कभी धुआँते हुए तो

कभी
धुआँते हुए तो
कभी धू - धू करते हुए
वक़्त की लकड़ी सा जल रहे हैं
अनवरत ,,,
देखना एक दिन जब
ख़ाक हो जायेगा ये वज़ूद
तो यही वक़्त की लकड़ी तब्दील हो जाएगी
नदी के सैलाब में
और बहा ले जायेगी सारी ऱाख
शेष कुछ भी न होगा
अस्तित्व शेष 
न हवा में - न पानी में - न आकाश में

मुकेश इलाहाबादी ---------------

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