कफस तोड़ के अब नहीं जाते ये शहर के परिंदे
कफस तोड़ के अब नहीं जाते ये शहर के परिंदे
कुछ इतने आरामतलब हो गए ये शहर के परिंदे
कुछ फलक भी जल रहा है यूँ आग के शोलों से
कि चाह के भी उड़ नहीं पा रहे हैं ये शहर के परिंदे
कफस की तीलियाँ तोड़ने को बेताब जवान परिंदे
अपने पर कटवा के बैठे हैं, जाबांज शहर के परिंदे
मुकेश इलाहाबादी --------------------------------------

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