महाभारत — भीष्मपर्व — भाग 28 : कर्मफल — यदि आत्मा अकर्ता है, तो कर्म का फल किसे मिलता है?
महाभारत — भीष्मपर्व — भाग 28 : कर्मफल — यदि आत्मा अकर्ता है, तो कर्म का फल किसे मिलता है?
वर्ण, स्वधर्म और गुण-कर्म की चर्चा के बाद गीता का प्रश्न और भीतर उतरता है।
यदि प्रकृति ही कर्म करती है, यदि गुण ही मनुष्य को प्रेरित करते हैं और यदि आत्मा वास्तव में अकर्ता और साक्षी है, तो फिर कर्म का फल किसे मिलता है?
पाप कौन करता है? पुण्य कौन करता है? कर्मफल किसे प्राप्त होता है?
और यदि आत्मा इन सबका केवल साक्षी है, तो जन्म-मृत्यु और कर्मबन्धन किसके हैं?
यही प्रश्न भारतीय दर्शन में कर्ता, भोक्ता, कर्म और कर्मफल के सम्बन्ध को समझने की कुंजी बन जाता है।
गीता कहती है—
प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः। अहङ्कारविमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते॥ (गीता 3.27)
प्रकृति के गुण सभी कर्म करते हैं और अहंकार से मोहित व्यक्ति सोचता है— “मैं कर्ता हूँ।”
लेकिन आगे कृष्ण कहते हैं—
तत्त्ववित्तु महाबाहो गुणकर्मविभागयोः। गुणा गुणेषु वर्तन्त इति मत्वा न सज्जते॥ (गीता 3.28)
तत्त्वज्ञानी समझता है कि गुण ही गुणों में प्रवृत्त हो रहे हैं और इसलिए वह आसक्त नहीं होता।
यहाँ एक महत्वपूर्ण भेद खुलता है— कर्म हो रहा है और “मैं कर्म कर रहा हूँ”—इन दोनों में अन्तर है।
फिर कर्मफल किसे मिलता है?
यदि केवल आत्मा को देखें तो वह नित्य, साक्षी और अकर्ता है।
लेकिन यदि केवल आत्मा को देखकर कर्मफल की बात करें, तो संसार का पूरा नैतिक ढाँचा असम्भव हो जाएगा।
इसलिए भारतीय दर्शन में व्यक्ति के दो स्तरों को समझना आवश्यक है।
एक है— शुद्ध आत्मा।
दूसरा है— जीव।
जीव शरीर, मन, बुद्धि, अहंकार, संस्कार और कर्म-संबन्ध से युक्त अनुभवकर्ता है।
यही जीव सुख-दुःख का अनुभव करता है। यही कर्म करता हुआ दिखाई देता है।
यही कर्मफल का भोक्ता बनता है। इसलिए—
आत्मा अकर्ता हो सकती है, लेकिन जीव कर्मकर्ता और भोक्ता के रूप में संसार में स्थित होता है।
यहीं कर्मसिद्धान्त और आत्मदर्शन का सम्बन्ध बनता है।
कर्ता कौन है?
गीता अठारहवें अध्याय में कर्तृत्व का एक अत्यन्त सूक्ष्म विश्लेषण करती है।
पञ्चैतानि महाबाहो कारणानि निबोध मे। सांख्ये कृतान्ते प्रोक्तानि सिद्धये सर्वकर्मणाम्॥ (गीता 18.13)
कृष्ण कहते हैं कि प्रत्येक कर्म की सिद्धि के पाँच कारण बताए गए हैं।
फिर— अधिष्ठानं तथा कर्ता करणं च पृथग्विधम्। विविधाश्च पृथक्चेष्टा दैवं चैवात्र पञ्चमम्॥ (गीता 18.14)
यहाँ पाँच तत्व हैं— अधिष्ठान, कर्ता, करण, चेष्टा और दैव।
अर्थात् किसी कर्म को केवल एक अकेले “मैं” के खाते में डाल देना पर्याप्त नहीं है।
शरीर और परिस्थिति हैं। कर्ता-तत्त्व है। इन्द्रियाँ और उपकरण हैं। विभिन्न प्रकार की चेष्टाएँ हैं।
और परिस्थितियों का एक ऐसा पक्ष भी है जिसे व्यक्ति पूरी तरह नियंत्रित नहीं करता।
इससे गीता कर्तृत्व को एक बहुस्तरीय प्रक्रिया के रूप में देखती है।
अहंकार का प्रश्न - फिर कृष्ण कहते हैं—
तत्रैवं सति कर्तारमात्मानं केवलं तु यः। पश्यत्यकृतबुद्धित्वान्न स पश्यति दुर्मतिः॥ (गीता 18.16)
जो इन सभी कारणों की उपस्थिति के बावजूद केवल आत्मा को ही कर्ता मानता है, वह वास्तविकता को ठीक से नहीं देखता।
यहाँ “आत्मा कर्ता नहीं” का अर्थ यह नहीं कि मनुष्य अपने कर्मों के लिए किसी भी प्रकार उत्तरदायी नहीं है।
अर्थ यह है कि शुद्ध आत्मा को शरीर-मन-प्रकृति के समस्त कार्यों का व्यक्तिगत कर्ता मानना दार्शनिक रूप से उचित नहीं।
व्यवहार के स्तर पर कर्ता है। परमार्थ के स्तर पर आत्मा साक्षी है।
यही दो स्तरों को न समझने से कर्म और आत्मा के बीच विरोधाभास पैदा होता है।
कर्मफल का तंत्र
कर्मफल को केवल किसी बाहरी शक्ति द्वारा दिए गए पुरस्कार और दण्ड की तरह देखना अधूरा होगा।
कर्म मनुष्य के भीतर भी संस्कार उत्पन्न करता है। एक कर्म दूसरी प्रवृत्ति को मजबूत करता है।
एक इच्छा दूसरी इच्छा को जन्म देती है। एक आसक्ति अगली आसक्ति को जन्म देती है।
गीता पहले ही यह क्रम बता चुकी है—
ध्यायतो विषयान्पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते। सङ्गात्संजायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते॥ (गीता 2.62)
विषय पर बार-बार चिन्तन से संग पैदा होता है। संग से कामना। कामना से क्रोध। क्रोध से मोह। मोह से स्मृति-विभ्रम। और अन्ततः बुद्धिनाश।
इस दृष्टि से कर्मफल केवल भविष्य में मिलने वाली कोई वस्तु नहीं है।
कर्म उसी क्षण से फल देना प्रारम्भ कर सकता है जब वह मन की संरचना को बदलता है।
कर्म बाहर भी, भीतर भी
मान लीजिए कोई व्यक्ति बार-बार क्रोध करता है।
बाहरी कर्म का फल किसी दूसरे व्यक्ति को मिला—वह घायल हुआ, सम्बन्ध टूट गया या विवाद उत्पन्न हुआ।
लेकिन क्रोध करने वाले के भीतर भी कुछ हुआ। क्रोध की प्रवृत्ति मजबूत हुई।
मन में एक संस्कार गहरा हुआ। अगली परिस्थिति में क्रोध की सम्भावना बढ़ गई।
इस प्रकार— कर्म बाहरी संसार को बदलता है और कर्मकर्ता की आन्तरिक संरचना को भी।
यही कर्मफल की एक गहरी मनोवैज्ञानिक परत है।
संस्कार से स्वभाव, स्वभाव से कर्म
अब पिछले अध्यायों की पूरी श्रृंखला एक-दूसरे से जुड़ती है। गुण स्वभाव को प्रभावित करते हैं।
स्वभाव कर्म को प्रभावित करता है। कर्म संस्कार को प्रभावित करता है।
संस्कार फिर भविष्य के स्वभाव और कर्म को प्रभावित कर सकते हैं।
इस प्रकार एक चक्र बनता है— गुण → स्वभाव → कर्म → संस्कार → पुनः स्वभाव।
यही कर्मबन्धन की मनोवैज्ञानिक संरचना के रूप में समझा जा सकता है।
जब तक मनुष्य इस चक्र को अचेतन रूप से दोहराता है, वह अपने कर्मों के परिणामों से बँधा रहता है।
कर्मबन्धन क्या है?
कर्म स्वयं बन्धन नहीं है। गीता का पूरा कर्मयोग इसी बात का प्रमाण है।
यदि कर्म ही बन्धन होता, तो मुक्ति के लिए कर्म का त्याग अनिवार्य होता।
लेकिन कृष्ण कहते हैं—
योगस्थः कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनञ्जय। सिद्ध्यसिद्ध्योः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते॥ (गीता 2.48)
कर्म करते हुए भी आसक्ति छोड़ी जा सकती है। इसलिए बन्धन का मूल केवल कर्म में नहीं है।
कर्म के साथ जुड़ी आसक्ति, अहंकार और फल की मानसिक पकड़ बन्धन को जन्म देती है।
कर्मयोग कर्म को कैसे बदलता है?
कर्मयोग का सूत्र है— कर्म रहे, लेकिन कर्तृत्व का अहंकार ढीला पड़े।
फल आए, लेकिन फल के साथ आत्म-मूल्य न बँधे।
सफलता मिले, लेकिन “मैं ही सब कुछ हूँ” का भाव न बने।
असफलता आए, लेकिन “मैं समाप्त हो गया” जैसी पहचान न बने।
यही कारण है कि गीता कर्म छोड़ने की अपेक्षा कर्म की चेतना बदलने पर बल देती है।
कर्म वही हो सकता है। लेकिन कर्मकर्ता की आन्तरिक स्थिति बदल सकती है।
क्या निष्काम कर्म का अर्थ फल की उपेक्षा है?
नहीं। “निष्काम” को कई बार गलत अर्थ में लिया जाता है कि कर्म का परिणाम महत्वहीन है।
लेकिन कोई भी जिम्मेदार कर्म परिणाम से पूरी तरह निरपेक्ष नहीं हो सकता।
कृष्ण का आशय अधिक सूक्ष्म है— फल की चिंता से कर्म की बुद्धि को नष्ट मत होने दो।
मनुष्य को परिणाम के लिए प्रयास करना है, लेकिन परिणाम को अपनी सम्पूर्ण मानसिक पहचान नहीं बना लेना है।
इसीलिए— कर्म में पूर्णता, फल में समत्व। यह कर्मयोग का व्यावहारिक रूप है।
कर्मफल और पुनर्जन्म
भारतीय दर्शन में कर्मफल की चर्चा पुनर्जन्म के सिद्धान्त से भी जुड़ती है।
जो संस्कार इस जीवन में पूर्ण रूप से समाप्त नहीं होते, उनके आगे भी प्रभाव की कल्पना की जाती है।
गीता पुनर्जन्म की धारणा को स्वीकार करती है—
जातस्य हि ध्रुवो मृत्युर्ध्रुवं जन्म मृतस्य च। (गीता 2.27)
और— वासांसि जीर्णानि यथा विहाय नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि। (गीता 2.22)
लेकिन यहाँ शोध की दृष्टि से एक सावधानी आवश्यक है।
पुनर्जन्म और कर्मफल भारतीय दार्शनिक परम्पराओं के महत्वपूर्ण सिद्धान्त हैं, पर इन्हें आधुनिक वैज्ञानिक सिद्ध तथ्य के रूप में प्रस्तुत करना उचित नहीं होगा।
दार्शनिक सिद्धान्त, धार्मिक आस्था और अनुभवजन्य विज्ञान—इनके प्रमाण-पद्धति अलग हैं।
यदि सब कुछ कर्मफल है, तो करुणा कहाँ?
कर्मसिद्धान्त की एक गलत व्याख्या यह हो सकती है—
“जिसके साथ बुरा हुआ, उसने पिछले जन्म में बुरा कर्म किया होगा।”
यह निष्कर्ष न तो आवश्यक है और न ही गीता से स्वतः सिद्ध होता है।
कर्मफल का सिद्धान्त किसी पीड़ित के प्रति करुणा को समाप्त नहीं करता।
इसके विपरीत गीता बार-बार अद्वेष्टा, मैत्री, करुणा और समत्व की बात करती है।
इसलिए किसी व्यक्ति के दुःख को देखकर उसका न्याय करना कर्मसिद्धान्त का उद्देश्य नहीं होना चाहिए।
दूसरे के दुःख के सामने हमारा तत्काल धर्म— करुणा और उचित कर्म है।
ज्ञान होने पर कर्मफल का क्या होता है?
अब प्रश्न और सूक्ष्म हो जाता है। यदि व्यक्ति जान ले कि— “मैं शुद्ध आत्मा हूँ, प्रकृति के गुण ही कर्म कर रहे हैं,”
तो क्या उसके पुराने कर्म समाप्त हो जाते हैं?
वेदान्त परम्पराओं में इस प्रश्न पर विस्तृत चर्चा हुई है।
गीता कहती है—
यथैधांसि समिद्धोऽग्निर्भस्मसात्कुरुतेऽर्जुन। ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि भस्मसात्कुरुते तथा॥ (गीता 4.37)
ज्ञान की अग्नि कर्मों को भस्म करने वाली कही गई है।
लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि ज्ञानी व्यक्ति के शरीर को भूख नहीं लगती, रोग नहीं होता या उसके पूर्व कर्मों के सभी दृश्य परिणाम तत्काल समाप्त हो जाते हैं।
भारतीय वेदान्त में सञ्चित, प्रारब्ध और क्रियमाण/आगामि कर्म की व्याख्याएँ इसी प्रश्न को सूक्ष्म रूप से समझाने के लिए विकसित हुईं।
यहाँ गीता का मूल बिन्दु है— ज्ञान कर्म के साथ व्यक्ति की पहचान को बदल देता है।
आत्मा और जीव का भेद
अब वह सूत्र स्पष्ट होता है जो पूरे प्रश्न को सुलझाता है।
आत्मा—साक्षी, नित्य, अकर्ता।
जीव—शरीर, मन, बुद्धि और अहंकार से सम्बद्ध अनुभवकर्ता।
व्यवहार में कर्म जीव करता है। कर्मफल जीव अनुभव करता है।
आत्मज्ञान में जीव अपने वास्तविक स्वरूप को आत्मा के रूप में पहचानता है।
तब कर्म चलता रह सकता है, लेकिन कर्तृत्व की अहंता धीरे-धीरे शिथिल होती है।
इसीलिए ज्ञानी का शरीर कर्म कर सकता है, लेकिन उसकी आन्तरिक पहचान कर्मफल से उसी प्रकार नहीं बँधती जैसे अज्ञानी की।
एक गहरा विरोधाभास
अब हमारे सामने दो कथन हैं— “मैं कर्ता हूँ।” और— “मैं कर्ता नहीं हूँ।” दोनों में से कौन सत्य है?
गीता के स्तरों को समझे बिना यह विरोधाभास बना रहेगा।
व्यवहार के स्तर पर— मैं कर्म करता हूँ।
नैतिक स्तर पर— मैं अपने कर्म के लिए उत्तरदायी हूँ।
योग के स्तर पर— मुझे कर्मफल में आसक्ति नहीं रखनी चाहिए।
ज्ञान के स्तर पर— शुद्ध आत्मा अकर्ता है।
इसलिए गीता किसी एक स्तर को दूसरे से नष्ट नहीं करती।
वह उन्हें क्रमशः जोड़ती है।
सृष्टि - मनुष्य का सबसे बड़ा भ्रम शायद यह नहीं कि वह कर्म करता है।
भ्रम यह है कि— “मेरे कर्म ही मेरी सम्पूर्ण पहचान हैं।”
मैंने सफलता प्राप्त की—इसलिए मैं सफल हूँ।
मैं असफल हुआ—इसलिए मैं असफल हूँ।
मैंने पाप किया—इसलिए मैं पाप ही हूँ।
मैंने पुण्य किया—इसलिए मैं पुण्यात्मा ही हूँ।
गीता इस पहचान को धीरे-धीरे ढीला करती है।
कर्म आवश्यक है। उत्तरदायित्व आवश्यक है। कर्मफल भी जीवन का तथ्य है।
लेकिन इन सबके पीछे एक ऐसा चैतन्य है जो कर्मों का साक्षी है।
यहीं कर्मयोग ज्ञानयोग की ओर खुलता है।
और अब अगला प्रश्न और भी गहरा है—
यदि कर्म ही बन्धन का कारण बनता है, तो क्या कर्म का पूर्ण त्याग ही मुक्ति का मार्ग है? या मनुष्य कर्म करते हुए भी कर्मबन्धन से मुक्त हो सकता है?
अगला प्रसंग इसी निर्णायक प्रश्न पर होगा—
कर्मसंन्यास और कर्मयोग — मुक्ति के लिए कर्म छोड़ना आवश्यक है या कर्म करते हुए मुक्त हुआ जा सकता है?
मुकेश श्रीवास्तव
आत्मसन्तुलन आध्यात्मिक ऊर्जा केंद्र
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