जिधर भी गया उधर धूप ही धूप का मंज़र मिला

जिधर भी गया उधर धूप ही धूप का मंज़र मिला
दोस्तों के हाथों में अपने ही खिलाफ खंज़र मिला

ढूढंते रहे उम्र भर मंदिर मंदिर, मस्जिद मस्जिद
चुप हो के एक दिन मै बैठा वो मेरे ही अंदर मिला

मुकेश, जिस दिल को उम्र भर मैंने सहरा समझा
उसी के सीने में मुझे हरहराता हुआ समंदर मिला

मुकेश इलाहाबादी ---------------------------------

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