में दिव्य लोक दिखाई दे रहे हैं। गन्धर्व और अप्सराएँ दिखाई देती हैं। मातलि तारों के बारे में बताता है।

फिर ऐरावत दिखाई देता है। और अन्ततः अमरावती।

यह महाभारत की कथात्मक शक्ति है।

यहाँ दर्शन कथा के भीतर है; कथा दर्शन के ऊपर नहीं बैठी हुई।

एक और गहरी बात — अर्जुन की योग्यता

मातलि एक अत्यन्त असाधारण बात देखता है।

जब रथ गति पकड़ता है, तो अर्जुन उस पर बिल्कुल स्थिर बैठा रहता है।

मातलि आश्चर्य करता है कि ऐसा कैसे संभव है।

वह बताता है कि इन्द्र जैसे महान देवता भी रथ की पहली तीव्र गति पर थोड़ा हिल जाते हैं, लेकिन अर्जुन पर उसका कोई प्रभाव नहीं पड़ता। 

यह केवल अर्जुन की शारीरिक क्षमता का वर्णन नहीं है।

यह उसके संयम का भी संकेत है। वह— तप कर चुका है। दिव्यास्त्र प्राप्त कर चुका है। अब दिव्य रथ पर भी स्थिर है।

महाभारत बार-बार अर्जुन की शक्ति के साथ उसकी धारण-क्षमता को भी दिखाता है।

यही बात उसे दिव्यास्त्रों का योग्य अधिकारी बनाती है।

कथा-सूत्र : वन से स्वर्ग तक

अब तक वनपर्व में अर्जुन की यात्रा को यदि एक ही सूत्र में देखें तो क्रम बहुत स्पष्ट हो जाता है।

राज्य गया। वनवास आया। व्यास ने भविष्य के युद्ध की तैयारी के लिए अर्जुन को भेजा।

अर्जुन हिमालय गया। इन्द्र ने उसकी परीक्षा ली। शिव ने उसे परखा।

अर्जुन ने युद्ध किया। पाशुपतास्त्र मिला। फिर यम, वरुण और कुबेर आए।

दिव्यास्त्र मिले। अब इन्द्र स्वयं बुला रहे हैं।

अर्थात्— वनवास अब निष्क्रिय प्रतीक्षा नहीं रहा।

यह सक्रिय तैयारी बन चुका है।

और अर्जुन की यात्रा पृथ्वी से देव-लोक तक पहुँच गई है।

शोध-बिन्दु

इस प्रसंग से हमारे लिए कुछ महत्वपूर्ण शोध-दिशाएँ निकलती हैं।

१. स्वर्ग की भौगोलिक कल्पना: महाभारत का स्वर्ग कहाँ है? क्या वह केवल धार्मिक लोक है या कथा में उसका कोई विशिष्ट ब्रह्माण्डीय भूगोल भी निर्मित होता है?

२. तारों और पुण्यलोकों का सम्बन्ध: मातलि द्वारा तारों को पुण्यात्माओं के लोक के रूप में बताने का वैदिक और उपनिषदिक परम्परा से क्या सम्बन्ध है?

३. दिव्य रथ: महाभारत में देवताओं के रथों का वर्णन किस प्रकार मिलता है और उनमें कौन-से आयुध तथा तकनीकी/कल्पनात्मक तत्व हैं?

४. मातलि का चरित्र: वह केवल सारथि नहीं है। आगे महाभारत में उसकी भूमिका और अधिक महत्वपूर्ण होगी। उसे केवल “इन्द्र का ड्राइवर” कहना उसके चरित्र को बहुत छोटा कर देगा।

५. स्वर्गारोहण की पात्रता: महाभारत यहाँ तपस्या, यज्ञ, ज्ञान, पुण्य और युद्ध-वीरता—इन सबको स्वर्ग-दर्शन की पात्रता से जोड़ता है। यह विषय आगे इन्द्रलोक के वर्णन में और स्पष्ट होगा।

अगला प्रसंग हमें अमरावती के भीतर ले जाएगा—जहाँ अर्जुन इन्द्र की सभा, नन्दनवन, गन्धर्वों, अप्सराओं और स्वयं देवराज इन्द्र से मिलता है। वहाँ यह भी देखना रोचक होगा कि महाभारत स्वर्ग को केवल सुख के स्थान के रूप में चित्रित करता है या उसके भीतर भी कोई राजनीतिक-सामाजिक व्यवस्था है।

मुकेश श्रीवास्तव
आत्मसन्तुलन आध्यात्मिक ऊर्जा केंद्र
(इस ब्लॉग के लेखों के किसी भी अंश या पूरे लेख का उपयोग करने के पहले लेखक की अनुमति अनिवार्य है।)

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