महाभारत — शान्तिपर्व — भाग १० - कृषि, व्यापार और उत्पादन — समृद्ध राज्य की वास्तविक नींव
महाभारत — शान्तिपर्व — भाग १० - कृषि, व्यापार और उत्पादन — समृद्ध राज्य की वास्तविक नींव
राजकोष राज्य की शक्ति का आधार हो सकता है, लेकिन राजकोष स्वयं धन उत्पन्न नहीं करता।
धन कहीं और पैदा होता है—भूमि में, श्रम में, व्यापार में, पशुधन में, शिल्प में और मनुष्य की उत्पादन-क्षमता में।
इसलिए राजा यदि केवल कोष भरने पर ध्यान दे और उस उत्पादन-व्यवस्था की रक्षा न करे जिससे कोष भरता है, तो वह अपनी ही शक्ति की जड़ काटने लगता है।
यही कारण है कि राजधर्म में अर्थव्यवस्था का प्रश्न केवल कर-संग्रह का प्रश्न नहीं है।
उससे पहले प्रश्न है—
प्रजा उत्पादन कैसे करे और सुरक्षित होकर अपनी आजीविका कैसे चलाए?
युधिष्ठिर के लिए यह प्रश्न युद्ध के बाद और भी महत्वपूर्ण था। कुरुक्षेत्र ने केवल सेनाओं को नष्ट नहीं किया था; युद्ध का प्रभाव ग्रामों, परिवारों, कृषि और व्यापार पर भी पड़ा होगा। इसलिए विजय के बाद राज्य को फिर से उत्पादनशील बनाना आवश्यक था।
भूमि केवल राजस्व का साधन नहीं
प्राचीन भारतीय अर्थव्यवस्था में कृषि की भूमिका अत्यन्त महत्वपूर्ण थी।
भूमि से अन्न आता है।
अन्न से जीवन चलता है।
जीवन से श्रम उत्पन्न होता है।
श्रम से उत्पादन होता है।
उत्पादन से व्यापार चलता है।
और व्यापार तथा उत्पादन से राज्य को राजस्व प्राप्त होता है।
इसलिए यदि राज्य केवल यह देखे कि किसान से कितना लिया जा सकता है, लेकिन यह न देखे कि किसान की भूमि कितनी उपजाऊ है, जल की व्यवस्था कैसी है, बीज उपलब्ध हैं या नहीं और फसल सुरक्षित है या नहीं, तो राजस्व की उसकी अपनी आधारभूमि कमजोर हो जाएगी।
यही वह आर्थिक दृष्टि है जिसमें प्रजा की उत्पादकता और राज्य की समृद्धि एक-दूसरे से जुड़ी हुई हैं।
राजा को उत्पादन की रक्षा क्यों करनी चाहिए?
किसान अपनी भूमि पर श्रम करता है।
व्यापारी अपना धन और जोखिम लगाता है।
शिल्पी अपना कौशल लगाता है।
पशुपालक अपने पशुधन की देखभाल करता है।
इन सबके पीछे एक समान आवश्यकता है—सुरक्षा।
यदि मार्ग असुरक्षित हों, चोरी सामान्य हो जाए, बाजार में छल बढ़ जाए, या शक्तिशाली व्यक्ति कमजोर उत्पादक को दबाने लगे, तो उत्पादन घटने लगता है।
इसलिए पिछले भाग में जिस सुरक्षा और न्याय की चर्चा हुई थी, उसका आर्थिक परिणाम भी है।
न्यायपूर्ण राज्य केवल अपराध कम नहीं करता; वह आर्थिक गतिविधि के लिए विश्वास पैदा करता है।
व्यक्ति तभी निवेश करता है, श्रम करता है और व्यापार बढ़ाता है जब उसे विश्वास हो कि उसका परिश्रम पूरी तरह असुरक्षित नहीं है।
व्यापार और राज्य
व्यापार के विषय में भी राज्य के सामने दो अतियाँ हो सकती हैं।
एक ओर राज्य इतना हस्तक्षेप करे कि व्यापारी के लिए स्वतंत्र आर्थिक गतिविधि कठिन हो जाए।
दूसरी ओर राज्य इतना उदासीन हो जाए कि बाजार में छल, माप-तौल की धोखाधड़ी और कृत्रिम संकट बढ़ जाए।
इसलिए राजधर्म का उद्देश्य केवल व्यापार से कर लेना नहीं हो सकता।
राजा को यह भी देखना होगा कि व्यापार विश्वसनीय और व्यवस्थित रहे।
माप सही हों।
लेन-देन में छल न हो।
मार्ग सुरक्षित हों।
बाजारों में अनुचित दबाव न बने।
और व्यापारियों तथा उपभोक्ताओं दोनों के हितों की रक्षा हो।
यहाँ आधुनिक अर्थव्यवस्था से सीधी समानता स्थापित करना उचित नहीं होगा। प्राचीन व्यापारिक संस्थाएँ, बाजार और राज्य-संरचनाएँ आधुनिक व्यवस्था से अलग थीं। फिर भी मूल समस्या समान दिखाई देती है—
आर्थिक गतिविधि की स्वतंत्रता और उसकी सामाजिक मर्यादा के बीच संतुलन।
संपत्ति और उत्तरदायित्व
राजधर्म का एक और महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि संपत्ति केवल अधिकार नहीं, उत्तरदायित्व भी उत्पन्न करती है।
धन का संचय व्यक्ति की क्षमता का परिणाम हो सकता है, लेकिन उस धन का उपयोग समाज से पूरी तरह अलग नहीं होता।
कृषि को भूमि चाहिए।
व्यापार को मार्ग चाहिए।
व्यवसाय को सुरक्षा चाहिए।
बाजार को सामाजिक विश्वास चाहिए।
अर्थात् निजी आर्थिक गतिविधि भी किसी व्यापक सामाजिक व्यवस्था के भीतर ही सम्भव होती है।
इसलिए राज्य का दायित्व है कि वह ऐसी परिस्थितियाँ बनाए जिसमें संपत्ति का सृजन हो सके, लेकिन उसका संचय सामाजिक विघटन का कारण न बने।
दुर्बल की आर्थिक सुरक्षा
अर्थव्यवस्था की परीक्षा केवल समृद्ध व्यक्ति से नहीं होती।
यह देखना अधिक महत्वपूर्ण है कि कमजोर व्यक्ति कितना सुरक्षित है।
यदि किसी किसान की पूरी फसल नष्ट हो जाए, यदि किसी व्यापारी का माल लूट लिया जाए, यदि किसी शिल्पी का श्रम बिना उचित प्रतिफल के छीन लिया जाए—तो केवल यह कहना कि “बाजार स्वतंत्र है” पर्याप्त नहीं होगा।
राजधर्म की दृष्टि से राज्य का दायित्व है कि वह ऐसी स्थितियों में न्याय की व्यवस्था करे।
यही कारण है कि शान्तिपर्व में राजा की भूमिका केवल कर-संग्राहक की नहीं है।
वह व्यवस्था का संरक्षक है।
अकाल और आपत्ति
सामान्य आर्थिक नियम आपत्ति के समय बदल सकते हैं।
अकाल, बाढ़, युद्ध, महामारी या अन्य संकट में उत्पादन अचानक घट सकता है।
ऐसी स्थिति में यदि राजा सामान्य समय की तरह ही कर वसूलता रहे, तो वह प्रजा को संकट से बाहर निकालने के बजाय संकट को और गहरा कर सकता है।
इसलिए आपद्धर्म की अवधारणा राजधर्म के भीतर महत्वपूर्ण हो जाती है।
संकट में राज्य को केवल यह नहीं देखना चाहिए कि उसका राजस्व कितना आया।
उसे यह भी देखना चाहिए कि—
प्रजा जीवित और उत्पादक कैसे बनी रहे?
क्योंकि आज की थोड़ी राजस्व-हानि यदि प्रजा को बचा लेती है, तो भविष्य में वही समाज पुनः उत्पादन कर सकता है।
आर्थिक व्यवस्था में समय का महत्व
राजा को यह समझना आवश्यक है कि अर्थव्यवस्था तत्काल परिणामों से नहीं चलती।
एक किसान आज बीज डालता है, तो अन्न कुछ समय बाद मिलता है।
एक व्यापारी आज मार्ग बनाता है, तो उसका लाभ भविष्य में आता है।
एक शिल्पी वर्षों तक कौशल सीखता है, तब जाकर उसकी कला आर्थिक मूल्य पैदा करती है।
इसलिए राज्य की आर्थिक नीति भी दीर्घकालीन दृष्टि वाली होनी चाहिए।
अत्यधिक कर आज राजकोष बढ़ा सकता है, लेकिन भविष्य का उत्पादन घटा सकता है।
उचित संरक्षण आज राज्य पर व्यय बढ़ा सकता है, लेकिन भविष्य में अधिक उत्पादन पैदा कर सकता है।
इसलिए राजा के लिए तत्काल लाभ और दीर्घकालीन समृद्धि में अन्तर समझना आवश्यक है।
राज्य और बाजार के बीच संतुलन
यहाँ शान्तिपर्व की दृष्टि को एक सूत्र में बाँधा जा सकता है—
राज्य बाजार का शत्रु नहीं है।
राज्य बाजार का मात्र उपभोक्ता भी नहीं है।
राज्य का कार्य ऐसी व्यवस्था बनाए रखना है जिसमें आर्थिक गतिविधि सुरक्षित और न्यायपूर्ण ढंग से चल सके।
जहाँ आवश्यकता हो वहाँ नियंत्रण हो।
जहाँ स्वतंत्रता उपयोगी हो वहाँ अनावश्यक हस्तक्षेप न हो।
जहाँ शोषण हो वहाँ संरक्षण हो।
जहाँ उत्पादन हो वहाँ उसके विस्तार के लिए अनुकूल वातावरण हो।
यह संतुलन किसी एक कठोर नियम से नहीं बनाया जा सकता।
इसके लिए राजा को परिस्थिति को समझना होगा।
धन का वास्तविक स्रोत
इस पूरे विचार का सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष यही है कि राजकोष का वास्तविक स्रोत स्वयं राजमहल नहीं है।
उसका स्रोत समाज की जीवित आर्थिक शक्ति है।
किसान की भूमि।
व्यापारी का व्यापार।
शिल्पी का कौशल।
पशुपालक का पशुधन।
श्रमिक का श्रम।
और इन सबके बीच विश्वास तथा सुरक्षा।
यदि यह आधार मजबूत है तो राजकोष स्वतः मजबूत हो सकता है।
लेकिन यदि आधार कमजोर है, तो राजकोष को कृत्रिम रूप से भरना दीर्घकालीन समाधान नहीं होगा।
यही कारण है कि स्वस्थ राजधर्म में प्रजा की समृद्धि और राज्य की समृद्धि को अलग नहीं किया जा सकता।
महाभारत की आर्थिक दृष्टि में एक गहरी बात
यहाँ शान्तिपर्व हमें केवल प्राचीन अर्थव्यवस्था का वर्णन नहीं देता।
वह एक व्यापक सिद्धान्त की ओर संकेत करता है—
राज्य उस समाज से शक्तिशाली होता है जिसे वह सुरक्षित और सक्षम बनाता है।
यदि राज्य अपनी शक्ति के लिए समाज को कमजोर करता है, तो उसकी शक्ति दिखाई तो बड़ी दे सकती है, लेकिन उसका आधार भीतर से खोखला होने लगता है।
इसके विपरीत यदि राज्य न्याय, सुरक्षा और उत्पादन की परिस्थितियाँ बनाता है, तो प्रजा की आर्थिक शक्ति स्वयं राज्य की शक्ति बन जाती है।
इसलिए राजधर्म का लक्ष्य केवल समृद्ध राजकोष नहीं होना चाहिए।
लक्ष्य होना चाहिए—
समृद्ध समाज, सुरक्षित उत्पादन और उत्तरदायी राज्य।
आधुनिक संदर्भ में सावधानी
यहाँ फिर यह स्पष्ट रखना आवश्यक है कि महाभारत के समय की आर्थिक संरचना को आधुनिक पूँजीवाद, समाजवाद या मिश्रित अर्थव्यवस्था का सीधा पूर्वरूप मानना ऐतिहासिक रूप से उचित नहीं होगा।
महाभारत का समाज अपनी विशिष्ट कृषि, व्यापार, राजसत्ता और सामाजिक संरचना में स्थित था।
लेकिन उसके प्रश्न आज भी समझे जा सकते हैं—
उत्पादन की रक्षा कैसे हो?
संपत्ति और सामाजिक उत्तरदायित्व का सम्बन्ध क्या हो?
राज्य कितना हस्तक्षेप करे?
कराधान की सीमा क्या हो?
संकट में राज्य की आर्थिक भूमिका क्या हो?
और सबसे महत्वपूर्ण—
क्या राज्य की समृद्धि प्रजा की समृद्धि से अलग हो सकती है?
शान्तिपर्व का राजधर्म इन प्रश्नों को किसी आधुनिक आर्थिक सिद्धान्त की भाषा में नहीं रखता, लेकिन उसकी मूल चिंता स्पष्ट है—अर्थव्यवस्था ऐसी हो जो राज्य और समाज दोनों को टिकाऊ बनाए।
यहीं से राजधर्म का अगला चरण और अधिक सामाजिक हो जाता है।
क्योंकि राज्य केवल राजा, मंत्री और कोष से नहीं बनता।
उसके भीतर परिवार हैं, गुरु हैं, विद्वान हैं, श्रमिक हैं, योद्धा हैं, व्यापारी हैं, किसान हैं, स्त्रियाँ हैं, वृद्ध हैं और वे लोग भी हैं जिनकी आवाज सत्ता तक आसानी से नहीं पहुँचती।
अब प्रश्न यह होगा कि राजा इन विभिन्न सामाजिक वर्गों के साथ न्याय कैसे करे और समाज के भीतर कर्तव्य तथा अधिकार का संतुलन कैसे बनाए?
मुकेश श्रीवास्तव
आत्मसन्तुलन आध्यात्मिक ऊर्जा केंद्र
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