महाभारत — शान्तिपर्व — भाग १४ : न्याय — संबंध से ऊपर धर्म
महाभारत — शान्तिपर्व — भाग १४ : न्याय — संबंध से ऊपर धर्म
राजा ने योग्य अधिकारियों की नियुक्ति कर दी, मंत्री चुन लिए, राजकोष व्यवस्थित कर लिया और शासन की व्यवस्था भी बना ली। लेकिन इन सबके बाद भी एक प्रश्न बचा रहता है—जब दो पक्षों के बीच विवाद हो, तब न्याय किस आधार पर किया जाए?
राज्य की वास्तविक परीक्षा यहीं होती है।
क्योंकि शासन करना केवल आदेश देना नहीं है। शासन का सबसे कठिन कार्य तब सामने आता है जब सामने वाला व्यक्ति अपना हो, प्रभावशाली हो, धनवान हो, शक्तिशाली हो—और फिर भी उसके विरुद्ध निर्णय देना पड़े।
शान्तिपर्व के राजधर्म में न्याय इसलिए केवल कानून का विषय नहीं है; वह राजा के चरित्र की परीक्षा भी है।
न्याय का पहला आधार — धर्म
युधिष्ठिर का अपना जीवन इस प्रश्न से जुड़ा हुआ है। युद्ध समाप्त हो चुका है, लेकिन उसके भीतर एक गहरा प्रश्न अभी समाप्त नहीं हुआ—क्या विजय मात्र से धर्म सिद्ध हो जाता है?
भीष्म का उत्तर राजधर्म के व्यापक विवेचन में यह संकेत देता है कि राज्य का उद्देश्य किसी व्यक्ति या वंश की विजय नहीं, बल्कि धर्मपूर्वक प्रजा की रक्षा है।
इसलिए राजा का अपना हित और न्याय का हित अलग नहीं होना चाहिए।
राजा यदि अपने लाभ के लिए न्याय को मोड़ता है, तो उसका दण्ड भय तो उत्पन्न कर सकता है, लेकिन धर्म नहीं।
न्याय का अर्थ है—व्यक्ति को उसके संबंध से नहीं, उसके कर्म और परिस्थिति के आधार पर देखना।
अपना और पराया
राजा के लिए सबसे कठिन स्थिति तब आती है जब अपराधी उसका अपना व्यक्ति हो।
मंत्री, सेनापति, राजपरिवार का सदस्य, मित्र अथवा कोई शक्तिशाली सामन्त—इनमें से किसी के अपराध को केवल इसलिए क्षमा कर देना कि वह राजा के निकट है, राज्य के न्याय को भीतर से खोखला कर देता है।
दूसरी ओर, किसी विरोधी को केवल इसलिए दण्डित करना कि वह राजा का विरोधी है, वह भी न्याय नहीं है।
इस प्रकार न्याय की दो विपरीत विकृतियाँ हैं—मोह और द्वेष।
मोह अपने व्यक्ति के अपराध को छोटा कर देता है।
द्वेष दूसरे व्यक्ति के छोटे अपराध को भी बड़ा बना देता है।
न्याय इन दोनों से ऊपर उठने का प्रयास है।
दण्ड और न्याय में अंतर
पिछले भागों में दण्डनीति की चर्चा हुई थी। यहाँ उसके एक और सूक्ष्म पक्ष को समझना आवश्यक है।
दण्ड देना अपने-आप में न्याय नहीं है।
यदि राजा केवल अपराध देखकर दण्ड दे और अपराध की परिस्थिति, प्रमाण, उद्देश्य तथा परिणाम पर विचार न करे, तो दण्ड प्रतिशोध बन सकता है।
इसीलिए दण्ड का उद्देश्य केवल पीड़ा पहुँचाना नहीं, बल्कि व्यवस्था की रक्षा है।
एक निर्दोष व्यक्ति को दण्ड देना राज्य की शक्ति का प्रदर्शन नहीं, राज्य की न्याय-व्यवस्था की विफलता है।
और अपराधी को केवल इसलिए छोड़ देना कि वह शक्तिशाली है, राज्य की दूसरी प्रकार की विफलता है।
इसलिए दण्ड तभी राजधर्म बनता है जब वह धर्म और विवेक से नियंत्रित हो।
न्यायाधीश का मन
महाभारत का एक गहरा संकेत यहाँ सामने आता है—न्याय करने वाले व्यक्ति का अपना मन भी न्याय की प्रक्रिया का हिस्सा है।
यदि न्यायाधिकारी लोभ से प्रभावित है, तो धन निर्णय को बदल सकता है।
यदि वह भयभीत है, तो शक्तिशाली व्यक्ति के सामने सत्य कमजोर पड़ सकता है।
यदि वह क्रोधित है, तो अपराध से अधिक अपराधी उसे दिखाई देने लगता है।
यदि वह किसी पक्ष से व्यक्तिगत रूप से जुड़ा है, तो निष्पक्षता कठिन हो जाती है।
इसलिए न्याय की शुचिता केवल बाहरी नियमों से नहीं आती। उसके पीछे बैठे व्यक्ति का चरित्र भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
यही कारण है कि शान्तिपर्व में राजा और उसके अधिकारियों के व्यक्तिगत गुणों पर बार-बार बल दिया जाता है।
न्याय में प्रमाण का महत्व
किसी व्यक्ति पर आरोप लग जाना और उसका अपराध सिद्ध हो जाना एक बात नहीं है।
राजधर्म की व्यवस्था में राजा को विवादों की जाँच, पक्षों की बात सुनने और तथ्य समझने की आवश्यकता है। केवल एक व्यक्ति के कथन पर निर्णय कर देना न्याय की प्रक्रिया को कमजोर कर सकता है।
यहाँ हम आधुनिक न्यायालयों की पूरी प्रणाली को प्राचीन राजतंत्र पर आरोपित नहीं कर सकते। दोनों की संस्थागत संरचना अलग है। फिर भी एक मूल सिद्धान्त स्पष्ट दिखाई देता है—
निर्णय से पहले तथ्य को जानना आवश्यक है।
यही कारण है कि न्याय केवल दण्ड देने की कला नहीं है; वह सत्य तक पहुँचने की प्रक्रिया है।
राजा की दृष्टि — केवल अपराध नहीं, कारण भी
मान लीजिए किसी व्यक्ति ने चोरी की।
राजा के सामने केवल यह प्रश्न नहीं होना चाहिए कि चोरी हुई या नहीं।
उसे यह भी देखना होगा कि अपराध की परिस्थिति क्या थी।
क्या वह व्यक्ति आदतन अपराधी था?
क्या उसने लोभ से चोरी की?
क्या वह किसी अत्यन्त कठिन परिस्थिति में था?
क्या किसी दूसरे ने उसे प्रेरित किया?
क्या उसके पीछे कोई संगठित व्यवस्था थी?
इन प्रश्नों का अर्थ अपराध को उचित ठहराना नहीं है। इनका अर्थ है—दण्ड को वास्तविक परिस्थिति के अनुरूप बनाना।
यहीं न्याय और प्रतिशोध अलग होते हैं।
प्रतिशोध कहता है—अपराध हुआ, इसलिए चोट लौटाओ।
न्याय पूछता है—अपराध क्यों हुआ, उससे समाज पर क्या प्रभाव पड़ा और व्यवस्था की रक्षा के लिए क्या उचित है?
न्याय में समानता का प्रश्न
महाभारत का समाज आधुनिक समान नागरिकता की अवधारणा पर आधारित नहीं था। वर्ण, आश्रम और सामाजिक स्थिति के आधार पर दायित्व तथा दण्ड के अनेक भेद प्राचीन व्यवस्था में मिलते हैं। इसलिए शान्तिपर्व के न्याय-विचार को आधुनिक संवैधानिक समानता के साथ सीधे समान नहीं कहा जा सकता।
लेकिन उसके भीतर एक दूसरा महत्वपूर्ण प्रश्न मौजूद है—
क्या राजा व्यक्तिगत पक्षपात से ऊपर रह सकता है?
राजधर्म की दृष्टि से राजा का दायित्व यही है कि उसका निजी प्रेम, भय, क्रोध या स्वार्थ राज्य के निर्णय को नियंत्रित न करे।
यहाँ प्राचीन राजनीतिक दर्शन का एक स्थायी प्रश्न सामने आता है—
सत्ता जिसके पास है, क्या वह स्वयं को भी उसी धर्म के अधीन रख सकता है जिसे वह दूसरों पर लागू करता है?
यदि उत्तर नहीं है, तो न्याय व्यवस्था बाहर से जितनी भी मजबूत दिखाई दे, भीतर से कमजोर है।
न्याय और प्रजा का विश्वास
राज्य की शक्ति केवल सेना और राजकोष से नहीं आती।
प्रजा को यदि यह विश्वास हो कि उसकी बात सुनी जाएगी, विवाद में उसे न्याय मिलेगा और राजा शक्तिशाली व्यक्ति के पक्ष में स्वतः नहीं जाएगा, तो राज्य में एक अदृश्य स्थिरता उत्पन्न होती है।
इसके विपरीत, जब लोगों को लगता है कि न्याय खरीदा जा सकता है, सत्ता के निकट व्यक्ति कानून से ऊपर है या कमजोर व्यक्ति की बात सुनी ही नहीं जाएगी, तब राज्य का बाहरी अनुशासन बचा रह सकता है, लेकिन भीतर से विश्वास टूटने लगता है।
इसलिए न्याय केवल अपराध रोकने का साधन नहीं है।
न्याय राज्य और प्रजा के बीच विश्वास का आधार है।
युधिष्ठिर की समस्या फिर सामने आती है
युधिष्ठिर के लिए यह प्रश्न विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। उन्होंने अपने जीवन में धर्म को लेकर अनेक कठिन परिस्थितियाँ देखी हैं। द्यूतसभा, वनवास, युद्ध, द्रोण और कर्ण से जुड़े प्रसंग, अश्वत्थामा के प्रसंग और युद्ध के बाद का पश्चात्ताप—इन सबने धर्म को उनके लिए सरल नियम नहीं रहने दिया।
इसलिए भीष्म का राजधर्म केवल आदेशों की सूची नहीं बनता।
वह युधिष्ठिर को यह समझाने का प्रयास करता है कि राजा को हर परिस्थिति में तत्काल उत्तर नहीं मिलेगा। उसे परिस्थिति, व्यक्ति, देश, काल और परिणाम को देखकर धर्म का निर्णय करना पड़ेगा।
यहीं राजधर्म धीरे-धीरे सूक्ष्म धर्म की ओर बढ़ता है।
न्याय का अंतिम प्रश्न
राजा के पास दण्ड है। राजा के पास सेना है। राजा के पास राजकोष है। राजा के पास प्रशासन है।
लेकिन इन सबके ऊपर यदि कोई शक्ति है तो वह है—धर्म।
राजा धर्म का निर्माता नहीं, उसका संरक्षक माना गया है।
इसीलिए शान्तिपर्व में राजसत्ता को निरंकुश शक्ति के रूप में नहीं देखा जाता। राजा शक्तिशाली है, लेकिन उसकी शक्ति को धर्म द्वारा मर्यादित किया जाता है।
यही राजधर्म का मूल तनाव है—
राजा को व्यवस्था बनाए रखने के लिए शक्ति चाहिए, लेकिन उसी शक्ति को धर्म की सीमा में रखना भी आवश्यक है।
शक्ति बिना धर्म के अत्याचार बन सकती है।
और धर्म बिना शक्ति के केवल उपदेश बनकर रह सकता है।
राजधर्म इन दोनों के बीच संतुलन खोजता है।
अब प्रश्न और गहरा होता है। यदि राजा को धर्म के अनुसार न्याय करना है, तो स्वयं धर्म की पहचान कैसे होगी? क्या हर परिस्थिति में धर्म एक ही नियम से निर्धारित किया जा सकता है? क्या आपद्काल में सामान्य धर्म बदल जाता है? क्या प्राणरक्षा के लिए नियमों में परिवर्तन उचित है?
शान्तिपर्व अब राजधर्म से आगे आपद्धर्म और सूक्ष्म धर्म की ओर बढ़ने लगता है—जहाँ धर्म का प्रश्न और अधिक जटिल हो जाता है।
मुकेश श्रीवास्तव
आत्मसन्तुलन आध्यात्मिक ऊर्जा केंद्र
(इस ब्लॉग के लेखों के किसी भी अंश या पूरे लेख का उपयोग करने के पहले लेखक की अनुमति अनिवार्य है।)
Comments
Post a Comment