आईना टूट गया छनछनाता हुआ

आईना टूट गया छनछनाता हुआ
फेंका किसी ने पत्थर सनसनाता हुआ

हादसों का शहर हो गया हमारा
कब गिर जाए गोला सनसनाता हुआ ?

नाचती है गुडिया रस्सी पे भूखे पेट
तब लोग फेंकते हैं पैसा खनखनाता हुआ

कली अभी तो खिली भी न थी
भौंरा आ गया बाग़ मे भनभनाता हुआ

अब तो बेख़ौफ़ बेदर्द हो गया हूँ मुकेश
गुज़र जाऊंगा ग़ज़ल गुनगुनाता हुआ

मुकेश इलाहाबादी -------------------------

Comments

Popular posts from this blog

एक मुसाफिर की डायरी से --------------

एकांत एक नदी है

बात दोनों तरफ हो तो मज़ा देता है