मेरे पास, कुछ भी नहीं है

मेरे पास,
कुछ भी नहीं है
तुम्हे देने को,
सिवाय
खुली खिड़की 
बड़ा खूब बड़ा आसमाँ
सुहानी शाम
अंजुरी भर, मोगरा के फूल
और ,,,,,
ढ़ेर सारा प्यार,
ग़र ,
इत्ते में निबाह कर सकती हो, तो
आ जाना,
मिलूंगा तुम्हे इंतज़ार करता
उसी ठाँव, जहाँ छोड़ गयी थी तुम
मुझे, पहले बहुत पहले
(मेरी प्यारी सुमी)
मुकेश इलाहाबादी ---

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