महाभारत — स्त्रीपर्व भाग–१३ : धृतराष्ट्र का मौन — राजमहल के भीतर बचा हुआ कुरुवंश

महाभारत — स्त्रीपर्व भाग–१३ : धृतराष्ट्र का मौन — राजमहल के भीतर बचा हुआ कुरुवंश

हस्तिनापुर में जीवन धीरे-धीरे अपनी गति पकड़ने लगा था, लेकिन राजमहल के भीतर युद्ध अभी समाप्त नहीं हुआ था।

बाहर शान्ति थी, भीतर स्मृतियाँ।

धृतराष्ट्र के सामने अब कोई विशाल सेना नहीं थी, कोई राजसभा नहीं थी, कोई पुत्र अपनी विजय का समाचार सुनाने नहीं आता था। जिन सौ पुत्रों के सहारे उनका वृद्ध जीवन खड़ा था, वे सभी कुरुक्षेत्र में समाप्त हो चुके थे।

उनका दुःख अब क्रोध से आगे निकल चुका था।

गान्धारी भी उसी शोक में थीं। परन्तु दोनों के सामने एक नई वास्तविकता थी—उन्हें उन्हीं पाण्डवों के साथ रहना था जिनके साथ युद्ध में उनके पुत्र मारे गए थे।

युधिष्ठिर ने इस स्थिति को समझा।

उन्होंने धृतराष्ट्र के प्रति पुत्रवत् व्यवहार किया। उनके रहने, सम्मान और आवश्यकताओं की व्यवस्था की गई। कुन्ती भी उनके साथ थी।

यहाँ महाभारत एक असाधारण मानवीय स्थिति प्रस्तुत करता है।

जिस परिवार के कारण युद्ध हुआ, उसी परिवार के वृद्धों की सेवा अब उसी पक्ष को करनी थी जिसने युद्ध जीता था।

यह प्रतिशोध से आगे बढ़ने की परीक्षा थी।

परन्तु धृतराष्ट्र के भीतर अतीत पूरी तरह शांत नहीं हुआ था।

उनके लिए पाण्डव केवल राज्य के नए शासक नहीं थे। वे उनके मृत पुत्रों के मृत्यु-कारण से जुड़े हुए लोग भी थे। विशेषतः भीम—जिसने दुर्योधन को गदा-युद्ध में पराजित किया था और दुःशासन का वध किया था—धृतराष्ट्र के शोक का एक जीवित स्मारक था।

फिर भी समय के साथ उनके भीतर एक परिवर्तन आने लगा।

युद्ध ने उन्हें वह सब दिखा दिया था जिसे सत्ता के दिनों में वे देख नहीं पाए थे।

पुत्र-मोह ने जिस निर्णय को जन्म दिया था, उसका परिणाम अब उनके सामने था।

महाभारत धृतराष्ट्र को केवल दोषी व्यक्ति बनाकर समाप्त नहीं करता। उसके भीतर वह मनुष्य भी दिखाई देता है जो अपने ही निर्णयों के परिणाम के सामने खड़ा है।

यही कारण है कि उनका शोक केवल निजी शोक नहीं रह जाता।

वह मोह और विवेक के संघर्ष का प्रतीक बन जाता है।

राज्य अब युधिष्ठिर के हाथ में था, लेकिन धृतराष्ट्र के जीवन का अंतिम चरण उन्हें भीतर की ओर ले जा रहा था।

कुछ समय बाद उनका मन राजमहल से हटने लगा।

उन्हें अनुभव हुआ कि जिस महल में वे कभी राजा थे, वहाँ अब उनका रहना केवल अतीत को पकड़े रहना है।

गान्धारी भी इसी भावना में थीं।

कुन्ती ने भी अपने जीवन के सबसे बड़े रहस्य—कर्ण के जन्म—का भार अब अपने भीतर दबाकर रखने के बजाय स्वीकार कर लिया था। युद्ध ने उसके मातृत्व की वह पीड़ा सामने ला दी थी जिसे उसने वर्षों छिपाए रखा था।

तीनों वृद्ध जीवन के अंतिम चरण में एक ही प्रश्न के सामने खड़े थे—

क्या मनुष्य अतीत को लेकर जीवित रह सकता है, या किसी बिन्दु पर उसे उसे छोड़ना पड़ता है?

यहीं से महाभारत का भाव संसार धीरे-धीरे राजमहल से वन की ओर बढ़ता है।

धृतराष्ट्र के लिए वन केवल स्थान परिवर्तन नहीं था।

वह सत्ता से विरक्ति की दिशा थी।

गान्धारी के लिए वह शोक से तप की दिशा थी।

और कुन्ती के लिए वह उस जीवन का अंतिम अध्याय था जिसमें उसने पुत्रों को जन्म दिया, उन्हें संघर्ष करते देखा और अन्ततः युद्ध की विभीषिका को सहा।

परन्तु अभी उनका प्रस्थान नहीं हुआ था।

राज्य को स्थिर होना था। युधिष्ठिर को अपने कर्तव्य को स्वीकार करना था। और कुरुवंश के भविष्य को सुरक्षित करना था।

इसी बीच एक और प्रश्न महाभारत के सामने खड़ा था—

क्या युद्ध में प्राप्त विजय को धर्मपूर्ण शासन में बदला जा सकेगा?

इस प्रश्न का उत्तर अब किसी योद्धा के पास नहीं था।

उत्तर उस शरशय्या पर था, जहाँ भीष्म अभी मृत्यु की प्रतीक्षा कर रहे थे।

युधिष्ठिर का अगला कदम इसलिए हस्तिनापुर के राजसिंहासन से उठकर फिर कुरुक्षेत्र की ओर होने वाला था।

वहाँ युद्ध की स्मृति नहीं, धर्म का विस्तृत विवेचन उनकी प्रतीक्षा कर रहा था।

मुकेश श्रीवास्तव
आत्मसन्तुलन आध्यात्मिक ऊर्जा केंद्र
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