शहर का अपने हाल पढ़ रहा है

शहर का अपने हाल पढ़ रहा है
जलता हुआ अख़बार पढ़ रहा है

वो अपने  चेहरे की झुर्रियों में
उम्र - भर की थकन पढ़ रहा है

मुफ़लिस कभी अपनी बीमारी
कभी दवा का दाम पढ़ रहा है

किताब के बोझ से दबे बेटे की
पीठ पे बाप भविष्य पढ़ रहा है

तुम्हारी मुस्कुराती खामोशी में 
मुक्कु अपना  नाम  पढ़ रहा है

मुकेश इलाहाबादी -------------

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