हवेली की शान देखो


हवेली  की शान देखो 
अन्दर से वीरान देखो

दरो दीवार पे नमी औ
कमरे सूनसान देखो

टूटते  हुए  मेहराबों  मे
सदियों की दास्तान  देखो 

बजती थी शहनाई, अब
अभिशप्त मकान देखो

दफ़न कितने अरमान
चीखों के निशान देखो

मुकेश इलाहाबादी ----


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