द्वितीय पर्व — सभापर्व संस्कृत नाम है— सभापर्व

 

द्वितीय पर्वसभापर्व

संस्कृत नाम हैसभापर्व

महाभारत के अठारह पर्वों में यह द्वितीय पर्व है।

पर्वसंग्रह में इसका आरम्भ बहुत अर्थपूर्ण ढंग से होता है

द्वितीयं तु सभापर्व बहुवृत्तान्तमुच्यते।
सभाक्रिया पाण्डवानां किङ्कराणां दर्शनम्॥

अर्थात् द्वितीय पर्व सभापर्व है और इसमें अनेक वृत्तान्तों का वर्णन हैपाण्डवों द्वारा सभा का निर्माण तथा उससे जुड़े अद्भुत प्रसंग। इसके बाद नारद द्वारा लोकपालों की सभाओं का वर्णन, राजसूय, जरासंध-वध, बंदी राजाओं की मुक्ति, दिग्विजय, शिशुपाल-वध और अंततः द्यूत तथा वनवास तक की घटनाएँ आती हैं।

"सभापर्व" नाम क्यों? यहाँ एक महत्वपूर्ण बात है।

सभापर्व का नाम केवल इसलिए सभापर्व नहीं है कि इसमें एक सभा का निर्माण हुआ है।

सभा इस पूरे पर्व की केन्द्रीय प्रतीक-व्यवस्था है।

इस पर्व में कम-से-कम तीन प्रकार की "सभा" सामने आती हैं

. मयसभा - पाण्डवों के लिए निर्मित अद्भुत सभा। यह समृद्धि, शक्ति और राजनीतिक उत्कर्ष का प्रतीक है।

. लोकपालों की सभाएँ - नारद युधिष्ठिर को विभिन्न लोकपालों की सभाओं का वर्णन करते हैं। यह सामान्य राजसभा से ऊपर उठकर आदर्श शासन और विश्व-व्यवस्था का प्रश्न उपस्थित करता है।

. हस्तिनापुर की द्यूतसभा - यहीं सभा का दूसरा चेहरा दिखाई देता है। सभा जो धर्म, न्याय और राजकीय निर्णय का स्थान होना चाहिए,  वहीछल, जुआ, सत्ता, स्त्री- अवमानना,मौन,राजधर्म की विफलता का स्थान बन जाती है। इसलिए "सभा" इस पर्व का केवल स्थान नहीं, बल्कि नैतिक प्रतीक है।

 

 सभापर्व की वास्तविक संरचना

परंपरागत पर्वसंग्रह में सभापर्व के भीतर निम्न प्रमुख पर्व/उपपर्वों का उल्लेख मिलता हैसभापर्व / सभाक्रिया/मन्त्रपर्व/जरासन्धवधपर्व/दिग्विजयपर्व/राजसूयिकपर्व/अर्घाभिहरणपर्व/शिशुपालवधपर्व/द्यूतपर्व/अनुद्यूतपर्व

कुछ परंपराओं और आधुनिक वर्गीकरणों में इसे 9 या 10 उपपर्वों में विभाजित किया गया है। उदाहरणतः एक आधुनिक संरचनात्मक सूची सभापर्व, मन्त्र, जरासंधवध, दिग्विजय, राजसूय, अर्घ्याभिहरण, शिशुपालवध, द्यूत और अनुद्यूतइन नौ को अलग-अलग बताती है।

इसलिए हमारे शोध में उपपर्व-संख्या को भी पाठ-परंपरा के अनुसार दर्ज करना चाहिए।

 अध्याय और श्लोकविभिन्न पाठों की तुलना

यह तालिका हमारे शोध के लिए बहुत महत्वपूर्ण है।

पाठ / संस्करण

अध्याय

श्लोक/पद्य

विशेष टिप्पणी

पर्वसंग्रह में उल्लिखित पारंपरिक संख्या

78

2511

महाभारत स्वयं अपने पर्व का यह परिमाण बताता है

BORI Critical Edition

72

लगभग 2390–2395

आलोचनात्मक पांडुलिपि-साक्ष्य पर आधारित गठित पाठ

Bombay Edition

81

लगभग 2709

उत्तर भारतीय मुद्रित परंपरा

Gita Press / प्रचलित उत्तर भारतीय पाठ

81

लगभग 2700+

परंपरागत/वुल्गेट पाठ-परंपरा

Kumbakonam / Southern Recension

103

लगभग 4367

दक्षिणी पाठ में अत्यधिक विस्तृत

P. P. S. Sastri Southern Critical Text

72

4511

दक्षिणी recension का अत्यंत विस्तृत पाठ

इन संख्याओं का अंतर अत्यंत महत्वपूर्ण शोध-सामग्री है। उदाहरणतः P. P. S. Sastri की दक्षिणी पाठ-परंपरा स्वयं बताती है कि दक्षिणी recension में सभापर्व 72 अध्याय और 4511 श्लोकों तक पहुँचता है, जबकि उत्तरी recension 78 अध्याय और 2511 श्लोक की परंपरा रखती है।

BORI के संबंध में उपलब्ध शोध-सामग्री के अनुसार गठित पाठ 72 अध्यायों में है और लगभग 2390 श्लोक हैं; वहीं Bombay और Calcutta पाठों में लगभग 2751 के आसपास श्लोक मिलते हैं।

एक तुलनात्मक सारणी भी BORI के लिए 72 अध्याय/2392 के आसपास, Kumbakonam के लिए 103/4367 और P.P.S. Sastri के लिए 72/4511 देती है।

शोध की दृष्टि से इसका निष्कर्ष

यहाँ हमें एक बहुत महत्वपूर्ण बात मिलती हैमहाभारत का "सभापर्व" स्वयं पाठ-इतिहास का एक उदाहरण है। अर्थात् हमारा प्रश्न केवल यह नहीं होना चाहिए

"सभापर्व में क्या हुआ?"

बल्कि"सभापर्व के विभिन्न पाठों में क्या बचा, क्या बढ़ा, क्या घटा और क्यों?"

यह आगे हमारे महाभारत-पाठ की प्रामाणिकता वाले शोध से सीधे जुड़ जाएगा।

सभापर्व का कथा-विन्यास

अब पूरे पर्व को कथा की दृष्टि से देखें।

 

चरण पाण्डवों का उत्कर्ष

मयसभा का निर्माण होता है। पाण्डव अब केवल वन से लौटे हुए राजकुमार नहीं हैं।

वे एक शक्तिशाली राजनीतिक सत्ता बन चुके हैं।

चरण आदर्श राज्य का प्रश्न

नारद आते हैं। वे केवल सभा देखने नहीं आते। वे युधिष्ठिर से राजधर्म, प्रशासन, मंत्री, सेना, अर्थव्यवस्था, गुप्तचर आदि के विषय में प्रश्न करते हैं।

इस प्रकार महाभारत अचानक राजनीतिक दर्शन में प्रवेश करता है।

चरण साम्राज्य की स्थापना

राजसूय की इच्छा उत्पन्न होती है। लेकिन एक समस्या हैजरासंध। इसलिए पहले जरासंध-वध।

चरण दिग्विजय

चारों पाण्डव दिशाओं में जाते हैं। यह केवल युद्ध-विजय नहीं है। यह प्रश्न हैराजसत्ता को वैधता कहाँ से मिलती है?

चरण राजसूय

अब युधिष्ठिर सम्राट के रूप में स्थापित होते हैं। लेकिन इसी चरम उत्कर्ष में शिशुपाल-वध होता है।

चरण दुर्योधन का मनोवैज्ञानिक परिवर्तन

दुर्योधन मयसभा देखता है। वह पाण्डवों की समृद्धि देखता है। और यहाँ से कथा का अगला निर्णायक कारण पैदा होता हैईर्ष्या।

चरण द्यूत

ईर्ष्या राजनीतिक षड्यंत्र में बदलती है। शकुनि आता है। द्यूत होता है। युधिष्ठिर हारते हैं।

चरण द्रौपदी

अब राजसभा का नैतिक परीक्षण होता है। सभा में उपस्थित हैंधृतराष्ट्र, भीष्म, द्रोण, कृप, विदुर, कर्ण, दुर्योधन, दुःशासन और प्रश्न केवल द्रौपदी का नहीं रह जाता।

प्रश्न हो जाता हैजब धर्मसभा में अधर्म हो रहा हो और धर्मज्ञ लोग मौन हों, तो दोषी कौन है?

चरण अनुद्यूत

पहली बार धृतराष्ट्र संकट टालते हैं। लेकिन दुर्योधन पुनः द्यूत करवाता है।

इस बार परिणामवनवास।

और यहीं सभापर्व समाप्त होकर आरण्यक/वनपर्व की ओर चला जाता है। पर्वसंग्रह भी द्यूत और अनुद्यूत के बाद सीधे आरण्यक पर्व को रखता है।

अब सबसे महत्वपूर्ण प्रश्नसभापर्व में आख्यान और उपाख्यान कौन-कौन से हैं?

 

 

यहाँ हमें बहुत सावधानी रखनी होगी।

आदिपर्व की तरह सभापर्व में बड़ी संख्या में स्वतंत्र उपाख्यान नहीं हैं। विद्वत्-साहित्य में भी सभापर्व के प्रमुख उपाख्यानों के रूप में मुख्यतः जरासंधोपाख्यान और शिशुपालोपाख्यान को चिन्हित किया जाता है।

लेकिन कथा के भीतर कई लघु आख्यानात्मक प्रसंग हैं जिन्हें हमें अलग से पहचानना चाहिए।

मैं इन्हें तीन स्तरों में रखूँगा।

पहला प्रमुख आख्याननारद और लोकपाल-सभाएँ

स्थान - सभापर्व का आरम्भिक भाग।

कथानक - नारद युधिष्ठिर की सभा में आते हैं।

वे विभिन्न लोकपालों की सभाओं का वर्णन करते हैंइन्द्र, यम, वरुण, कुबेर आदि।

लेकिन यह केवल अद्भुत लोक-वर्णन नहीं है। नारद युधिष्ठिर को अप्रत्यक्ष रूप से बताते हैं कि

राजा की सभा कैसी होनी चाहिए। - यहाँ से राजधर्म का एक आदर्श मॉडल बनता है।

शोधात्मक महत्व - इसे हम "लोकपालसभा-आख्यान" कह सकते हैं।

इसका कार्य हैमयसभाआदर्श राजसभावास्तविक राजसभा

इन तीन स्तरों की तुलना तैयार करना। और फिर महाभारत इसी आदर्श को द्यूतसभा में तोड़ देता है।

यह सभापर्व की सबसे बड़ी कलात्मक संरचनाओं में से एक है।

दूसरा प्रमुख आख्यानजरासंधोपाख्यान

यह सभापर्व का अत्यंत महत्वपूर्ण आख्यान है।

मुख्य पात्र -कृष्ण, भीम, अर्जुन, जरासंध, बृहद्रथ

कथा - राजसूय के मार्ग में सबसे बड़ी राजनीतिक बाधाओं में से एक जरासंध है।

कृष्ण बताते हैं कि अनेक राजा उसके अधिकार में हैं और वह उन्हें बंदी बनाकर रखता है।

कृष्ण, अर्जुन और भीम ब्राह्मण-वेष में मगध पहुँचते हैं।

फिर भीम और जरासंध का मल्लयुद्ध होता है।

अंततः भीम जरासंध का वध करता है।

बंदी राजा मुक्त होते हैं।

लेकिन असली शोध प्रश्न

जरासंध-वध को केवल "वीरता की कथा" मानना बहुत छोटा निष्कर्ष होगा।

यहाँ महाभारत एक राजनीतिक सिद्धान्त रखता हुआ दिखाई देता है

जब कोई सत्ता अन्य राजाओं की स्वतंत्रता को नष्ट करके स्वयं सार्वभौम बन बैठती है, तो उसके विरुद्ध हस्तक्षेप कब धर्मसंगत है?

यही कारण है कि यह प्रसंग आगे राजसूय को संभव बनाता है।

तीसरा आख्यानबृहद्रथ और जरासंध का जन्म

जरासंध की कथा के भीतर उसके जन्म का प्रसंग आता है। यह एक अन्तःस्थ आख्यान है।

बृहद्रथ की दो पत्नियाँ और ऋषि द्वारा दिया गया फल

दोनों से जन्मे शरीर के दो अलग-अलग भाग

और जरा नामक स्त्री द्वारा उन्हें जोड़ना

इससे जरासंध का जन्म होता है।

यह कथा केवल जन्म की विचित्रता नहीं है।

उसका नाम ही बनता हैजरा द्वारा संधि किया गया।

और बाद में उसका वध भी उसके शरीर को दो भागों में अलग करके होता है।

यहाँ कथा की रचना अत्यंत सुंदर है

जन्म = संधि
मृत्यु = विखंडन

यह सभापर्व की प्रतीकात्मक कथा-वास्तु में शोध योग्य बिंदु है।

 

चौथा प्रमुख आख्यानदिग्विजय

यह पारंपरिक अर्थ में स्वतंत्र "उपाख्यान" नहीं है।

इसे राजकीय आख्यान कहना अधिक उचित होगा।

चारों पाण्डव विभिन्न दिशाओं में जाते हैं और अनेक राजाओं को पराजित/अधीन करते हैं।

इसमें हमेंराज्य, जनपद, जातीय समूह, भौगोलिक क्षेत्र, राजनीतिक संबंध, कर/भेंट,सैन्य शक्ति का बड़ा विवरण मिलता है।

हमारे इतिहास-बोध के शोध के लिए इसका महत्व

यह आदिपर्व में मिले वंश-इतिहास के बाद महाभारत के राजनीतिक भूगोल का महत्वपूर्ण स्रोत बन जाता है।

इसीलिए हमने जो पहले कार्य तय किया थामहाभारत में वर्णित नगर, राज्य, नदियाँ, पर्वत और वनआज कहाँ हैं?

उसका अगला महत्वपूर्ण स्रोत यही दिग्विजय प्रसंग होगा।

 

पाँचवाँ प्रमुख आख्यानशिशुपालोपाख्यान

यह सभापर्व का दूसरा स्पष्ट रूप से प्रसिद्ध उपाख्यान है।

कथा का आधार राजसूय यज्ञ में अग्रपूजा का प्रश्न आता है। कृष्ण को अर्घ्य दिया जाता है।

शिशुपाल इसका विरोध करता है। वह कृष्ण की निन्दा करता जाता है। अंततः कृष्ण उसका वध करते हैं।

लेकिन यहाँ एक और कथा जुड़ी है

शिशुपाल के जन्म की कथा।

उसके असामान्य रूप का वर्णन और यह भविष्यवाणी कि उसकी मृत्यु कृष्ण के हाथों होगी।

यहाँ कृष्ण द्वारा उसकी अनेक अपराधों को सहन करने की कथा भी आती है।

इससे शिशुपाल-वध केवल व्यक्तिगत शत्रुता नहीं रहता।

यहमर्यादाअपराधसहनशीलतासीमादण्ड की संरचना बन जाता है।

 

छठा आख्यानद्यूतसभा

इसे भी केवल घटना नहीं समझना चाहिए। यह सभापर्व का महान नैतिक आख्यान है।

यहाँ कोई ऋषि पुरानी कथा नहीं सुना रहा। बल्कि वर्तमान घटना स्वयं आख्यानात्मक रूप ले लेती है।

मुख्य क्रम

दुर्योधन की ईर्ष्याशकुनि की योजनायुधिष्ठिर का द्यूतपराजयद्रौपदीसभाधर्म का संकटधृतराष्ट्र का हस्तक्षेपपुनः द्यूतवनवास

यह पूरा क्रम वास्तव में सभापर्व का नैतिक केन्द्र है।

 

द्रौपदी का प्रसंगआख्यान नहीं, सभापर्व का नैतिक शिखर

यहाँ मैं एक शोधात्मक सावधानी रखना चाहूँगा। इसे सीधे "उपाख्यान" कहना उचित नहीं होगा।

यह मुख्य आख्यान का चरम प्रसंग है।

और पाठ-आलोचना की दृष्टि से यह और भी महत्वपूर्ण हो जाता है।

BORI Critical Edition में द्रौपदी की कृष्ण-प्रार्थना के प्रसिद्ध अंश को पाठ-साक्ष्य के आधार पर बाहर रखा गया है। इसी प्रकार कुन्ती द्वारा वन जाते पाण्डवों को विदा करने वाला एक अंश भी Critical Edition के गठित पाठ से बाहर है।

इसलिए हमारे शोध में दो प्रश्न अलग होंगे

A. कथा-विश्लेषण: द्रौपदी-अपमान का महाभारत की नैतिक संरचना में क्या स्थान है?

B. पाठ-आलोचना: द्रौपदी-प्रार्थना के कौन-कौन से पाठ किन संस्करणों में मिलते हैं?

यह विभाजन बहुत जरूरी है।

 

१४. सभापर्व के आख्यानों की हमारी शोध-तालिका

क्रम

आख्यान/प्रसंग

स्वरूप

मुख्य प्रश्न

1

मयसभा

मुख्य कथा

समृद्धि और सत्ता

2

नारदलोकपालसभा

आख्यानात्मक प्रसंग

आदर्श राजधर्म क्या है?

3

बृहद्रथजरासंध जन्म

अन्तःस्थ आख्यान

जन्म और नियति

4

जरासंधोपाख्यान

प्रमुख उपाख्यान

अत्याचारी सार्वभौम सत्ता के विरुद्ध धर्म

5

बंदी राजाओं की मुक्ति

राजनीतिक आख्यान

शक्ति और मुक्ति

6

पाण्डव दिग्विजय

राजकीय आख्यान

साम्राज्य और राजनीतिक वैधता

7

राजसूय

मुख्य आख्यान

सार्वभौम सत्ता की स्थापना

8

शिशुपाल जन्म/जीवन

अन्तःस्थ आख्यान

अपराध और सीमा

9

शिशुपालोपाख्यान

प्रमुख उपाख्यान

धर्मदण्ड और कृष्ण

10

दुर्योधनमयसभा प्रसंग

मनोवैज्ञानिक आख्यान

ईर्ष्या की उत्पत्ति

11

द्यूत

मुख्य आख्यान

धर्म बनाम आसक्ति

12

द्रौपदीसभा प्रसंग

नैतिक चरमबिन्दु

राजधर्म की परीक्षा

13

अनुद्यूत

मुख्य आख्यान

राजनीतिक विफलता और वनवास

 

सभापर्व की सबसे बड़ी दार्शनिक संरचना

मेरे विचार से हमारे भगवद्गीता/महाभारत शोध में सभापर्व को इस सूत्र में देखना अत्यंत उपयोगी होगा

आदिपर्व

"मनुष्य और वंश की उत्पत्ति"

सभापर्व

"सत्ता और धर्म की परीक्षा"

वनपर्व

"सत्ता से वंचित मनुष्य का आत्म-संघर्ष"

और यही क्रम आगे चलकर

उद्योगयुद्धगीताशान्तिमोक्ष

की ओर जाता है।

इसलिए सभापर्व केवल आदिपर्व के बाद आने वाला दूसरा खंड नहीं है।

यह वह स्थान है जहाँ महाभारत की कथा पहली बार बहुत स्पष्ट रूप से पूछती है

मनुष्य के पास सत्ता जाने के बाद वह उसके साथ क्या करता है?

और उससे भी बड़ा प्रश्न

जब सत्ता धर्म से अलग हो जाए, तब सभा क्या बचती हैन्याय की संस्था या अधर्म का मंच?

 

हमारे अगले शोध-चरण की सही पद्धति

आदिपर्व की तरह सभापर्व पर भी हमें सीधे कथा लिखने के बजाय चार चरणों में काम करना चाहिए।

चरण 1 — पाठ-समीक्षा

BORI + Gita Press + Bombay/Calcutta + Southern/Kumbakonam से अध्याय और श्लोक-संख्या की तुलना।

चरण 2 — आख्यान-सूची - हर कथा को तीन श्रेणियों में रखनामुख्य आख्यान / उपाख्यान / अन्तःस्थ कथा।

चरण 3 — प्रत्येक आख्यान की कठोर परीक्षा

हर आख्यान के लिए:

  1. कथा क्या है?
  2. कथा कौन सुनाता है?
  3. किसे सुनाता है?
  4. मुख्य कथा में इसकी आवश्यकता क्यों है?
  5. इसका धर्मार्थ क्या है?
  6. क्या इसका कोई पूर्ववैदिक/पुराणिक आधार है?
  7. अन्य ग्रंथों में इसका रूप क्या है?
  8. विभिन्न महाभारत-पाठों में क्या अंतर है?
  9. BORI ने क्या रखा/हटाया?
  10. आधुनिक महाभारत-बोध में इसका क्या अर्थ है?

चरण 4 — सबसे अंत में

सभापर्व का समग्र निष्कर्ष:

"सभा से द्यूतसभा तक : सत्ता, धर्म और मनुष्य के पतन की कथा"

यही हमारे सभापर्व-अध्ययन का केंद्रीय शोध-विषय बन सकता है।

और एक महत्वपूर्ण बात: सभापर्व में "जरासंधोपाख्यान" और "शिशुपालोपाख्यान" को ही केवल दो कथाएँ मानकर रुकना नहीं चाहिए। पाठ-संरचना में इनके भीतर जन्म-कथाएँ, राजनीतिक आख्यान, लोकपाल-सभा आख्यान और द्यूतसभा का नैतिक आख्यान भी हैं। यही सूक्ष्म स्तर हमारे पिछले आदिपर्व के आख्यानउपाख्यान विश्लेषण को आगे बढ़ाएगा।

 

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