चलो आओ टहलें दूर तक

चलो
आओ टहलें दूर तक
बिना किसी मकसद
बिना कुछ बोले
एक दूजे से
बस
महसूसते हुए
हवाओं को बहते हुए
छू के गुज़र जाते हुए बदन को
सिर्फ देखें
दूर उड़ते हुए पंछियों को
बिना उनके बारे में कुछ विचार करते हुए
बस चहलकदमी करते रहें
चलते रहें - चलते रहें
थक जाने की
बुरी तरह थक जाने की हद तक
और फिर...
वहीं कंही किसी नदी के किनारे
रेत् पे गिर जाएँ
लेटे रहें तारों को बिना गिनते हुए
जब तक कि गिर न  जाएँ
एक गहरी समाधिस्थ सी निद्रा में

मुकेश इलाहाबादी -------------

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