मैंने परिंदों से कहा

एक
दिन मैंने परिंदों से कहा
'क्या तुम मेरा ख़त
चाँद तक पहुंचा दोगे?'
परिंदों ने कहा " हमारी उड़ान असमान में कुछ ऊँचाई तक ही हैं
बाद उसके हमे भी नीचे उतराना पड़ता है
तुम्हारा चाँद हमसे काफ़ी ऊँचाई पे है - इसलिए सॉरी दो्‍सत हम तुम्हारा ख़त चांद तक नही पहुंचा पाएंगे"
तब मैंने हवा से कहा
क्या तुम मेरा ख़त चाँद तक पहुंचा दोगी?
हवा ने भी असमर्थता ज़ाहिर की
बोली 'मित्र - मै बहुत असमान में सिर्फ दो चार किलोमीटर तक हूँ
बाद उसके शून्य ही शून्य है, और तुम्हारा चाँद बहुत दूर
लिहाज़ा मै ये काम न कर पाऊँगी'
फिर मैंने ही एकांत में
पूरे मन से चाँद से
मन ही मन कहा
चाँद! मेरे हाथ
बहुत छोटे हैं जो
तुम तक नहीं पहुंच सकते हैं
और न ही कोई डाकिया
धरती से तुम्हारे लोक तक जाता है
और न ही तुम
असमान से आ पाते हो
तो बताओ मै अपने मन की बात तुम तक कैसे पहुचाऊं?
तब चांद ने मुस्कुरा कर कहा
और मै उसके कहने से
रोज़ रात होते ही
एक नीली शांत झील में
तब्दील हो जाता हूँ
और
चाँद अपना हौले से उसमें उतर आता है
फिर हम दोनों देर रात तक झील में हंसते खेलते हैं, सुबह होते ही चांद फिर आकाश मे टंग जाता है
और मै दुनिया के आकाश में
और इस तरह हम और चांद बरसों से दोस्ती निभाते आ रहे हैं
मुकेश इलाहाबादी,,,,,,,

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