महाभारत — शल्यपर्व — भाग १ : कर्ण के बाद — शल्य का सेनापतित्व

महाभारत — शल्यपर्व — भाग १ : कर्ण के बाद — शल्य का सेनापतित्व

कर्ण के पतन के साथ कुरुक्षेत्र का युद्ध अपने अंतिम चरण में प्रवेश कर चुका था।

भीष्म, द्रोण और कर्ण—कौरव सेना के तीन महान सेनापति अब रणभूमि में नहीं थे। विशाल सेना का अधिकांश भाग नष्ट हो चुका था, फिर भी दुर्योधन ने युद्ध रोकने का विचार नहीं किया।

अब उसके सामने सबसे बड़ा प्रश्न था—

कौरव सेना का नेतृत्व कौन करेगा?

उत्तर था—मद्रराज शल्य।

शल्य का सेनापति बनना

कर्ण की मृत्यु के बाद दुर्योधन ने शल्य को कौरव सेना का सेनापति बनाया।

यह चयन अपने भीतर एक विचित्र विडम्बना रखता है।

शल्य मूलतः पाण्डवों के मामा थे—नकुल और सहदेव के मातुल। परिस्थितियों और दुर्योधन की राजनीतिक चालों के कारण वे कौरव पक्ष में आ गए थे।

अब वही शल्य कौरव सेना के अंतिम प्रमुख सेनानायक बने।

कर्ण के साथ वे सारथि की भूमिका में थे।

अब वे स्वयं सेनापति थे।

युद्ध की दिशा बदल चुकी थी।

अठारहवें दिन की ओर

महाभारत के युद्ध में अब तक सत्रह दिनों का विनाश हो चुका था।

कौरवों की प्रारम्भिक विशाल सैन्य शक्ति लगभग समाप्त हो चुकी थी।

लेकिन शेष सेना अभी भी युद्ध करने में सक्षम थी।

शल्य ने सेना को व्यवस्थित किया और दुर्योधन ने युद्ध जारी रखने का निर्णय लिया।

यहाँ कथा में एक महत्वपूर्ण परिवर्तन आता है।

अब युद्ध किसी एक महान योद्धा की व्यक्तिगत प्रतिज्ञा पर केन्द्रित नहीं है।

अब लक्ष्य है—जो कुछ बचा है, उसके साथ अन्तिम संघर्ष।

युधिष्ठिर और शल्य का संघर्ष

अठारहवें दिन शल्य स्वयं युद्ध में उतरते हैं।

उनका सामना अन्ततः युधिष्ठिर से होता है।

यह प्रसंग विशेष रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि युधिष्ठिर को सामान्यतः महाभारत में युद्ध के आक्रामक योद्धा के रूप में नहीं देखा जाता।

लेकिन कुरुक्षेत्र की वास्तविकता अलग थी।

राजा युधिष्ठिर भी युद्ध के नियमों से बाहर नहीं थे।

उन्हें भी अस्त्र उठाने थे।

उन्हें भी अपने विरोधी का सामना करना था।

और अब उनका सामना कौरव सेना के सेनापति शल्य से था।

युद्ध का परिणाम

युधिष्ठिर और शल्य के बीच घोर युद्ध हुआ।

शल्य ने पाण्डव सेना पर भीषण आक्रमण किया।

युधिष्ठिर ने अपने भाइयों और प्रमुख योद्धाओं के सहयोग से उनका सामना किया।

अन्ततः युधिष्ठिर ने शल्य का वध किया।

इस घटना का सैन्य महत्व बहुत बड़ा था।

कर्ण के बाद कौरव सेना का अंतिम सेनापति भी मारा गया।

अब कौरव पक्ष के पास संगठित नेतृत्व लगभग समाप्त हो चुका था।

एक महत्वपूर्ण परिवर्तन

शल्य की मृत्यु केवल एक योद्धा की मृत्यु नहीं थी।

इसके साथ कौरवों की सैन्य संरचना का एक और स्तम्भ गिर गया।

क्रम देखिए—

भीष्म → द्रोण → कर्ण → शल्य

हर चरण के साथ कौरव सेना का नेतृत्व छोटा होता गया।

और हर सेनापति की मृत्यु के बाद युद्ध का केन्द्र दुर्योधन के और निकट आता गया।

अब प्रश्न सेना का नहीं, स्वयं दुर्योधन के अस्तित्व का था।

युद्धभूमि से सरोवर तक

शल्य के मारे जाने के बाद कौरव सेना लगभग टूट गई।

दुर्योधन ने परिस्थिति को समझ लिया।

वह युद्धभूमि से हटकर एक सरोवर में जा छिपा।

यहीं से महाभारत का युद्ध एक नए रूप में प्रवेश करता है।

अब विशाल सेनाओं की आवश्यकता नहीं थी।

न व्यूह था, न अक्षौहिणियों की व्यवस्था।

अब केवल दो व्यक्तियों के बीच अंतिम संघर्ष शेष था—

दुर्योधन और भीम।

लेकिन उस संघर्ष तक पहुँचने से पहले महाभारत हमें एक और महत्वपूर्ण दृश्य दिखाता है—

युद्ध समाप्ति की ओर है, परन्तु प्रतिशोध अभी समाप्त नहीं हुआ है।

दुर्योधन के छिप जाने के बाद पाण्डव उसे खोजते हैं।

और जब वह सामने आता है, तब कुरुक्षेत्र का सबसे प्रसिद्ध व्यक्तिगत युद्ध आरम्भ होता है—

भीम और दुर्योधन का गदायुद्ध।

यहीं शल्यपर्व का अगला निर्णायक प्रसंग शुरू होगा।

मुकेश श्रीवास्तव
आत्मसन्तुलन आध्यात्मिक ऊर्जा केंद्र
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