“यह उस मनुष्य का रोज़नामचा है जो समय की दौड़ से थोड़ा बाहर खड़ा है और साधारण दिनों में असाधारण अर्थ खोजता है।”
Friday, 4 May 2012
Wednesday, 2 May 2012
Tuesday, 1 May 2012
मुहब्बत का तुम्हारी बस इतना मज़ा है
बैठे ठाले की तरंग -------------------------
मुहब्बत का तुम्हारी बस इतना मज़ा है
इक एहसास गुनगुना गुनगुना सा रहता है
तन्हाईयों में भी दिल उदास नहीं होता
दिल में हर वक़्त सितार सा बजा रहता है
दरीचे हमारे घर के बंद है,सभी फिर भी
जाने क्यूँ खुशबुओं से घर महकारहता है
मुहब्बत का तुम्हारी बस इतना मज़ा है
इक एहसास गुनगुना गुनगुना सा रहता है
तन्हाईयों में भी दिल उदास नहीं होता
दिल में हर वक़्त सितार सा बजा रहता है
दरीचे हमारे घर के बंद है,सभी फिर भी
जाने क्यूँ खुशबुओं से घर महकारहता है
मुकेश इलाहाबादी --------------------------
कुछ तो हुनर रहा होगा,
बैठे ठाले की तरंग ---------------
कुछ तो हुनर रहा होगा,
ज़माना ऐसे कंहा माना होगा
रात दिन के सफ़र ने,
अंदर तक थका डाला होगा
फूल ही फूल बिछाए थे,
फिर भी कोई कांटा चुभ गया होगा
तुम्हारी बातों में हुलस है,
सफ़र में कोइ हंसी साथी मिल गया होगा
मुसाफिर देर तक सोया है,
कई कई रातों का जागा होगा
मुकेश इलाहाबादी ---------------------
Monday, 30 April 2012
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