खामोश दरिया बहता रहा अपने दरम्यां

खामोश दरिया बहता रहा अपने दरम्यां
इक पुल भी न बन सका, अपने दरम्यां

माटी थी, धूप थी हवा थी पानी था,मगर 
गुले ईश्क़ न खिल सका, अपने दरम्यां

मुकेश इलाहाबादी --------------------

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