घरबार ही नहीं ख़ुद को भी बिसार दिया

घरबार
ही नहीं ख़ुद को भी
बिसार दिया
तुझे
सोचते - सोचते मैंने
उम्र गुजार दिया
तू पत्थर थी,
पत्थर है
पत्थर रहेगी,
बेवजह तुझे
इतना प्यार दिया
दिले गुलशन मे
तू फूल सा महकेगी
कुछ यही सोच
इस रिश्ते को
इतना विस्तार दिया
जब से
मालूम हुआ
तू नहीं लौटेगी
सोचता हूँ, बेवजह
तेरा इंतजार किया
मुकेश इलाहाबादी,,,,

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