बुद्धिजीवी होने के विशिष्ट अहसास से भरा पूरा पाता हूँ

बारिश
की हल्की हल्की फुहार वाले दिन
या फिर जेठ की चिपचिपी गर्मी वाले दिन
या फिर जाड़े में कोहरे की चादर ओढ़े हुई दोपहर में
कनॉट प्लेस के बरामदे में टहलते हुए
पॉप कॉर्न खाते हुए या
फिर कॉफी हॉउस में कॉफ़ी पी कर
सिगरेट के छल्ले उड़ाते हुए जब
मै मौजूदा राजनीति पे गरमा गरम बहस कर के
कुछ भद्दे चुटकुलों को अपने मित्रों से शेयर कर के
कुछ न मौजूद मित्रों की आलोचना कर के
वापस अपने दड़बे नुमा कमरे में आता हूँ
तो अपनी तमाम हीनग्रंथियों पे विजय पाते हुए
खुद को बुद्धिजीवी होने के विशिष्ट अहसास से भरा पूरा पाता हूँ

मुकेश इलाहाबादी -----------------

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