तू लाख चाहे या न चाहे अफ़साना बन ही जाएगा तेरी मुहब्बत का
ज़माना इतना भी मासूम नही जो तेरी बेकरारी का शबब न समझे
मुकेश इलाहाबादी ------------------------------------------------------
“यह उस मनुष्य का रोज़नामचा है जो समय की दौड़ से थोड़ा बाहर खड़ा है और साधारण दिनों में असाधारण अर्थ खोजता है।”

