मलगजी शाम के साए में बैठ,तेरी

 बैठे ठाले की तरंग --------------
मलगजी शाम के साए में बैठ,तेरी
यादों की नई नज़्म गाना चाहता हूँ
रुसवाई,बेवफाई, और तन्हाएयों मे
दास्ताने ज़िन्दगी सुनाना चाहता हूँ

जब स्याही घुल रही हों फ़ज़ाओं मे
माजी की बेहोसी मे डूबना चाहता हूँ
खामुशी को चीरती हो पपीहे की  टेर
यादों की  नई नज़्म  गाना चाहता हूँ 

मुकेश इलाहाबादी ---------------------



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