महाभारत — वनपर्व — प्रसंग 11 : अमरावती में अर्जुन का प्रवेश और इन्द्र की सभा

महाभारत — वनपर्व — प्रसंग 11 : अमरावती में अर्जुन का प्रवेश और इन्द्र की सभा

मातलि का दिव्य रथ आकाशमार्ग से आगे बढ़ रहा था। 

अर्जुन पीछे छूटती पृथ्वी को देख चुका था। हिमालय की चोटियाँ दूर हो चुकी थीं। 

तारों के प्रदेश पार हो चुके थे। ऐरावत दिखाई दे चुका था।

और अब— उसके सामने देवराज इन्द्र की नगरी थी।

अमरावती।

अर्जुन ने पृथ्वी पर अनेक नगर देखे थे।  इन्द्रप्रस्थ की मयसभा देखी थी।

राजसूय की भव्यता देखी थी। लेकिन अमरावती उन सब से भिन्न थी।

यह मनुष्यों द्वारा निर्मित कोई राजधानी नहीं थी। यह देवताओं की राजधानी थी।

अमरावती का प्रथम दर्शन

महाभारत अमरावती को ऐसी नगरी के रूप में प्रस्तुत करता है जहाँ सामान्य मानवीय नगरों की सीमाएँ समाप्त हो जाती हैं।

उसमें ऊँचे-ऊँचे भवन हैं। रत्नों और स्वर्ण से सुशोभित प्रासाद हैं।

दिव्य उद्यान हैं। सुगन्धित वृक्ष हैं।

चारों ओर संगीत की ध्वनि है। गन्धर्व गान कर रहे हैं। अप्सराएँ नृत्य कर रही हैं।

सिद्ध और चारण विचरण कर रहे हैं। 

अर्थात् अमरावती केवल एक महल नहीं है। यह एक जीवित दिव्य नगर है।

उसकी अपनी सामाजिक व्यवस्था है, अपनी सभा है, अपने निवासी हैं और अपना राजकीय केन्द्र है।

यहीं से महाभारत का स्वर्ग एक अमूर्त धार्मिक अवधारणा से बदलकर एक कथात्मक संसार बन जाता है।

अर्जुन का स्वागत

जब अर्जुन अमरावती पहुँचता है, तब वह कोई अनजान अतिथि नहीं है।

इन्द्र ने स्वयं उसे बुलाया है। मातलि अर्जुन को लेकर देवराज के सामने पहुँचता है।

और फिर एक अत्यन्त महत्वपूर्ण दृश्य आता है। 

इन्द्र स्वयं अर्जुन का स्वागत करते हैं।

यहाँ पिता और पुत्र का सम्बन्ध धीरे-धीरे सामने आता है।

पृथ्वी पर अर्जुन पाण्डु-पुत्र कहलाता है। लेकिन अमरावती में उसकी पहचान— इन्द्रपुत्र के रूप में भी होती है।

इन्द्र उसे अपने समीप स्थान देते हैं।  उसका सम्मान करते हैं।

और अर्जुन भी पुत्र की तरह अपने पिता के सामने विनम्र होकर उपस्थित होता है।

इन्द्र का सिंहासन

महाभारत इन्द्र की सभा का वर्णन अत्यन्त विस्तार से करता है।

यह वही प्रकार की सभा है जिसकी कल्पना नारद ने पहले युधिष्ठिर को सुनाई थी।

यहाँ हमें एक बहुत महत्वपूर्ण कथा-सूत्र दिखाई देता है।

सभा-पर्व में नारद ने देवसभाओं का वर्णन किया था।

अब वनपर्व में अर्जुन स्वयं उन्हीं में से एक सभा को देखने जा रहा है।

अर्थात् महाभारत अपने पहले से बताए हुए संसार को आगे की कथा में प्रत्यक्ष अनुभव में बदल देता है।

यह महाभारत की रचना-पद्धति की बड़ी खूबी है।

जो बात पहले किसी पात्र के वर्णन से जानी थी, अब वही अर्जुन के अनुभव से सामने आती है।

इन्द्रसभा में कौन हैं?

इन्द्र की सभा में केवल देवता नहीं हैं।

वहाँ— ऋषि हैं। सिद्ध हैं। चारण हैं। गन्धर्व हैं। अप्सराएँ हैं। महान राजर्षि हैं। दिव्य पुरुष हैं।

और अनेक ऐसे महात्मा हैं जिन्होंने अपने कर्म और तप से दिव्य लोक प्राप्त किए हैं।

इसलिए “स्वर्ग” यहाँ केवल देवताओं का निजी निवास नहीं है।

पुण्य के द्वारा मनुष्य भी वहाँ पहुँच सकता है।

यह विचार भारतीय धार्मिक कल्पना में अत्यन्त महत्वपूर्ण है।

देवत्व और मनुष्यत्व के बीच एक ऐसा सम्बन्ध है जिसमें मनुष्य अपने कर्म, यज्ञ, तप और पुण्य से देव-लोक तक पहुँच सकता है।

अर्जुन अब उसी संसार में प्रवेश कर रहा है।

अर्जुन को देखकर आश्चर्य

देवसभा में अर्जुन का प्रवेश सामान्य घटना नहीं है।

एक मनुष्य—वह भी पृथ्वी पर रहने वाला योद्धा—देवताओं के बीच आकर बैठता है।

लेकिन महाभारत अर्जुन को वहाँ अजनबी नहीं बनाता।

देवगण उसका सम्मान करते हैं।

क्यों? क्योंकि उसकी पहचान केवल वर्तमान जन्म के अर्जुन की नहीं है।

पहले यम ने उसे नर के रूप में पहचाना था।

शिव ने उसकी तपस्या और वीरता को स्वीकार किया था।

अब इन्द्र उसे अपने पुत्र के रूप में स्वीकार कर रहे हैं।

इस प्रकार अर्जुन की पहचान की तीन परतें एक साथ दिखाई देती हैं—

मनुष्य — योद्धा — दैवी पुरुष।

इन्द्र और अर्जुन का सम्बन्ध

यहाँ एक विशेष बात ध्यान देने योग्य है।

इन्द्र अर्जुन को केवल अस्त्र देने वाले देवता नहीं हैं।

वे उसके पिता हैं। इसलिए अर्जुन की स्वर्गयात्रा का भाव अन्य लोकपालों से अलग है।

यम ने उसे अस्त्र दिया। वरुण ने अस्त्र दिया। कुबेर ने अस्त्र दिया।

लेकिन इन्द्र उसे अपने लोक में बुलाते हैं।

यहाँ अस्त्र-प्राप्ति के साथ वंश और सम्बन्ध भी जुड़ जाता है।

इन्द्र अर्जुन को अपने पास रखते हैं और उसकी शिक्षा की व्यवस्था करते हैं।

यही वह चरण है जहाँ अर्जुन की युद्ध-क्षमता एक नई दिशा लेने वाली है।

अमरावती और नन्दनवन

अमरावती के साथ महाभारत जिस संसार का वर्णन करता है, उसमें नन्दनवन विशेष स्थान रखता है।

नन्दनवन दिव्य वृक्षों, फूलों और सुगन्ध से युक्त उद्यान है।

वहाँ सामान्य पृथ्वी के वृक्षों से भिन्न दिव्य वृक्ष हैं।

वसन्त मानो वहाँ स्थायी है।

फूलों की सुगन्ध वातावरण में फैली है।

गन्धर्व संगीत करते हैं। अप्सराएँ नृत्य करती हैं।

सिद्ध और देवर्षि वहाँ विचरण करते हैं।

यहाँ महाभारत का स्वर्ग एक ऐसे संसार के रूप में उभरता है जहाँ सौन्दर्य, संगीत और आनन्द एक साथ उपस्थित हैं।

लेकिन इस संसार को केवल भोग का संसार मान लेना भी अधूरा होगा।

क्योंकि इसी अमरावती में अर्जुन को कठोर प्रशिक्षण भी मिलने वाला है।

अर्जुन और चित्रसेन

अमरावती में अर्जुन का सम्बन्ध चित्रसेन गन्धर्व से भी स्थापित होता है।

यह वही चित्रसेन है जिसे हम पहले वनपर्व के घोषयात्रा प्रसंग में देख चुके हैं।

वहाँ उसने दुर्योधन को पराजित करके बन्दी बनाया था।

अर्जुन ने उससे युद्ध किया था और बाद में उसे पहचान लिया था।

वहाँ दोनों के बीच मित्रता का संकेत मिला था।

अब वही चित्रसेन अमरावती में अर्जुन के जीवन का एक नया अध्याय खोलता है।

यह महाभारत के कथा-सूत्रों की निरन्तरता का सुंदर उदाहरण है।

एक पात्र— पहले युद्धभूमि में मिला।

फिर शत्रु के प्रसंग में मित्र सिद्ध हुआ।

और अब स्वर्गलोक में वही अर्जुन का शिक्षक और साथी बनने वाला है।

इस प्रकार वनपर्व अपने पहले के प्रसंगों को भूलता नहीं।

उनके पात्र आगे चलकर नये अर्थ में लौटते हैं।

गन्धर्वविद्या

चित्रसेन अर्जुन को गन्धर्वों की कला सिखाता है।

संगीत। नृत्य। वाद्य। लय।

और दिव्य मनोरंजन की वे कलाएँ जो पृथ्वी के सामान्य क्षत्रिय जीवन का हिस्सा नहीं थीं।

यहाँ अर्जुन का चरित्र एक और आश्चर्यजनक रूप लेता है।

हम उसे धनुर्धर जानते हैं। लेकिन महाभारत उसे केवल युद्धकला तक सीमित नहीं रखता।

वह— संगीत सीखता है। नृत्य सीखता है। गन्धर्वविद्या सीखता है।

यह शिक्षा बाद में विराटपर्व में अत्यन्त महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी, जब अर्जुन बृहन्नला के रूप में विराट की राजकुमारी उत्तरा को नृत्य-संगीत सिखाएगा।

अर्थात् आज अमरावती में सीखी गई कला आगे पृथ्वी पर उसके अज्ञातवास में उसके काम आएगी।

यह महाभारत की कथा-रचना का अत्यन्त सुंदर उदाहरण है—

जो अभी स्वर्ग में शिक्षा है, वही आगे पृथ्वी पर उसके जीवन की रक्षा का साधन बनेगी।

अर्जुन का नया रूप

यहाँ अर्जुन को केवल “दिव्यास्त्रों का संग्रहकर्ता” समझना गलत होगा।

वह एक पूर्ण योद्धा बन रहा है।

उसे— धनुर्विद्या आती है। दिव्यास्त्र आते हैं। देवताओं की शक्तियाँ प्राप्त हैं।

गन्धर्वविद्या प्राप्त हो रही है। संगीत और नृत्य की शिक्षा मिल रही है।

देवलोक का अनुभव हो रहा है। इस प्रकार वनपर्व में अर्जुन का प्रशिक्षण केवल युद्धकौशल का प्रशिक्षण नहीं है।

यह बहुआयामी व्यक्तित्व-निर्माण है।

इन्द्र का उद्देश्य

इन्द्र अर्जुन को केवल इसलिए स्वर्ग नहीं बुलाते कि वह वहाँ सुख भोगे।

उनका उद्देश्य स्पष्ट है— आगामी युद्ध के लिए अर्जुन को तैयार करना।

कौरवों के पास भी महान योद्धा हैं।

भीष्म हैं। द्रोण हैं। कर्ण है। कृपाचार्य हैं। अश्वत्थामा है। और अनेक महारथी हैं।

इसलिए अर्जुन को ऐसी शक्ति चाहिए जो पृथ्वी के सामान्य युद्ध-कौशल से ऊपर हो।

इन्द्रलोक की शिक्षा इसी तैयारी का अगला चरण है।

स्वर्ग—केवल सुख नहीं, प्रशिक्षण भी

यहाँ वनपर्व के स्वर्ग की हमारी सामान्य धारणा बदलती है।

यदि स्वर्ग केवल सुख का स्थान होता, तो अर्जुन का वहाँ जाना केवल पुरस्कार होता।

लेकिन महाभारत उसे विद्यालय में बदल देता है।

वहाँ— देवता हैं। शिक्षक हैं। गन्धर्व हैं। अस्त्रविद्या है। संगीत है। नृत्य है। रथविद्या है।

और आगे दैत्य-वध का वास्तविक युद्ध भी है।

अर्थात् अर्जुन के लिए स्वर्ग एक प्रकार से उच्चतर प्रशिक्षण-क्षेत्र बन जाता है।

पृथ्वी से अलग एक सामाजिक संसार

अमरावती के वर्णन में एक और बात महत्वपूर्ण है।

पृथ्वी पर समाज जन्म, राज्य, जाति, वंश और सत्ता के अनेक बन्धनों से बना हुआ है।

लेकिन इन्द्रसभा में विभिन्न लोकों से आए हुए प्राणी एक साथ दिखाई देते हैं।

ऋषि हैं। देवता हैं।गन्धर्व हैं।सिद्ध हैं।चारण हैं।राजर्षि हैं।

इससे महाभारत का सामाजिक-ब्रह्माण्ड पृथ्वी के राजनीतिक समाज से कहीं व्यापक हो जाता है।

अर्जुन अब केवल कुरुवंश का सदस्य नहीं है।

उसका सम्पर्क एक अन्तरलोकिक समाज से हो रहा है।

नारद के वर्णन की याद

यहाँ हमें एक बार फिर सभा-पर्व की ओर लौटना चाहिए।

युधिष्ठिर ने जब अपनी सभा बनवाई थी, तब नारद ने उसे इन्द्र की सभा का वर्णन सुनाया था।

उस समय वह वर्णन था। अब अर्जुन उस संसार का यात्री है।

यहाँ महाभारत की एक साहित्यिक तकनीक सामने आती है—

पूर्ववर्णित संसार का बाद में प्रत्यक्ष अनुभव।

इसलिए सभा-पर्व में नारद का प्रसंग केवल एक अलग आख्यान नहीं था।

उसका एक दूरगामी कथात्मक फल वनपर्व में दिखाई देता है।

और आगे हम जब इन्द्रसभा का वास्तविक वर्णन पढ़ेंगे, तब यह तुलना और अधिक रोचक होगी—

नारद ने युधिष्ठिर को क्या बताया था? और अर्जुन ने वास्तव में क्या देखा?

यही तुलना हमारे शोध का एक अच्छा विषय बनेगी।

अर्जुन को दिव्य अस्त्रों की शिक्षा

अब इन्द्र अर्जुन को बताते हैं कि उसे अनेक दिव्यास्त्रों का ज्ञान प्राप्त करना होगा।

यम का दण्ड। वरुण का पाश। कुबेर का अस्त्र। शिव का पाशुपत। और स्वयं इन्द्र के आयुध।

लेकिन केवल नाम जान लेना पर्याप्त नहीं है।

अर्जुन को इनके— प्रयोग, संधान, आवाहन और उपसंहार की विद्या प्राप्त करनी है।

यहाँ “अस्त्र” और “विद्या” का सम्बन्ध फिर सामने आता है।

यही महाभारत का एक महत्वपूर्ण सिद्धान्त है—

शक्ति केवल प्राप्त नहीं की जाती; उसे धारण करने की योग्यता भी अर्जित करनी पड़ती है।

कथा का अगला द्वार

अमरावती में अर्जुन का प्रवेश अभी केवल आरम्भ है।

आगे वह इन्द्र की सभा देखेगा।

गन्धर्वों और अप्सराओं के संसार को और निकट से जानेगा।

उसे अनेक दिव्यास्त्रों की शिक्षा मिलेगी। और सबसे महत्वपूर्ण—

इन्द्र उसे एक ऐसे अभियान पर भेजेंगे जहाँ उसे केवल मनुष्यों से नहीं, निवातकवच दानवों से युद्ध करना होगा।

वहाँ अर्जुन की वास्तविक दिव्य-योद्धा परीक्षा शुरू होगी।

अभी तक उसने— शिव को प्रसन्न किया। यम से दण्ड पाया। वरुण से पाश पाया। कुबेर से अन्तर्धानास्त्र पाया।

अब उसे सिद्ध करना होगा कि वह इन शक्तियों का उचित उपयोग करने वाला योद्धा भी है।

इस प्रसंग का शोध-मूल्य

इस प्रसंग को पाँच दृष्टियों से आगे शोध के लिए सुरक्षित रखना चाहिए।

पहला—अमरावती की संरचना: महाभारत का स्वर्ग केवल धार्मिक लोक है या उसमें नगर, राजसभा, उद्यान, निवासी और प्रशासन जैसी स्पष्ट सामाजिक संरचनाएँ भी हैं?

दूसरा—इन्द्रसभा और मयसभा: सभा-पर्व में निर्मित मयसभा तथा वनपर्व में देखी गई इन्द्रसभा—दोनों की तुलना से महाभारत के “आदर्श राजसभा” की कल्पना कितनी स्पष्ट होती है?

तीसरा—चित्रसेन और अर्जुन: घोषयात्रा में बने सम्बन्ध का अमरावती में पुनः उपयोग महाभारत की कथा-संरचना के बारे में क्या बताता है?

चौथा—बृहन्नला की पूर्वभूमि: अर्जुन द्वारा स्वर्ग में नृत्य-संगीत सीखना और विराटपर्व में बृहन्नला बनना—क्या यह पूर्व-संकेत है या केवल बाद में उपयोग किया गया कथानक-संसाधन?

पाँचवाँ—स्वर्ग का द्वैत: स्वर्ग आनन्द का स्थान है, लेकिन अर्जुन के लिए वही कठोर प्रशिक्षण का स्थान भी है। क्या यह महाभारत के “स्वर्ग” की सामान्य लोकधारणा को जटिल बनाता है?

कथा-सूत्र

अब तक अर्जुन की यात्रा—

वन → हिमालय → तपस्या → शिव → पाशुपतास्त्र → यम → दण्ड → वरुण → पाश → कुबेर → अन्तर्धानास्त्र → इन्द्र → अमरावती

तक पहुँच चुकी है।

अब कहानी का अगला चरण केवल देवदर्शन नहीं है।

अब परीक्षा का अगला स्तर युद्ध है।

और वह युद्ध पृथ्वी के किसी राजा से नहीं होगा।

निवातकवच दानवों से होगा।

मुकेश श्रीवास्तव
आत्मसन्तुलन आध्यात्मिक ऊर्जा केंद्र
(इस ब्लॉग के लेखों के किसी भी अंश या पूरे लेख का उपयोग करने के पहले लेखक की अनुमति अनिवार्य है।)

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