तेरे ज़ख्मो के निशाँ इतने गहरे हैं
हमे वर्षो लग जाएंगे इन्हे धोने मे
मुकेश इलाहाबादी -----------------
हमे वर्षो लग जाएंगे इन्हे धोने मे
मुकेश इलाहाबादी -----------------
“यह उस मनुष्य का रोज़नामचा है जो समय की दौड़ से थोड़ा बाहर खड़ा है और साधारण दिनों में असाधारण अर्थ खोजता है।”