महाभारत — भीष्मपर्व — भाग 6 : स्वधर्ममपि चावेक्ष्य — अर्जुन के कर्तव्य का प्रश्न

महाभारत — भीष्मपर्व — भाग 6 : स्वधर्ममपि चावेक्ष्य — अर्जुन के कर्तव्य का प्रश्न

कृष्ण अब तक अर्जुन के शोक की पहली दार्शनिक परत खोल चुके हैं।

देह बदलती है। आत्मा के विषय में उसका विनाश स्वीकार नहीं किया जाता।

मृत्यु को केवल देह के अंत के रूप में देखना पूर्ण दृष्टि नहीं है।

लेकिन यहाँ एक कठिन प्रश्न अभी भी सामने है—

यदि आत्मा अविनाशी है, तो अर्जुन को युद्ध करना ही क्यों चाहिए?

आत्मज्ञान अपने आप में युद्ध का आदेश नहीं बन जाता। इसलिए कृष्ण अब तर्क को दूसरी भूमि पर ले जाते हैं।

वह कहते हैं—

स्वधर्ममपि चावेक्ष्य न विकम्पितुमर्हसि।
धर्म्याद्धि युद्धाच्छ्रेयोऽन्यत्क्षत्रियस्य न विद्यते॥

“अपने स्वधर्म को भी देखते हुए तुम्हें विचलित नहीं होना चाहिए; क्षत्रिय के लिए धर्मयुक्त युद्ध से बढ़कर कोई अन्य श्रेयस्कर कर्तव्य नहीं है।”

यहाँ गीता में पहली बार आत्मा के दार्शनिक प्रश्न से सामाजिक-कर्म के प्रश्न की ओर स्पष्ट संक्रमण होता है।

स्वधर्म का अर्थ

“स्वधर्म” शब्द को केवल इतना कह देना कि— “अर्जुन क्षत्रिय है, इसलिए उसे युद्ध करना ही है”

गीता के तर्क को छोटा कर देता है। अर्जुन कोई सामान्य परिस्थिति में युद्ध नहीं कर रहा।

वह उस युद्धभूमि में है जहाँ— राज्य का विवाद है, अन्याय का प्रश्न है, शान्ति के प्रयास विफल हो चुके हैं, दोनों पक्ष युद्ध के लिए उपस्थित हैं, और अर्जुन स्वयं उस राजवंश का प्रमुख योद्धा है।

इसलिए यहाँ स्वधर्म का अर्थ है—

उसकी भूमिका, उत्तरदायित्व और उस परिस्थिति में उससे अपेक्षित धर्मसम्मत कर्म।

गीता का प्रश्न यह नहीं है कि हर व्यक्ति को अपने सामाजिक लेबल के अनुसार लड़ना चाहिए।

प्रश्न है—

जब मनुष्य के सामने उसका उत्तरदायित्व उपस्थित हो और व्यक्तिगत मोह उसके निर्णय को रोक रहा हो, तब वह क्या करे?

“धर्म्याद्धि युद्धात्” - कृष्ण युद्ध को केवल “युद्ध” नहीं कहते।

वे कहते हैं— धर्म्यात् युद्धात्। अर्थात् धर्मयुक्त युद्ध

यह छोटा-सा विशेषण अत्यंत महत्वपूर्ण है।

इससे यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि हर युद्ध धर्मयुद्ध है।

गीता यहाँ अर्जुन के सामने उपस्थित विशिष्ट युद्ध की प्रकृति पर बात कर रही है।

इसलिए “धर्म्य युद्ध” को आधुनिक हर सैन्य संघर्ष पर स्वतः लागू करना पाठ से बाहर जाना होगा।

महाभारत के व्यापक आख्यान में इस युद्ध की पृष्ठभूमि—

द्यूत, वनवास, अज्ञातवास, राज्य-अधिकार, शान्ति-दूतत्व, और सीमित समझौते के असफल होने से बनी है।

इस संदर्भ में कृष्ण अर्जुन के व्यक्तिगत मोह के सामने उसके कर्तव्य को रख रहे हैं।

“यदृच्छया चोपपन्नं स्वर्गद्वारमपावृतम्” कृष्ण आगे कहते हैं—

यदृच्छया चोपपन्नं स्वर्गद्वारमपावृतम्।
सुखिनः क्षत्रियाः पार्थ लभन्ते युद्धमीदृशम्॥

“हे पार्थ! ऐसा युद्ध अपने आप उपस्थित हुआ है, जो क्षत्रिय के लिए खुले हुए स्वर्गद्वार के समान है।”

यहाँ आधुनिक पाठक को सावधान रहना चाहिए।

यहाँ “स्वर्ग” को केवल मृत्यु के बाद मिलने वाले पुरस्कार के रूप में पढ़कर पूरा तर्क समाप्त कर देना उचित नहीं होगा।

गीता अर्जुन के सामने उस समय की क्षत्रिय-धर्म व्यवस्था के भीतर बात कर रही है।

उस व्यवस्था में धर्मसम्मत युद्ध से पीछे हटना कर्तव्य-त्याग माना जा सकता था।

इसलिए कृष्ण अर्जुन को यह दिखा रहे हैं कि—

जिस युद्ध को वह केवल अपने स्वजनों के वध के रूप में देख रहा है, वही युद्ध उसके कर्तव्य की दृष्टि से एक दूसरी संरचना भी रखता है।

विजय और पराजय—दोनों से ऊपर कर्म

फिर कृष्ण अर्जुन के सामने एक और दृष्टि रखते हैं—

सुखदुःखे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ।
ततो युद्धाय युज्यस्व नैवं पापमवाप्स्यसि॥

“सुख-दुःख, लाभ-हानि और जय-पराजय को समान मानकर युद्ध के लिए तैयार हो; इस प्रकार तुम पाप को प्राप्त नहीं करोगे।”

यहाँ गीता का तर्क और अधिक गहरा हो जाता है। अब कृष्ण केवल यह नहीं कह रहे—

युद्ध तुम्हारा कर्तव्य है। वे पूछ रहे हैं— तुम्हारी कर्म-दृष्टि क्या है?

यदि अर्जुन युद्ध इसलिए करे कि— “मैं जीतूँगा।” तो वह फल से बँधा है।

यदि वह इसलिए युद्ध न करे कि— “मैं हार सकता हूँ।” तब भी वह फल से बँधा है।

कृष्ण दोनों को समान देखने की बात करते हैं— लाभ–हानि। जय–पराजय। सुख–दुःख। यही आगे समत्व की शिक्षा का आधार बनेगा।

यहाँ एक महत्वपूर्ण अंतर

अर्जुन की पहली समस्या थी— “मैं इन्हें कैसे मारूँ?”

कृष्ण अब उसे एक दूसरा प्रश्न दे रहे हैं— “तुम कर्म किस मानसिक अवस्था से करोगे?”

यह बहुत बड़ा परिवर्तन है। कर्म का बाहरी रूप वही है। लेकिन कर्मकर्ता की आंतरिक स्थिति बदल सकती है।

एक व्यक्ति युद्ध कर सकता है— लोभ से। प्रतिशोध से। घृणा से। सत्ता के लिए। या कर्तव्य-बोध से।

बाहरी कर्म समान दिखाई दे सकता है, लेकिन उसकी आंतरिक प्रेरणा अलग हो सकती है।

गीता इसी अंतर को पकड़ती है। 

“एषा तेऽभिहिता सांख्ये” इसके बाद कृष्ण कहते हैं—

एषा तेऽभिहिता सांख्ये बुद्धिर्योगे त्विमां शृणु।
बुद्ध्या युक्तो यया पार्थ कर्मबन्धं प्रहास्यसि॥

“यह बुद्धि मैंने सांख्य के विषय में कही; अब इसे योग में सुनो। ऐसी बुद्धि से युक्त होकर तुम कर्म के बन्धन को छोड़ सकते हो।”

यहाँ पहली बार गीता स्वयं अपने विचार को दो स्तरों से जोड़ती है— सांख्य। योग।

इसका अर्थ बाद के सांख्य-दर्शन और पतञ्जलि-योग के पूरे विकसित तंत्र से तुरंत जोड़ देना उचित नहीं होगा।

गीता में “सांख्य” और “योग” के प्रयोग का अपना संदर्भ है।

यहाँ मोटे रूप में— वास्तविकता की विवेकपूर्ण दृष्टि → सांख्य

और— उस दृष्टि के आधार पर कर्म करने की साधना → योग

के रूप में संबंध दिखाई देता है। लेकिन आगे गीता स्वयं इन दोनों के बीच संबंध को और स्पष्ट करेगी।

कर्म से भागना समाधान नहीं

कृष्ण आगे कर्म और फल के संबंध को स्पष्ट करते हैं—

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥

इस श्लोक को सामान्यतः केवल— “कर्म करो, फल की चिंता मत करो” के रूप में उद्धृत किया जाता है।

लेकिन पूरा श्लोक उससे अधिक गहरा है। इसमें चार बातें हैं—

कर्मण्येव अधिकारः।

फल पर अधिकार नहीं।

फल को कर्म का एकमात्र हेतु मत बनाओ।

और सबसे महत्वपूर्ण— मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि। “तुम्हारी आसक्ति अकर्म में भी न हो।”

अर्थात् फलासक्ति छोड़ना कर्म छोड़ना नहीं है। यह बहुत महत्वपूर्ण है।

अर्जुन की वर्तमान स्थिति में सबसे बड़ा खतरा यही है कि वह अपने मानसिक संकट को देखकर कर्म से हट जाए।

कृष्ण उसे फलासक्ति से भी बचाते हैं और अकर्म से भी। कर्मयोग का बीज

यहीं से “कर्मयोग” का वास्तविक बीज दिखाई देता है।

कर्मयोग का अर्थ केवल अधिक काम करना नहीं है।

न ही यह केवल यह कहता है— “जो करना है करो, परिणाम की चिंता मत करो।”

गीता का अधिक सूक्ष्म संदेश है— कर्तव्य करो, लेकिन अपने अस्तित्व की पूरी स्थिरता को परिणाम से मत बाँधो।

अर्जुन जीत सकता है। हार सकता है। कृष्ण उसे पहले ही परिणाम की गारंटी नहीं देते।

वे उसे परिणाम से परे कर्म की शुद्धता देखने को कहते हैं। “योगस्थः कुरु कर्माणि”

कृष्ण कहते हैं—

योगस्थः कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनञ्जय।
सिद्ध्यसिद्ध्योः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते॥

“हे धनञ्जय! आसक्ति छोड़कर योग में स्थित होकर कर्म करो। सफलता और असफलता में समान रहना ही योग कहलाता है।”

यहीं गीता की एक महान परिभाषा आती है— समत्वं योग उच्यते। योग केवल ध्यान में आँखें बंद करना नहीं है।

यहाँ योग का अर्थ है— परिणामों के उतार-चढ़ाव के बीच बुद्धि का संतुलन।

और यही वह स्थान है जहाँ इस शिक्षा का व्यापक मानवीय अर्थ निकलता है।

मनुष्य की सबसे बड़ी अस्थिरता अक्सर बाहरी घटना से नहीं आती। वह आती है—

“मुझे क्या मिलेगा?” “मैं जीतूँगा या हारूँगा?” “लोग मेरे बारे में क्या कहेंगे?”

जब कर्म का केंद्र इन परिणामों से हटकर कर्तव्य और विवेक पर आता है, तब मन की संरचना बदलती है।

“योगः कर्मसु कौशलम्” इसके तुरंत बाद—

बुद्धियुक्तो जहातीह उभे सुकृतदुष्कृते।
तस्माद्योगाय युज्यस्व योगः कर्मसु कौशलम्॥

“बुद्धियोग से युक्त मनुष्य पुण्य और पाप दोनों के बन्धन से ऊपर उठता है; इसलिए योग में स्थित हो—योग कर्मों में कौशल है।”

कर्मसु कौशलम्। - यहाँ “कौशल” को केवल दक्षता या तकनीकी skill समझना भी अधूरा है।

कर्म में कौशल का अर्थ है— उचित कर्म, उचित दृष्टि, उचित मानसिक स्थिति और परिणाम के प्रति अनासक्ति। - अर्थात् योग कर्म को अधिक सजग बनाता है।

अर्जुन की समस्या का दूसरा उत्तर

अब तक कृष्ण ने अर्जुन के संकट को दो स्तरों पर संबोधित किया है।

पहला— आत्मा और देह का प्रश्न।

दूसरा— कर्तव्य और कर्म का प्रश्न।

अर्जुन कह रहा था— “स्वजन मरेंगे, इसलिए मैं युद्ध नहीं करूँगा।”

कृष्ण कह रहे हैं— “मृत्यु को केवल देह के स्तर पर मत देखो; और अपने कर्तव्य को केवल परिणाम के आधार पर मत तौलो।”

यह अभी भी गीता का पूरा दर्शन नहीं है। लेकिन उसका ढाँचा बनने लगा है।

शोध-निष्कर्ष

इस प्रसंग का सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष यह नहीं है कि—

“अर्जुन क्षत्रिय था, इसलिए उसे युद्ध करना पड़ा।” इतना कहना गीता की गहराई को समाप्त कर देता है।

अधिक महत्वपूर्ण बात यह है कि कृष्ण अर्जुन को तीन क्रमिक स्तरों से ले जा रहे हैं—

शोक से आत्मदृष्टि की ओर।

आत्मदृष्टि से कर्तव्य की ओर।

कर्तव्य से निष्काम कर्म की ओर।

और इसी क्रम में एक नया सूत्र सामने आता है— समत्वं योग उच्यते।

यानी कर्मयोग का केंद्र केवल कर्म नहीं है।  कर्म करते समय मन की स्थिति क्या है—यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है।

लेकिन यहाँ एक कठिन प्रश्न अभी बाकी है। यदि कर्म करना है और फल पर अधिकार नहीं है, तो—

कर्म करने वाला फल से कैसे मुक्त रह सकता है?

और यदि अर्जुन को युद्ध करना ही है, तो— क्या हर कर्म को केवल “कर्तव्य” कह देने से वह निष्काम हो जाएगा?

यहीं से गीता का अगला चरण और सूक्ष्म होता है— स्थितप्रज्ञ कौन है?

कृष्ण अब कर्म के बाहर से नहीं, स्थिर बुद्धि वाले मनुष्य की भीतर की अवस्था से योग को समझाएँगे।

मुकेश श्रीवास्तव
आत्मसन्तुलन आध्यात्मिक ऊर्जा केंद्र
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