राजा का बाजा

सोचता
हूँ , मै भी राजा का बाजा बन जाऊँ
ताकि बड़े बड़े अधिकारी अपने हाथों में ले के
मुझे बजाएं -
लोग मन से या बेमन से ही सही मुझे सुनेंगे ज़रूर
क्यूँकि तब मै राजा का बाजा रहूंगा
और भोंपू सा बजूँगा
मै भी खुश रहूंगा
अधिकारी भी खुश रहेंगे
और राजा भी खुश रहेगा
पर, अफ़सोस अपनी फितरत तो
तूती की तरह पिपियाने की या फिर
सारंगी की तरह मिमियाने की है
जिसे नक्कार खाने में कोई नहीं सुनता

मुकेश इलाहाबादी --------------------

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