जब रात सिसक सिसक के रोती है
जब शब् भर रात सिसकती है
तब पत्ती पे ओस चमकती है
जब मेहनत से गिरे पसीना
मोती बिन सीप निकलती है
लाज का घूंघट ओढ के बैठी
उसकी बेंदी बहुत दमकती है
सर्दी गरमी बसंत और बारिस
मौसम कितने रुप बदलती है
ओढ के चूनर धानी हंसती
जमी सजती और संवरती है
मुकेश इलाहाबादी ................
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