बादलों का जिस्म ले बरस जाऊं

बादलों का जिस्म ले बरस जाऊं
बन  हवा  का झोंका लिपट जाऊँ
झील  सी  गहरी  नीली आँखों में
अश्के  महताब सा  उतर  जाऊँ
मुकेश इलाहाबादी ---------------

Comments

Popular posts from this blog

एक मुसाफिर की डायरी से --------------

एकांत एक नदी है

बात दोनों तरफ हो तो मज़ा देता है