ये, जो तुम, काजल लगा के अपनी सुआ पंखी सी पलकों को

ये,
जो तुम,
काजल लगा के
अपनी सुआ पंखी सी
पलकों को
झपकाती हुई
मुझे देख खिलखिला के हँसती हो न,
सच्ची किसी रोज़
ठीक उसी वक़्त
तुम्हारे नज़दीक आ के
अपनी तर्जनी और अंगूठे से तुम्हारे गुलू - गुलू गालों पर एक जोर की चिकोटी काट के
हँसता हुआ भाग जाऊंगा
और फिर
दूर से तुम्हारे चेहरे पे
गुस्सा, खीझ और प्यार
एक साथ देखूँगा
मुकेश इलाहाबादी,,,,,

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