सीने में तीर सा चुभाती रही
हवा रातभर सनसनाती रही
रेत् पे तेरा नाम लिखता रहा
लहरें आ आ के मिटाती रही
कैसे कहूँ मौसमे दर्द में भी
यादें तेरी लोरी सुनाती रही
बहुत कोशिश की भूल जाऊं
रह - रह तेरी याद आती रही
मुकेश इलाहाबादी -----------
“यह उस मनुष्य का रोज़नामचा है जो समय की दौड़ से थोड़ा बाहर खड़ा है और साधारण दिनों में असाधारण अर्थ खोजता है।”