हद्दे निगाह में वीराना ही वीराना है


हद्दे निगाह में वीराना ही वीराना है                         
ये कैसा वक़्त है? कैसा ज़माना है?
हमारा ही घर हमारा ही शहर हमारे ही लोग 
फिर भी जाने क्यूँ सब कुछ  लगता बेगाना है
शराफत में सहता रहा सबके ज़ुल्मो सितम
हम सब मुसाफिर और दुनिया सरायाखाना है
पल दो पल का ठहराना है फिर सबको जाना है
जिसने भी सच को सच और कहा झूठ को झूठ
दुनिया ने उसी को कहा ये पागल है दीवाना है
 
मुकेश इलाहाबादी --------------------------------

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