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Tuesday, 17 February 2026

मैंने प्रेम को उत्तर से मुक्त कर दिया

 मैंने प्रेम को उत्तर से मुक्त कर दिया

(सिर्फ़ तुम्हारे लिए नहीं,
सारे रिश्तों के लिए)
मैंने प्रेम को
उत्तर से मुक्त कर दिया—
अब वह
किसी के सामने
खड़ा नहीं होता।
न माँ से,
न मित्र से,
न प्रेमिका से,
न ईश्वर से।
अब
मैं अच्छा हूँ
बिना सराहे जाने के।
मैं साथ हूँ
बिना थामे जाने के।
मैं देता हूँ,
पर लौटकर देखने नहीं जाता।
मैं रुकता हूँ,
पर बुलाए जाने की प्रतीक्षा नहीं करता।
मैंने
रिश्तों से
लेन-देन हटा दिया।
अब वे
साँस की तरह हैं—
ज़रूरी,
पर गिने नहीं जाते।
कोई आता है—
मैं खुला रहता हूँ।
कोई जाता है—
मैं टूटा नहीं रहता।
अब मैं
अपेक्षा को
प्रेम का प्रमाण नहीं मानता।
और दूरी को
अस्वीकृति नहीं।
मैंने
चाह को
हल्का कर दिया है,
ताकि वह
किसी पर
वज़न न बने।
अब प्रेम
किसी का उत्तर नहीं माँगता—
वह
मेरी अवस्था है।
मैं जहाँ हूँ,
वहाँ
प्रेम है।
और जहाँ प्रेम है,
वहाँ
कोई बंधन नहीं।
मुकेश्,,

तुम, मैं और देह में ठहरती ऋतु

तुम आईं
और मौसम ने
कैलेंडर देखना छोड़ दिया।
कोई तारीख़ नहीं बदली,
पर देह के भीतर
कुछ खुलने लगा
जैसे बंद कमरे में
खिड़की अपने-आप
थोड़ी-सी खिसक जाए।
तुम्हारे बैठने से
कुर्सी नहीं,
मेरी साँसें सम्हलीं।
तुम्हारे हाथ
हवा में थे,
पर असर
सीधे त्वचा पर पड़ा।
मैंने देखा
तुम्हारी आँखों में
वसंत था,
वह वसंत
जो फूल नहीं माँगता,
सिर्फ़ जगह चाहता है
ठहरने के लिए।
मेरे भीतर
अब भी
कुछ पिछली ऋतुएँ थीं
थोड़ी ठंड,
थोड़ी थकान,
कुछ अधूरे दिन।
तुम्हारी उपस्थिति ने
उन्हें हटाया नहीं,
बस
उनके बीच
एक संतुलन रख दिया।
हम बोले नहीं,
पर देह
संवाद में थी
कंधों की दूरी,
घुटनों का कोण,
साँसों की गति,
सब कुछ
एक मौन भाषा में।
मैं समझ गया—
ऋतु बाहर नहीं बदलती,
वह भीतर
किसी के आने से
ठहरती है।
तुम्हारी हँसी
धूप जैसी नहीं थी,
वह
बादलों के बीच से
झाँकती रोशनी थी
न पूरी,
न कम,
बस पर्याप्त।
मैंने सोचा था
वर्षा आएगी
तो सब बह जाएगा,
पर यहाँ
नमी थी
जो जड़ों तक जाती है,
और वहीं रह जाती है।
हम दोनों
एक ही समय में
अलग-अलग मौसम थे
और यही
हमारी संगति थी।
जब तुम उठीं,
तो मौसम
तुरंत नहीं गया।
देह को
याद रहने में
समय लगता है।
अब भी कभी-कभी
अकारण
हवा बदलती है,
त्वचा चुप हो जाती है
और मैं जान जाता हूँ,
कहीं
तुम, मैं
और वह ठहरी हुई ऋतु
फिर से
मिल रहे हैं।
मुकेश्,,,

कल जब तुमसे मिलूँगा,

 तो शायद

सबसे पहले
ख़ामोशी मिलेगी
वह ख़ामोशी
जो दो लोगों के बीच
इतनी देर से
पली-बढ़ी है
कि अब
अपना नाम चाहती है।
मैं हाथ बढ़ाऊँगा
या नहीं,
यह तय नहीं है।
हो सकता है
मैं सिर्फ़
तुम्हारी आँखों में
ठहर जाऊँ
जैसे कोई
पुराना शहर
नक़्शे के बिना
याद आ जाए।
कल जब तुमसे मिलूँगा,
तो मैं
तुमसे पहले
अपने आप से मिलूँगा
उस व्यक्ति से
जो तुम्हारे होने से
थोड़ा कम डरता है,
और तुम्हारे चले जाने से
थोड़ा ज़्यादा।
तुम
शायद वही कपड़े पहनोगी,
या शायद नहीं—
पर तुम्हारी चाल में
वही विराम होगा
जहाँ मैं
हर बार
कुछ कहने से
चूक जाता हूँ।
मैं देखूँगा
तुम्हारे कंधों पर
दिन की थकान,
और सोचूँगा
काश
मैं इसे
कहीं रख पाता।
कल
समय भी
हमारे साथ
धीरे चलेगा।
घड़ी की सुइयाँ
हमें नहीं,
हम
उन्हें देख रहे होंगे।
अगर बारिश हुई
तो बात आसान होगी
कुछ शब्द
अपने-आप
भीग जाएँगे।
अगर धूप हुई
तो हम
छाया की तलाश में
और पास आ जाएँगे।
मैं तुम्हें बताऊँगा नहीं
कि कितनी बार
तुम
मेरे निर्णयों में
दख़ल देती रही हो
तुम्हारे बिना जाने।
तुम शायद
हँस दोगी,
और वह हँसी
मुझे
एक पल के लिए
निर्दोष बना देगी।
कल जब तुमसे मिलूँगा,
तो मैं
प्रेम को
घटना नहीं बनाऊँगा
उसे
स्थिति रहने दूँगा।
अगर मिलना
कम पड़ गया,
तो भी
ठीक रहेगा।
कुछ मुलाक़ातें
पूरी इसलिए नहीं होतीं
ताकि वे
अंदर तक
चलती रहें।
और जब
हम अलग होंगे,
तो मैं
पीछे मुड़कर
नहीं देखूँगा
क्योंकि
कुछ चेहरे
सीधे देखे जाएँ
तो ही
याद रह पाते हैं।
कल जब तुमसे मिलूँगा,
तो शायद
कुछ नहीं बदलेगा
और यही
सबसे बड़ा
बदलाव होगा।
मुकेश्,,,

(तू) — कोष्ठक में रखा हुआ प्रेम

 मैंने तुझे

वाक्य के बीच नहीं रखा,
मैंने तुझे
कोष्ठक में रखा—
(तू)
ताकि
तू अर्थ भी रहे
और बाध्यता भी न बने।
तू
मेरे जीवन का
मुख्य वाक्य नहीं था,
पर
तेरे बिना
हर वाक्य
अधूरा लगता था।
कोष्ठक
कमज़ोरी नहीं होते,
वे बताते हैं
कि कुछ बातें
कहे बिना भी
मौजूद रहती हैं।
मैंने तुझे
सबके सामने
उच्चारित नहीं किया,
मैंने
तुझे
अपने भीतर
धीमे से
लिखा—
जैसे
कोई डर
प्रार्थना बन जाए।
(तू)
मतलब
वह प्रेम
जिसे
स्पष्ट नहीं किया जा सकता,
क्योंकि
स्पष्टता
कभी-कभी
इश्क़ को
घायल कर देती है।
लोग पूछते थे
“वह कौन है?”
मैं मुस्कराता—
कोष्ठक
सबको नहीं
दिखाए जाते।
तू
मेरे फैसलों में
शामिल नहीं था,
पर
मेरे ठहराव में
हमेशा मौजूद था।
मैं चलता रहा,
रिश्ते बदले,
नाम बदले,
शहर बदले
पर
(तू)
जैसा था
वैसा ही
मेरे भीतर
बना रहा।
कोष्ठक में रखा प्रेम
शोर नहीं करता,
वह
दावा नहीं करता,
वह
सिर्फ़
संभालकर
रखा जाता है।
कभी-कभी
मैंने चाहा
कि कोष्ठक हटा दूँ,
तुझे
सीधे लिख दूँ
पर डर गया,
कहीं
तू
पूर्णविराम न बन जाए।
इसलिए
मैंने
तुझे
अधूरा ही रहने दिया
क्योंकि
अधूरापन
ही
तेरी सुरक्षा थी।
अब
जब मैं
अपने जीवन को
पढ़ता हूँ,
तो
हर पन्ने पर
कुछ शब्द हैं
जो
छूटे हुए लगते हैं
मैं जानता हूँ,
वही
(तू) है।
कोष्ठक में रखा हुआ,
पर
मेरे पूरे होने का
सबसे सच्चा
सबूत।
और शायद
इसीलिए
मैंने प्रेम को
बाहर नहीं,
भीतर
लिखना चुना
ताकि
वह
मेरा हो,
पर
किसी का
क़ैद न बने।
मुकेश्,,,

रात के दरवेश और भटकी रूह

रात के दरवेश

काले चोग़े में नहीं,

सितारों की चादर ओढ़े आते हैं

धीमे,

बिना पाँवों की आहट के।


वे शहर की बुझी हुई गलियों में

ज़िक्र करते हैं ख़ामोशी का,

और चाँद को

एक जलता हुआ तस्बीह बना लेते हैं।


उसी वक़्त

एक भटकी रूह

अपने ही सवालों की धुंध में

रास्ता टटोलती है।

न घर पहचान में आता है,

न मंज़िल।


रूह पूछती है,

“क्या कोई नक़्शा है

जिस पर मेरा नाम लिखा हो?”


दरवेश मुस्कुराते हैं,

उनकी मुस्कान में

पुरानी इबादतों की रोशनी है।

वे कहते नहीं,

बस हाथ उठाकर

आसमान की तरफ़ इशारा करते हैं,

जहाँ हर तारा

एक अधूरी दुआ की तरह चमक रहा है।


रात के दरवेश

सिखाते हैं—

भटकन भी एक सफ़र है,

और सफ़र भी एक सजदा।

रूह को रास्ता नहीं,

यक़ीन चाहिए।


धीरे-धीरे

भटकी रूह

अपने ही सीने की धड़कन सुनती है,

वहीं एक किब्ला छुपा था,

वहीं एक रौशनी।


सुबह होने तक

दरवेश ओझल हो जाते हैं,

पर रूह

अब भटकी नहीं रहती

क्योंकि उसने जान लिया,

कि रात अँधेरा नहीं,

एक दरवेश है

जो हर खोई हुई रूह को

उसके भीतर की सुबह तक ले जाता है।


मुकेश ,,,,,,,,,,

ख़ामोशी के कंधे पर सिर रखे सपने

ख़ामोशी के कंधे पर

सिर रखे सपने

धीरे-धीरे साँस लेते हैं

जैसे रात की नब्ज़

चाँदनी में धड़क रही हो।


कोई शोर नहीं,

कोई दावा नहीं,

बस पलकों के भीतर

हल्की-सी रौशनी का कंपन।


ये सपने बोलते नहीं,

पर सुनते बहुत हैं—

दिल की दरारों में छुपी

अनकही बातों को,

थके हुए यक़ीन को,

और उम्मीद की अंतिम लौ को।


ख़ामोशी उन्हें सहलाती है,

जैसे माँ

बच्चे के माथे पर हाथ रखे—

बिना प्रश्न,

बिना शर्त।


कभी-कभी

इन सपनों की पलकों से

एक आह टपक जाती है,

और रात उसे

ओस बनाकर

सुबह की घास पर सजा देती है।


ख़ामोशी के कंधे पर

सिर रखे सपने

हकीकत से भागते नहीं,

बस थोड़ा ठहरते हैं

ताकि टूटने से पहले

खुद को समेट सकें।


और जब सुबह आती है,

वे उठते हैं

थोड़े नम,

थोड़े मजबूत,

और थोड़ा-सा यक़ीन लेकर

कि हर शोर के पार

एक ऐसी जगह है

जहाँ उन्हें

आराम मिल सकता है।


मुकेश ,,,,,,,,,

शून्य की गोद में स्वर

 

जब तुम नहीं होते,
कमरे में सब कुछ होता है —
दीवारें, रोशनी, हवा…
पर फिर भी
एक अजीब-सा खालीपन
चारों ओर फैल जाता है।
उसी खालीपन में
धीरे-धीरे जन्म लेता है
तुम्हारा नाम।
शून्य की गोद में
तुम्हारी आवाज़
बिना शब्दों के उतरती है,
जैसे बंद आँखों पर
कोई नरम उजाला रख दिया गया हो।
मैं कुछ कहता नहीं,
पर दिल के भीतर
एक महीन-सी तान बजती है —
तुम्हारी।
तुम दूर हो,
पर दूरी यहाँ तक नहीं आती।
वह रास्तों में भटक जाती है,
और तुम्हारा अहसास
सीधे मेरी धड़कनों में घर कर लेता है।
यह प्रेम
मिलन का मोहताज नहीं,
यह तो उस मौन का साथी है
जहाँ हम दोनों
कुछ भी बोले बिना
सब कुछ कह लेते हैं।
जब दुनिया की आवाज़ें
धीमी पड़ जाती हैं,
और रात
अपनी चुप्पी बिछा देती है,
तब शून्य की गोद में
हमारा प्रेम
सबसे साफ़ सुनाई देता है।
कोई वादा नहीं,
कोई शर्त नहीं —
बस एक कोमल-सा विश्वास,
कि जहाँ कुछ भी नहीं दिखता,
वहीं तुम सबसे अधिक उपस्थित हो।
शून्य की गोद में स्वर
दरअसल
हमारी मोहब्बत है —
जो शब्दों से परे,
पर हर साँस में शामिल है।
मुकेश्,,

शब्दों की चिंगारियाँ

 शब्दों की चिंगारियाँ

1. प्रारम्भ : आग से पहले का मौन
शुरू में
कोई शब्द नहीं था,
सिर्फ़ एक कंपन था—
जैसे ब्रह्मांड कुछ कहने से पहले
गला साफ़ कर रहा हो।
उस मौन में
पहली चिंगारी गिरी,
न आग बनी,
न रोशनी
सिर्फ़ एहसास।
मैं समझ गया,
शब्द पैदा नहीं होते,
वे गिरते हैं
कहीं बहुत ऊपर से।

2. चिंगारियाँ और देह
शब्दों की चिंगारियाँ
जब देह पर गिरती हैं
तो जलन नहीं होती,
स्मृति जागती है।
एक शब्द
कंधे पर गिरता है—
और अचानक
किसी पुराने जन्म का बोझ
महसूस होने लगता है।
दूसरा शब्द
होंठों को छूता है—
और चुप्पी बोलने लगती है।
तीसरा शब्द
दिल पर गिरता है—
और दिल
अपनी भाषा भूल जाता है।

3. प्रेम : आग का सबसे नाज़ुक रूप
प्रेम
सबसे ख़तरनाक चिंगारी है,
क्योंकि वह
जलाकर भी ठंडा रखती है।
तुमने जब कहा—
कुछ नहीं,
तो उस कुछ नहीं में
हज़ार शब्द जल उठे।
मैंने जवाब नहीं दिया,
क्योंकि जवाब देना
आग को नाम देना होता है।
मैंने प्रेम को
क्रिया नहीं रहने दिया,
उसे
चिंगारी की तरह
अनिश्चित छोड़ दिया।

4. भाषा का विघटन
शब्द धीरे-धीरे
अपनी शक्ल खोने लगे।
व्याकरण पिघल गया,
अर्थ टपकने लगे,
और वाक्य
अपनी रीढ़ खो बैठे।
अब
“मैं” और “तुम”
अलग-अलग नहीं थे—
वे बस
अलग-अलग तापमान थे
एक ही आग के।

5. राजनीति, इतिहास और राख
कुछ शब्द
इतिहास से आए थे—
उनमें बारूद मिला था।
कुछ शब्द
धर्म से आए—
उनमें डर था।
कुछ शब्द
राजनीति से आए—
वे पहले ही जले हुए थे।
मैंने उन्हें
अपनी नज़्म में आने दिया,
लेकिन उन्हें
राज नहीं करने दिया।
क्योंकि
कविता में
राख भी
समान अधिकार रखती है।

6. मौन : आग के बाद
जब सब कुछ जल गया,
तो मौन बचा।
मौन कोई खाली जगह नहीं,
वह सबसे गहरी आवाज़ है।
वहाँ
शब्द नहीं होते,
लेकिन
शब्दों की स्मृति
जिंदा रहती है।
यह वही जगह है
जहाँ सूफ़ी
ख़ुदा से नहीं,
अपने आप से मिलते हैं।

7. पुनर्जन्म : नई चिंगारी
राख ठंडी हुई,
और अचानक
एक नई चिंगारी।
पहले से धीमी,
पहले से सजग।
अब शब्द
चिल्लाते नहीं,
फुसफुसाते हैं।
अब कविता
कुछ साबित नहीं करती,
सिर्फ़
साथ चलती है।
8. समापन : कविता का स्वीकार
शब्दों की चिंगारियाँ
अब मुझे नहीं जलातीं,
वे मुझे
जगाती हैं।
मैं जान गया हूँ
हर शब्द को
आग नहीं बनना चाहिए,
कुछ को
चिंगारी ही रहना चाहिए।
क्योंकि
पूरी दुनिया जलाने से
कोई सूफ़ी पैदा नहीं होता,
लेकिन
एक चिंगारी
पूरा ब्रह्मांड
महसूस करा सकती है।
मुकेश्,,,

संगम के पार तुम्हारा चेहरा

 संगम के पार तुम्हारा चेहरा

संगम के पार
तुम्हारा चेहरा
पानी में नहीं,
दूरी में बनता है।
गंगा कुछ कहती है,
यमुना चुप रहती है
और उनके बीच
तुम्हारी आँखों का रंग
ठहर जाता है।
मैं यहाँ खड़ा हूँ,
हाथ खाली,
नज़र भरी हुई—
जैसे प्रार्थना
बिना शब्दों के।
न नाव बुलाती है,
न किनारा
बस
एक चेहरा है
जो पास नहीं आता,
पर
डूबने भी नहीं देता।
संगम के पार
तुम्हारा चेहरा
मेरे भीतर
दो नदियों की तरह
बहता रहता है।

मुकेश्,,,